सचिन कुमार
जैन
अगस्त 2013 की आखिरी
सप्ताह की गह्त्नाओं का विश्लेषण यह है कि लोकसभा में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा
विधेयक पारित होने से शेयर बाज़ार 500 से 1000 अंक गिरा गया. डालर का दाम बढ़ा और रूपया
कमज़ोर हो गया. अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि अब तो ये देश बर्बाद ही हो जाएगा
क्योंकि ये सबको भोजन देने और भुखमरी से मुक्त करने की दिशा में बढ़ रहा है.
हद तो तब हो
गयी कि पी चिदंबरम साहब की पीड़ा इतनी बढ़ गयी कि उन्होंने कह दिया कि वर्ष 2008 की नीतियों
(जिन्हे प्रणब मुखर्जी ने अपनाया था) के कारण संकट आया है. एक बार फिर यह साबित हो
गया कि शेयर बाज़ार या आर्थिक विकास तभी संभव है जब भूख बनी रहेगी और सरकारी खज़ाना
सिर्फ कार्पोरेट्स के लिए खुला रहेगा. यदि खज़ाना आम लोगों के लिए खुलेगा तो
कार्पोरेट्स और उनके हितेशियों के दिल-ओ-दिमाग का दौरा पड़ेगा.
भूख के साथ
सोने और जागने वालों पर सवा लाख करोड खर्च करोगे तो देश रसातल में तो जाएगा ही न!
कुछ भाई साबों को पता नहीं है कि सबसे बड़े भिखारी वो हैं जो आर्थिक वृद्धि, औद्योगिकीकरण और रौशनी का दावा करते हैं; पर सरकार से भीख लेकर. सात साल में 29 लाख करोड
रूपए की छूटें ली हैं, विकास के उन
ध्वज वाहकों ने. जिन्हे हम देश के सबसे बड़े ५ उद्योगपति मानते हैं, उन पर सवा छह लाख करोड का कर्जा है. अब
इनके हाथ से सार्वजनिक संसाधन लूटने का मौका थोडा खिसक सा रहा है. एक बात कहूँ कि
गरीबी और भूख को बनाए रखना भी एक किस्म की मनौवृत्ति है. आज यह मनौवृत्ति हावी है, तो खुल कर जनकल्याणकारी व्यवस्था का ही
विरोध होता है. इन्हें लगता है कि बच्चों को पोषण आहार देने या लोगों को मुफ्त
इलाज़ देने या सस्ते राशन की व्यवस्था के बनने से इनका प्रभुत्व कम हो जा रहा है.
मुझे लगता है कि किसी भी मुद्रा की कीमत डालर के एवज में नहीं मापी जाना चाहिए; किसी भी मुद्रा की कीमत उसके समाज के
नैतिक, राजनीतिक और आर्थिक पतन या उन्नयन के
हिसाब से मूल्यांकित की जाना चाहिए.
परन्तु भारत
के वित्तमंत्री कुछ और ही सोचते हैं. अर्थव्यवस्था बचाने के लिए 27 अगस्त 2013 को
उन्होंने 10 बिंदुओं की कार्ययोजना देश के सामने रखी. इस से
अभी भी यही पता चलता है कि वे मौजूदा आर्थिक संकट के कारणों से अब भी वाकिफ नहीं
हैं या उन कारणों की तरफ आँखें मूंदे रखना चाहते हैं. इस कार्ययोजना में से दो
बिंदु खतरे को और बढाएंगे. उनका कहना है है कि हमें उत्पादन (प्रोडक्शन वाला नहीं
मेन्यूफेकचरिंग वाला) बढ़ाना जरूरी है. इसके लिए वे फ्लेट स्क्रीन वाले टेलिविज़न का
उदाहरण दे रहे हैं. आज की सबसे बड़ी जरूरत अपने उपभोक्तावादी व्यवहार को नियंत्रित
करने की है, ताकि अनावश्यक हमें विदेशी आयात पर हमें निर्भर न होना पड़े. इसके बारे
में न सोच कर वे अब भी यही मानते हैं कि समाज को लालच, लोभ और विलासिता में डूबे
रहना चाहिए ताकि पूँजी का बहाव बना रहे. भारत सरकार सुरक्षित जमा (जैसे बैंक में
बचत) को प्रोत्साहित नहीं करती, क्योंकि वहाँ बैंक को संयमित व्यवहार करना होता है
