Thursday, 29 August 2013

आर्थिक संकट : यह वक्त सरकार की कार्ययोजना से बचने का है!




सचिन कुमार जैन

अगस्त 2013 की आखिरी सप्ताह की गह्त्नाओं का विश्लेषण यह है कि लोकसभा में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित होने से शेयर बाज़ार 500 से 1000 अंक गिरा गया. डालर का दाम बढ़ा और रूपया कमज़ोर हो गया. अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि अब तो ये देश बर्बाद ही हो जाएगा क्योंकि ये सबको भोजन देने और भुखमरी से मुक्त करने की दिशा में बढ़ रहा है. 
हद तो तब हो गयी कि पी चिदंबरम साहब की पीड़ा इतनी बढ़ गयी कि उन्होंने कह दिया कि वर्ष 2008 की नीतियों (जिन्हे प्रणब मुखर्जी ने अपनाया था) के कारण संकट आया है. एक बार फिर यह साबित हो गया कि शेयर बाज़ार या आर्थिक विकास तभी संभव है जब भूख बनी रहेगी और सरकारी खज़ाना सिर्फ कार्पोरेट्स के लिए खुला रहेगा. यदि खज़ाना आम लोगों के लिए खुलेगा तो कार्पोरेट्स और उनके हितेशियों के दिल-ओ-दिमाग का दौरा पड़ेगा.

भूख के साथ सोने और जागने वालों पर सवा लाख करोड खर्च करोगे तो देश रसातल में तो जाएगा ही न! कुछ भाई साबों को पता नहीं है कि सबसे बड़े भिखारी वो हैं जो आर्थिक वृद्धि, औद्योगिकीकरण और रौशनी का दावा करते हैं; पर सरकार से भीख लेकर. सात साल में 29 लाख करोड रूपए की छूटें ली हैं, विकास के उन ध्वज वाहकों ने. जिन्हे हम देश के सबसे बड़े ५ उद्योगपति मानते हैं, उन पर सवा छह लाख करोड का कर्जा है. अब इनके हाथ से सार्वजनिक संसाधन लूटने का मौका थोडा खिसक सा रहा है. एक बात कहूँ कि गरीबी और भूख को बनाए रखना भी एक किस्म की मनौवृत्ति है. आज यह मनौवृत्ति हावी है, तो खुल कर जनकल्याणकारी व्यवस्था का ही विरोध होता है. इन्हें लगता है कि बच्चों को पोषण आहार देने या लोगों को मुफ्त इलाज़ देने या सस्ते राशन की व्यवस्था के बनने से इनका प्रभुत्व कम हो जा रहा है. मुझे लगता है कि किसी भी मुद्रा की कीमत डालर के एवज में नहीं मापी जाना चाहिए; किसी भी मुद्रा की कीमत उसके समाज के नैतिक, राजनीतिक और आर्थिक पतन या उन्नयन के हिसाब से मूल्यांकित की जाना चाहिए.

परन्तु भारत के वित्तमंत्री कुछ और ही सोचते हैं. अर्थव्यवस्था बचाने के लिए 27 अगस्त 2013 को उन्होंने 10 बिंदुओं की कार्ययोजना देश के सामने रखी. इस से अभी भी यही पता चलता है कि वे मौजूदा आर्थिक संकट के कारणों से अब भी वाकिफ नहीं हैं या उन कारणों की तरफ आँखें मूंदे रखना चाहते हैं. इस कार्ययोजना में से दो बिंदु खतरे को और बढाएंगे. उनका कहना है है कि हमें उत्पादन (प्रोडक्शन वाला नहीं मेन्यूफेकचरिंग वाला) बढ़ाना जरूरी है. इसके लिए वे फ्लेट स्क्रीन वाले टेलिविज़न का उदाहरण दे रहे हैं. आज की सबसे बड़ी जरूरत अपने उपभोक्तावादी व्यवहार को नियंत्रित करने की है, ताकि अनावश्यक हमें विदेशी आयात पर हमें निर्भर न होना पड़े. इसके बारे में न सोच कर वे अब भी यही मानते हैं कि समाज को लालच, लोभ और विलासिता में डूबे रहना चाहिए ताकि पूँजी का बहाव बना रहे. भारत सरकार सुरक्षित जमा (जैसे बैंक में बचत) को प्रोत्साहित नहीं करती, क्योंकि वहाँ बैंक को संयमित व्यवहार करना होता है और वे आम लोगों के धन का सट्टे (शेयर) में उपयोग नहीं कर सकते हैं. इसके दूसरी तरफ म्युचुअल फंड, बोंड और रियल एस्टेट में निवेश के लिए वह करों में छूट देती है. इन क्षेत्रों में लगा आम लोगों का धन एक तरह से सट्टे में लगा होता है. यदि वह डूब जाए तो लगभग कोई जिम्मेदार नहीं होता है. इसका साफ़ मतलब यह है कि एक तरफ तो सरकार ने पूँजी बाज़ार का सही और ठोस नियमन नहीं किया है और उस जोखिम भरे बाज़ार में वह लोगों को अपनी जमा पूँजी और बचत का निवेश करने के लिए मजबूर करती है. यही कारण है कि आज जब बाज़ार में संकट है तो इसका सीधा असर लोगों की निजी और दैनिक जिंदगी पर पड़ रहा है क्योंकि उनकी जमा पूँजी बाजार के धराशायी होने के कारण डूब रही है. अब भी वित्तमंत्री मानते हैं कि फ्लेट स्क्रीन टीवी, एयर कंडीशनर, विलासिता पूर्ण कारों में लोगों का पैसा खर्च करवाया जाए. यदि लोगों के पास पैसा न हो तो उन्हें सस्ता क़र्ज़ दिलवा दिया जाए, जिसकी वसूली के लिए वित्तीय संस्थान गुंडाई हथकंडे अपनाने के लिए स्वतंत्र रहते हैं. कुल मिला कर बैंक को अपना क़र्ज़ वापस मिल जायेगा, कंपनी की टीवी और कार बिक जायेगी, बाज़ार का आतंक भी बन जायेगा और आखिर में अगर कोई बर्बाद होगा तो एक सामान्य व्यक्ति क्योंकि उसे अपना क़र्ज़ चुकाने के लिए घर, गहने बेंचना पड़ेंगे या फिर भूख का साथ निभाना पड़ेगा. सम्मान तो जायेगा ही.    
वित्तमंत्री का दूसरा विचार है कि आज का संकट इसलिए है क्योंकि हमारा निर्यात कम हो गया है. निर्यात कम होने और आयात ज्यादा होने से भारत को अपने विदेशी मुद्रा भण्डार में से डालर खर्च करना पड़ रहा है. आयात के अनुपात में निर्यात इतना कम हो गया है कि हमारे पास अगले छह माह तक आयात करने लायक ही विदेशी मुद्रा बची है. अगर संकट यह है तो हमें इस स्थिति को एक अवसर मानना चाहिए. हमें आत्मविश्लेषण और चिंतन करना चाहिए कि यदि हमारी अर्थव्यवस्था इतनी असुरक्षित और विदेशी निवेश पर निर्भर है, तो हम खुद को आत्मनिर्भर क्यों कहते हैं? हम दाल और खाने का तेल आयात करते हैं, हम कपडे आयात करते हैं, इतना ही नहीं हम प्याज भी आयात करना चाहते हैं. ये हमारी बुनियादी जरूरतें हैं और इनके उत्पादन के मामले में देश आत्म निर्भर हो सकता है. बस सरकार ने ही पर-निर्भरता की नीति अपनाई. हम पेट्रोलियम उत्पादों और कच्चे तेल का आयात करते हैं क्योंकि हमारे पास इसके प्राकृतिक भण्डार नहीं हैं. हम इनके उपयोग को सीमित जरूर कर सकते हैं. भारत में