और वे आम लोगों के धन का सट्टे (शेयर) में उपयोग नहीं कर सकते हैं. इसके दूसरी तरफ
म्युचुअल फंड, बोंड और रियल एस्टेट में निवेश के लिए वह करों में छूट देती है. इन
क्षेत्रों में लगा आम लोगों का धन एक तरह से सट्टे में लगा होता है. यदि वह डूब
जाए तो लगभग कोई जिम्मेदार नहीं होता है. इसका साफ़ मतलब यह है कि एक तरफ तो सरकार
ने पूँजी बाज़ार का सही और ठोस नियमन नहीं किया है और उस जोखिम भरे बाज़ार में वह
लोगों को अपनी जमा पूँजी और बचत का निवेश करने के लिए मजबूर करती है. यही कारण है
कि आज जब बाज़ार में संकट है तो इसका सीधा असर लोगों की निजी और दैनिक जिंदगी पर पड़
रहा है क्योंकि उनकी जमा पूँजी बाजार के धराशायी होने के कारण डूब रही है. अब भी
वित्तमंत्री मानते हैं कि फ्लेट स्क्रीन टीवी, एयर कंडीशनर, विलासिता पूर्ण कारों
में लोगों का पैसा खर्च करवाया जाए. यदि लोगों के पास पैसा न हो तो उन्हें सस्ता
क़र्ज़ दिलवा दिया जाए, जिसकी वसूली के लिए वित्तीय संस्थान गुंडाई हथकंडे अपनाने के
लिए स्वतंत्र रहते हैं. कुल मिला कर बैंक को अपना क़र्ज़ वापस मिल जायेगा, कंपनी की
टीवी और कार बिक जायेगी, बाज़ार का आतंक भी बन जायेगा और आखिर में अगर कोई बर्बाद
होगा तो एक सामान्य व्यक्ति क्योंकि उसे अपना क़र्ज़ चुकाने के लिए घर, गहने बेंचना
पड़ेंगे या फिर भूख का साथ निभाना पड़ेगा. सम्मान तो जायेगा ही.
वित्तमंत्री का दूसरा विचार है कि आज का संकट इसलिए है क्योंकि हमारा निर्यात
कम हो गया है. निर्यात कम होने और आयात ज्यादा होने से भारत को अपने विदेशी मुद्रा
भण्डार में से डालर खर्च करना पड़ रहा है. आयात के अनुपात में निर्यात इतना कम हो
गया है कि हमारे पास अगले छह माह तक आयात करने लायक ही विदेशी मुद्रा बची है. अगर
संकट यह है तो हमें इस स्थिति को एक अवसर मानना चाहिए. हमें आत्मविश्लेषण और चिंतन
करना चाहिए कि यदि हमारी अर्थव्यवस्था इतनी असुरक्षित और विदेशी निवेश पर निर्भर
है, तो हम खुद को आत्मनिर्भर क्यों कहते हैं? हम दाल और खाने का तेल आयात करते
हैं, हम कपडे आयात करते हैं, इतना ही नहीं हम प्याज भी आयात करना चाहते हैं. ये
हमारी बुनियादी जरूरतें हैं और इनके उत्पादन के मामले में देश आत्म निर्भर हो सकता
है. बस सरकार ने ही पर-निर्भरता की नीति अपनाई. हम पेट्रोलियम उत्पादों और कच्चे
तेल का आयात करते हैं क्योंकि हमारे पास इसके प्राकृतिक भण्डार नहीं हैं. हम इनके
उपयोग को सीमित जरूर कर सकते हैं. भारत में कभी भी सार्वजनिक और सामूहिक परिवहन
व्यवस्था को ठोस बनाने की नीति को मतवपूर्ण नहीं माना गया. स्वतंत्रता के बाद जब
भी जिसके पास पैसा आया उसमे एक, के बाद दूसरी, दो के बाद तीसरी और इससे ज्यादा
कारें खरीद कर अपनी सम्पन्नता का प्रदर्शन किया. हम सम्पन्नता के साथ जिम्मेदारी
का कभी अहसास ही नहीं कर पाए क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था जिम्मेदार होना नहीं
सिखाती है. जरूरत जन-हित की नीतियों की है, लागू हो रही हैं जन-अहित की नीतियां.