कभी भी सार्वजनिक और सामूहिक परिवहन व्यवस्था को ठोस बनाने की नीति को मतवपूर्ण नहीं माना गया. स्वतंत्रता के बाद जब भी जिसके पास पैसा आया उसमे एक, के बाद दूसरी, दो के बाद तीसरी और इससे ज्यादा कारें खरीद कर अपनी सम्पन्नता का प्रदर्शन किया. हम सम्पन्नता के साथ जिम्मेदारी का कभी अहसास ही नहीं कर पाए क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था जिम्मेदार होना नहीं सिखाती है. जरूरत जन-हित की नीतियों की है, लागू हो रही हैं जन-अहित की नीतियां. वित्तमंत्री अपने इस सुझाव में कहते हैं कि हमें हमें ऊर्जा, स्टील, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रानिक्स हार्डवेयर, टेक्सटाइल की मेन्यूफेक्चारिंग करना चाहिए. वे यह नहीं बता रहे हैं कि वे जिस तरह की मेन्युफेक्चरिंग की वकालत कर रहे हैं उससे देश कई जैव-विविधता, पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधन को जबरदस्त और स्थाई नुक्सान तो होगा ही. भारी तादाद में विस्थापन भी होगा. बेहतर होगा कि अब सरकार, अर्थशास्त्री और वित्तमंत्री जो भी सुझाव देश के सामने रखें और लागू करें उनके समाज पर पड़ने वाले अच्छे-बुरे दूरगामी परिणामों का खाता भी शामिल हो. यह सही है कि कुछ मआयनों में आज देश के सामने आर्थिक संकट है, पर यह अस्तित्व का संकट नहीं है. देश भूखों नहीं मरेगा क्योंकि किसान ने हमें अनाज, पोल्ट्री, पशुपालन, दूध उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनाया है. बेहतर होगा कि इस आर्थिक संकट से उबरने की दिशा में हम एक बार फिर किसान और खेती को संरक्षण दें. दूसरी बात यह है कि देश के भीतर की लघु और स्थानीय उद्योगों की व्यावस्था में सरकार निवेश करे. हम जानते हैं कि टेक्सटाइल उद्योग इसलिए बर्बाद हुआ क्योंकि बड़े उद्योगों को फायदा पंहुचाने के लिए सरकारे ने नीतिगत तरीका अपना कर छोटे और स्थानीय उद्योगों को खत्म किया. बम्बई की टेक्सटाइल मिलों से लेकर इंदौर की मिलों और महेश्वर-चंदेरी के घरेलु उद्योगों तक कपडा उद्योग को भारी आघात पंहुचाया गया. हम बार बार यह सुनते हैं कि सिंचाई और ऊर्जा के लिए बड़ी परियोजनाओं की नहीं बल्कि छोटी परियोजनाओं की जरूरत है. हम सब जानते हैं कि बाँध बनाते समय सिंचाई और बिजली उत्पादन के जो दावे किये जाते हैं, उन दावों की तुलना में उत्पादन केवल 30 से 40 फीसदी होता है. इन बड़ी परियोजनाओं में 20 लाख हेक्टेयर ऐसा जंगल खत्म किया है जो हमारी खाद्य सुरक्षा और आजीविका का मूल आधार था. इसी तारतम्य में पी.चिदंबरम साहब को तीन साल पहले दिए गए अपने उस वक्तव्य को भी तत्काल वापस लेना होगा जिसमे उन्होंने कहा था कि वे वर्ष 2025 तक 85 प्रतिशत आबादी को शहरों में देखना चाहते हैं. इस वक्तव्य में कूट-कूट कर भरी अदूरदर्शिता को देख पा रहे हैं आप कि नहीं? जिन शहरों में मजबूरी में गांव से आकर बस जाने वाले लोगों को अतिक्रमणकारी, आदतन अपराधी कहा जाता है, जिनके घरों के समूह को गैर-कानूनीबस्ती के रूप में परिभाषित किया जाता है, वहाँ देश के 85 प्रतिशत आबादी के होने का मतलब क्या है? इन सन्दर्भों में आज का आर्थिक संकट केवल शेयर बाज़ार के आंकड़ों और डालर के मुकाबले रूपए की घटती कीमत का संकट नहीं है. यह हमारी भीतरी और चारित्रिक अर्थव्यवस्था के कमज़ोर होने का संकट है. इस संकट पर दुखी मत होईये, इसे अवसर मानिए. यह तय कीजिये कि हम सरकार के इन दस सूत्रों में नहीं फंसेंगे और अपने व्यक्तिगत व्यवहार और प्रतिबद्धता से इस संकट का सामना करेंगे.      

रूपए के इस संकट की जड़ों पर भी जाईये!




सचिन कुमार जैन

हम सब अखबार में पढ़ रहे हैं कि शेयर बाज़ार गिर रहा है, रूपया गिर रहा है, निर्यात घट रहा है, विदेशी मुद्रा का भण्डार खाली हो रहा है; मैं थोडा नासमझ हूँ. मेरा सवाल यह है कि पिछले २२ सालों में हमने जो विकास किया, अपने जो संसाधन विकास के नाम पर लुटाए, कारपोरेटों को राजस्व में छूट दी; वह सब कहाँ गया? घाटे की अर्थव्यावस्था को अभिव्यक्त कई बिन्दुओं से समझा जा सकता है. भारत की मौजूदा स्थिति में यह दिखा रहा है कि विदेशी निवेशक अब देश से अपना निवेश निकाल रहे हैं. उनका कहना है कि भारत में निवेश के लिए सकारात्मक माहौल नहीं है. कुडनकुलम से लेकर नियमागिरी से संघर्षों से यह तो स्पष्ट हो ही गया है कि हम एक सुसुप्त लोकतंत्र में नहीं रहते हैं. 12 ग्राम सभाओं ने बता दिया है कि उनकी और भारत की सरकारों की प्राथमिकताएं अलग हैं. इससे उन निवेशकों को पता चल रहा है कि यहाँ संसाधनों पर कब्ज़ा करना अब आसान नहीं रह गया है. बहरहाल तेलंगाना, जम्मू और आसाम में जो हालात बने हुए हैं, उनसे यह संकेत भी गया है कि देश में अभी अशांति का माहौल है; जबकि निवेश के लिए शान्ति होना जरूरी है. इन परिस्थितियों में पिछले कुछ दिनों में 50 हज़ार करोड़ रूपए की बिकवाली विदेशी निवेशकों ने की है.

घाटे की स्थिति को हम आयात-निर्यात संतुलन से भी जांचते हैं. आयात बहुत संकट पैदा नहीं करता यदि हमने अपने देश के भीतर की अर्थव्यवस्था को सम्मान दिया होता.  अपने लघु वनउपज, अपना हस्तशिल्प, अपनी देशी कपडा संस्कृति, अपना पर्यावरण, अपनी नदियाँ...इस्बसे ज्यादा पाने खेत और किसान. किसी भी अर्थ व्यवस्था की ताकत उसकी भीतरी अर्थव्यवस्था होता है. हमने उस ताकत को तोड़ दिया है.  यही कारण है कि हम आज अपना कुछ निर्यात कर पाने में सक्षम नहीं रह गए हैं. इतना ही नहीं हमने अपनी ताकत, यानी आपनी प्राकृतिक सम्पदा को बेंचना शुरू कर दिया. अपनी जमीन के भीतर दबी सम्पदा को बेतरतीब ढंग से लूट गया. नदियों से पानी और रेट लूटी गयी, पहाड़ों को डुबोया और खोखला किया गया, कोयला तो इतना निकला की अब अच्छी गुणवत्ता का कोयला बचा ही नहीं है. देश के लोगों, किसानों की जमीने और आदिवासियों से जंगल छीने और बड़ी कंपनियों और अमेरिका-यूरोपीय देशों को बेंचा. आज 3 बड़ी कम्पनियाँ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 80000 हेक्टेयर जमीन पर खुद खेती कर रही हैं. दूसरी तरफ 2.90 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं. इससे सरकार और बाज़ार को जो पैसा मिला उसे वे अपने विकास के मानक के रूप में पेश करते हैं.