वित्तमंत्री अपने इस सुझाव में कहते हैं कि हमें हमें ऊर्जा, स्टील, ऑटोमोबाइल,
इलेक्ट्रानिक्स हार्डवेयर, टेक्सटाइल की मेन्यूफेक्चारिंग करना चाहिए. वे यह नहीं
बता रहे हैं कि वे जिस तरह की मेन्युफेक्चरिंग की वकालत कर रहे हैं उससे देश कई
जैव-विविधता, पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधन को जबरदस्त और स्थाई नुक्सान तो होगा ही.
भारी तादाद में विस्थापन भी होगा. बेहतर होगा कि अब सरकार, अर्थशास्त्री और वित्तमंत्री
जो भी सुझाव देश के सामने रखें और लागू करें उनके समाज पर पड़ने वाले अच्छे-बुरे
दूरगामी परिणामों का खाता भी शामिल हो. यह सही है कि कुछ मआयनों में आज देश के
सामने आर्थिक संकट है, पर यह अस्तित्व का संकट नहीं है. देश भूखों नहीं मरेगा
क्योंकि किसान ने हमें अनाज, पोल्ट्री, पशुपालन, दूध उत्पादन के मामले में
आत्मनिर्भर बनाया है. बेहतर होगा कि इस आर्थिक संकट से उबरने की दिशा में हम एक
बार फिर किसान और खेती को संरक्षण दें. दूसरी बात यह है कि देश के भीतर की लघु और
स्थानीय उद्योगों की व्यावस्था में सरकार निवेश करे. हम जानते हैं कि टेक्सटाइल
उद्योग इसलिए बर्बाद हुआ क्योंकि बड़े उद्योगों को फायदा पंहुचाने के लिए सरकारे ने
नीतिगत तरीका अपना कर छोटे और स्थानीय उद्योगों को खत्म किया. बम्बई की टेक्सटाइल
मिलों से लेकर इंदौर की मिलों और महेश्वर-चंदेरी के घरेलु उद्योगों तक कपडा उद्योग
को भारी आघात पंहुचाया गया. हम बार बार यह सुनते हैं कि सिंचाई और ऊर्जा के लिए
बड़ी परियोजनाओं की नहीं बल्कि छोटी परियोजनाओं की जरूरत है. हम सब जानते हैं कि
बाँध बनाते समय सिंचाई और बिजली उत्पादन के जो दावे किये जाते हैं, उन दावों की
तुलना में उत्पादन केवल 30 से 40 फीसदी होता है. इन बड़ी
परियोजनाओं में 20 लाख हेक्टेयर ऐसा जंगल खत्म किया है जो हमारी खाद्य सुरक्षा और आजीविका का
मूल आधार था. इसी तारतम्य में पी.चिदंबरम साहब को तीन साल पहले दिए गए अपने उस
वक्तव्य को भी तत्काल वापस लेना होगा जिसमे उन्होंने कहा था कि वे वर्ष 2025 तक 85 प्रतिशत आबादी को शहरों
में देखना चाहते हैं. इस वक्तव्य में कूट-कूट कर भरी अदूरदर्शिता को देख पा रहे
हैं आप कि नहीं? जिन शहरों में मजबूरी में गांव से आकर बस जाने वाले लोगों को
अतिक्रमणकारी, आदतन अपराधी कहा जाता है, जिनके घरों के समूह को “गैर-कानूनी” बस्ती के रूप में
परिभाषित किया जाता है, वहाँ देश के 85 प्रतिशत आबादी के होने का मतलब क्या है? इन
सन्दर्भों में आज का आर्थिक संकट केवल शेयर बाज़ार के आंकड़ों और डालर के मुकाबले
रूपए की घटती कीमत का संकट नहीं है. यह हमारी भीतरी और चारित्रिक अर्थव्यवस्था के
कमज़ोर होने का संकट है. इस संकट पर दुखी मत होईये, इसे अवसर मानिए. यह तय कीजिये
कि हम सरकार के इन दस सूत्रों में नहीं फंसेंगे और अपने व्यक्तिगत व्यवहार और
प्रतिबद्धता से इस संकट का सामना करेंगे.