आज जब हम यह कहते हैं की भुगतान संतुलन की स्थिति गड़बड़ा रही है, तो इसका मतलब ही यही होता है कि आयात ज्यादा हो रहा है और निर्यात कम. यह अंतर जितना बढ़ता जाएगा, अब संकट भी उतना ही बढेगा. आपको यह भी जान लेना चाहिए कि 1951 में भारत का आयात 608 करोड़ रूपए का था और निर्यात भी 608 करोड़ का. शायद तब हमारी अर्थव्यवस्था दुनिया में उतनी विश्वसनीय नहीं थी कि हम अपने विदेशी मुद्रा भंडार को पूरा दाँव पर लगा कर जरूरतों को पूरा करते; पर वहीँ एक मौका भी था कि हम. एक देश के रूप में पेट्रोलियम, बिजली, विलसित की वस्तुओं की वास्तविक जरूरतों का भी आंकलन करते और उन्हें सीमित रखते हुए विकास की नीतिगत परिभाषा बनाते. पर हमने तय किया कि हम अपनी जरूरतों को असीमित सीमा तक बढ़ाएंगे और उन्हे पूरा करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों से लेकर लोकतांत्रिक व्यवस्था तक सबकी बलि लेते जायेंगे.   

इस दौर में 2 करोड़ एकड़ कृषि और कृषि योग्य भूमि का उपयोग बदल दिया गया. 10 लाख हेक्टेयर जंगल कम हो गया और देश की हर नदी प्रदूषित कर दी गयी. इसके बाद भी हम वही आर्थिक विकास चाहते हैं जो हमें गुलामी से निकलने नहीं देता. सिर्फ एक उदाहरण देखिये.  वर्ष 2010 में जब अमेरिकी राष्ट्रपति भारत आये थे, तब मीडिया तो यह कह रहा था कि भारत एक महाशक्ति बन गया है इसलिए ओबामा आये हैं. पर यह सच नहीं था. वे तो अपनी अर्थव्यवस्था और बेरोज़गारी के संकट से उबारने के लिए भारत से संसाधन लूटने आये थे. उस यात्रा के दौरान ही खुदरा बाज़ार में 100 फीसदी विदेशी निवेश की नीति लागू करने का भारत पर दबाव बढ़ा. उन्होने तीन दिन में अमेरिकी बैंकों से भारत की 10 बड़ी कंपनियों को 30 बिलियन डालर रूपए का क़र्ज़ दिलवाया ताकि उनके बैंकों को बाज़ार मिले. रूपए के मुकाबले डालर की कीमत के बढने के कारण यह क़र्ज़ बढ़ कर 35 बिलियन डालर हो गया है. इस क़र्ज़ को देने के बाद उन्होने भारतीय कंपनियों से कहा कि वे अमेरिकी कम्पनिओं से ही खरीदी करें. इससे बोईंग, जनरल इलेक्ट्रिक, डूपों को 20 हज़ार करोड़ रूपए का कारोबार मिला. ओबामा उस यात्रा में अमेरिका के लिए 50 हज़ार रोज़गार और 70 अरब रूपए का निवेश लेकर गए थे. वर्ष 2012-13 में अमेरिका सरकार ने अपनी अर्थव्यवस्था में 700 बिलियन डालर डाले हैं. वह क़र्ज़ सस्ते कर रहा है ताकि देश की भीतर निवेश बढे. भारत सरकार ने 2005 से 2012 तक बाज़ार को 29 लाख करोड़ की राजस्व छूट दी, पर किसानों को अब केवल क़र्ज़ मिलता है. पिछले 5 सालों में कृषि के लिए 12 लाख करोड़ का क़र्ज़ दिया गया है. सब्सिडी मिलती है – कारों के लिए, किसानों के लिए नहीं.

अमेरिका की अर्थनीतियों के कारण भारत में निवेश बढ़ा, जब 2008 में अमेरिका में मंदी आने लगी तब वहां ब्याज दरें बढ़ने लगीं। विदेशी निवेशकों ने भारत के बाजार से अपना पैसा निकालना शुरू कर दिया। इससे बैंकों में भी धन कम होने लगा। यह एक बनावटी वृद्धि थी। इस खोखली विकास दर का भारत सरकार खूब प्रचार कर रही थी। कर्ज देना तो आसान था, पर कर्ज चुकाना कई कारकों पर निर्भर करता है। जिनमें से एक है, अच्छा और सुनिश्चित रोजगार। कंपनियों ने अपनी उत्पादन लागत कम करने के लिए कामगारों की छटनी की, जिससे रोजगार में असुरक्षा बढ़ी। ऐसी स्थिति में जिन लोगों ने कर्ज लिया था, उन्हें कर्ज चुकाना भारी पड़ने लगा, जिससे अनुत्पादक सम्पत्तियां यानी एनपीए बढ़ा। भारत में लगभग डेढ़ लाख करोड़ रूपए का कर्ज वापस नहीं आया है। यह याद रखिए कि कर्ज वापस नहीं लौटाने वालों में बड़े उद्योगपति और पूंजीपति सबसे केंद्रीय भूमिका में हैं।


आखिर में थोड़ी आंकड़ों में बात करते हैं. 1951 में हम 5.08 करोड़ टन खाद्यान उत्पादन करते थे. यह अब 5 गुना बढ़ कर 25.74 करोड़ टन हो गया है. परन्तु 1951 में स्टील उत्पादन केवल 10 लाख टन होता था, जो अब 82 गुना बढ़कर 8.28 करोड़ टन हो गया है. सीमेंट 27 लाख टन बनती थी. इसमे 85 गुना बढौतरी हुई. अब 23.5 करोड़ टन सीमेंट बनती है. 1951 में 5 करोड़ किलोवाट बिजली की खपत होती थी; इसमे 175 गुना बढौतरी हुई है. अब हमारा देश 877 करोड़ किलोवाट बिजली की खपत करता है, यही रौशनी हमें दिखाई देती है.  1951 में हमारा विदेशी मुद्रा भण्डार 1.914 अरब डालर का था. इसमे 136 गुना की बढ़ोतरी हुई है. आज यह लगभग 280 अरब डालर का है. पर इसे नंगी अंकों से मत देखिये. इस अवधि में डालर के मुकाबले रूपया 13 गुना कमज़ोर हुआ है. 1950 में एक डालर 4.79 रूपए का था,  आज यह 64.50 रूपए का है. सीधी से बात यह है कि यदि भारत ने अपनी अंदरूनी और स्वाभाविक अर्थव्यवस्था को बचा कर रखा होता तो आज के विदेशी मुद्रा भण्डार का मूल्य 13 गुना ज्यादा होता. एक बात फिर भी साफ़ है कि देश उस स्थिति में नहीं है, जिस स्थिति में 1991 में था, लेकिन ये संकेत जरूर हैं, जिन्हे समझना होगा. आज हम केवल अपनी विकास की परिभाषा और उसके आधार पर अपनी नीतियों को बदल कर ही आने वाले समय को सुरक्षित बना सकते हैं. वर्ष 2004 से 2009 के बीच में 1.57 करोड़ लोग किसानी से बाहर कर दिए गए. निर्माण यानी कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में 2.6 करोड़ लोग आ गए यानी मजदूर बढ़ रहे हैं. हमें पेट्रोल और सोना तो ठीक खाने के लिए दाल और प्याज भी आयात करना पड़ती है. ऐसे में क्या यह समझना मुश्किल है कि क्यों कम इस आर्थिक संकट के शिकार बन रहे हैं? क्या यह संकट हमारी नीतियों की पैदाईश नहीं है?

यह बाज़ार नहीं, राजनीतिक अर्थव्यवस्था में सट्टे का खेल है.



सचिन कुमार जैन

अगर आप यह सोच रहे हैं कि रूपए की गिरती कीमत और अर्थव्यवस्था के संकट से अपने को क्या लेनदा-देना, तो आप गलत सोच रहे हैं. इससे पेट्रोल-डीज़ल मंहगा होगा, आयात होने वाला बना या कच्चा माला मंहगा होगा, सरकार को अपने द्वारा लिए गए कर्जे पर ज्यादा ब्याज देना पड़ेगा और इन सबसे अपना विदेशी मुद्रा का भण्डार खाली होता जाएगा. इन सबका बोझ लोगों पर आएगा और सरकार बाज़ार के खिलाड़ियों को राहत पैकेज देगी. इस संकट से कोई तो है जो सबसे ज्यादा फायदा उठाता है; क्या हमें नहीं पता कि वह कौन है?

देश की अपनी मुद्रा यदि कमज़ोर हो जाए तो इसका मतलब यह है कि अपनी अर्थ व्यवस्था पर उस देश का अपना नियंत्रण कमज़ोर हो रहा है. उसकी निर्भरता बाहरी अर्थव्यवस्था और अनिश्चित बाज़ार पर बढ़ रही है. दुनिया में वैश्विक बाज़ार में व्यापार में अम्रेरिकी डालर का महत्व अमेरिका के दुनिया पर जमे प्रभाव का सूचक भी है. हमें आज के बाज़ार और डालर की राजनीति पर दो नज़रिए से चर्चा करने की जरूरत है. पहला तो यह कि आज भारतीय मुद्रा यानी रूपए की कीमत डालर के मुकाबले इतनी कम क्यों हुई?; और दूसरा क्या डालर की राजनीति हमें अपनी विकास की परिभाषा और प्राथमिकताओं के बारे में कुछ सोचने के लिए मजबूर नहीं करती है?  मूलतः मैं यह मानता हूँ कि आर्थिक विकास और वृद्धि दर की परिभाषा एक तरह की सट्टेबाजी है. इस विकास में जो अस्तित्व में नहीं होता है, उसकी कीमत तय कर दी जाती है, कीमत बढ़ा दी जाती है और गिरा या कम कर दी जाती है. इसे सभ्य भाषा में वे शेयर बाज़ार और फ्यूचर ट्रेडिंग भी कहते हैं. जरा सोचिये, एक कंपनी स्टील बनाती है. उसके शेयर का भाव कल 100 रूपए था. आज 70 रूपए हो जाता है. एक दिन में क्या उसका उत्पादन इतना कम हो गया कि उसकी कीमत 30 फीसदी कम हो गयी? वास्तव में उसके उत्पादन या सेवा कीमत का पैमाना नहीं है. ये तो सट्टेबाज़ (आप ट्रेडर कह सकते हैं) तय करते हैं कि कंपनियों के कीमतों में क्या हेर-फेर हो. एक दिन में न तो देश में सेवा या वस्तु का उत्पादन बढ़ जाता है, न ख़त्म हो जाता है. पर अखबार की सुर्ख़ियों में एक शीर्षक होता है – निवेशकों के डेढ़ लाख करोड़ रूपए डूबे! यह किसी को पता नहीं होता कि ये डूब कर कहाँ गए?  हम ऐसे बाज़ार और उसमे होने वाले आर्थिक व्यवहार से देश की स्थिति, सुरक्षा और संभावना का आंकलन करते हैं. मैं अर्थशास्त्री नहीं हूँ और अपने अर्थशास्त्रियों को देख कर कभी होना भी नहीं चाहूँगा. मैं बहुत कुछ नहीं जानता हूँ इसलिए मेरे सवाल बहुत साधारण और बुनियादी से सवाल है. वर्ष 1991 में हमने एक देश के रूप में तय किया था कि भारत को हमें आर्थिक महाशक्ति बनाना है. इसका मतलब यह था कि लोगों के पास पैसा हो, साधन हों, सम्पन्नता हो. इन 22 वर्षों में देश में लोगों के पास पैसा आया, ऐसा अर्थशास्त्री बताते हैं. पैसा आया तो लोगों ने कारें खरीदीं. कईयों ने एकाध नहीं चार-पांच कारें ले लीं. वे हवाई जहाज़ में सफ़र करने लगे. बाहर कितनी ही गर्मी हो, एयर कंडीशनर से उनके हरम ठंडे रहने लगे. जंगल काट कर वहां कारखाने लग गए. लोगों ने अपने घरों में खूब सारी लाइटें भी लगा लीं. हम भारतीय हैं और भारतीय लोग सोने से खूब प्यार करते हैं, तो उन्होने खूब सोना भी खरीदा. जब पैसा आया तो यह तो किया ही जाना चाहिए न! अब ऐसा करेंगे तो पेट्रोल और डीज़ल खूब चाहिए. यह हमारे यहाँ ज्यादा नहीं होता है और हम आयात करते हैं. आपके धनवान होने के बाद हमारा पेट्रोलियम आयात 4 गुना बढ़ गया. इस आयत के लिए हम जो भुगतान करते हैं, वह रूपए में नहीं डालर में होता है. पहले, जब डालर 25 रूपए का था तब हम एक बेरल तेल के लिए 60 डालर यानी 1500 रूपए देते थे, जब डालर 60 रूपए का हो गया तो हम एक बेरल तेल के लिए डालर उतना ही चुकाते हैं पर रूपए में 3600 रूपए चुकाते हैं. इसी दौर में तेल कीमत भी बढ़ गयी तो हम 6500 रूपए चुका रहे हैं. अब सरकार दुखी है कि पेट्रोलियम आयात पर हमें 1 लाख करोड़ रूपए सरकारी खजाने से तो खर्च करना ही पड़ रहे हैं, साथ में भारत सरकार के खजाने में रखा डालर भी कम हो रहा है.


वृद्धि दर 8 और 9 प्रतिशत हो गयी तो हमने सोना भी खूब खरीदा. एक साल में 200, 300, 400 टन सोना हमने खरीदा. अब सोना भी हम पैदा नहीं करते हैं. यह भी आयात किया जाता है. जब आयात होगा तो और डालर खर्च होगा. हो भी रहा है. अब सरकार दुखी है कि आयात बढ़ रहा है और अपना डालर जा रहा है. अब हम विदेशी फल जैसे कीवी खाते हैं, विदेशी परफ्यूम लगाते हैं, विदेशी शराब पीते हैं, कपडे भी विदेशी पहनते हैं, क्योंकि हमने 8 और 9 प्रतिशत की दर से आर्थिक विकास किया है. इसके लिए फिर आयात होता है और डालर जाता है. इस सब पर हम 2 लाख 2 हज़ार करोड़ रूपए के बराबर के डालर खर्च करते हैं. हमारा चालू खाता घाटा मार्च 2013 में 88 अरब डालर का था, जिसे सरकार 70 अरब डालर पर लाना चाहती है. 18 अरब डालर की इस बचत के लिए अब कहा जा रहा है कि सुधार के बड़े कदम उठाए जाएँ. ये बडे कदम क्या हैं? पहला – पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें बढ़ाना, विनिवेश (यानी सरकारी उपक्रमों में से सरकारी हिस्सेदारी) को बेंचना, खुदरा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए नियमों को और कमज़ोर करना, वेदांत सरीखी कंपनियों को जमीन और जंगल के अधिग्रहण में मदद करना यानी लोगों को बलपूर्वक तरीके से विस्थापित करना और एक बार फिर बड़ी कम्पनियों को सरकारी खजाने से राहत पैकेज देना.  यादी रखिये की भारत के मौजूदा राजनीतिक माहौल में इनमे से कोई भी कदम उठाना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा है इसलिए बाज़ार में मंहगाई और अनिश्चितता का माहौल बनाया जा रहा है ताकि सुधार के इन तथाकथित क़दमों की खिलाफत का माहौल न बने. आशंका है कि मौजूदा आर्थिक हालातों का फायदा यह सरकार जरूर उठाएगी. हम सब को पता है कि संसद में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक और भूमि अधिग्रहण का विधेयक अटके हुए हैं ये दोनों विधेयकों का क़ानून बनना देश के लिए कितना जरूरी है, यह बहस का मामला है, पर राजनीतिक खेल के लिए जरूरी है. आज जिस तरह का माहौल बना दिया गया है उससे यह लगता है कि इन विधेयकों को पारित होने से रोकने के लिए माहौल बनाया गया लगता है. खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, परमाणु उर्जा के लिए संयंत्र लगाने और भीमकाय कारपोरेटों को चूना पत्थर, कोयले, बाक्साईट और धातुओं के खनन को खुली छूट देने के लिए भी यह माहौल बनाया गया है. भारत में मंदी इसलिए आई क्योंकि विदेशी निवेशक अपना पैसा निकाल रहे हैं; क्या भारत के किसानों, लघु उद्द्योग और स्थानीय सेवा क्षेत्र का कोई महत्व नहीं रहा?  हम खाद्यान्न उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर हैं, हमारे यहाँ अब खूब डाक्टर हैं, हम यदि खेती क्षेत्र और लघु उद्योगों को सच्चा संरक्षण दे दें, तो डालर की कोई जरूरत नहीं पडेगी. संकट सरकार की नैतिकता और मानसिकता का है, जो गुलामी को विकास मानती है और स्वाबलंबन को पिछड़ापन. अब हमें खुद तय करना है कि कौन से संकट से कैसे निपटना है?