Sunday, 8 September 2013

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून की राजनीतिक अर्थव्यवस्था



सचिन कुमार जैन

भारत की संसद ने खाद्य सुरक्षा को एक अधिकार के रूप में मान्यता देकर एक ऐतिहासिक काम किया है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून (२०१३) बनने का मतलब है सरकार का भुखमरी, कुपोषण और खाद्य असुरक्षा की स्थिति में जवाबदेय बन जाना. हालांकि हमें यह स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि अब भी खाद्य सुरक्षा या भुखमरी से मुक्ति भारतीय संविधान के तहत मौलिक अधिकार नहीं है. इसलिए दूर की ही सही पर यह आशंका बनी रहेगी कि इस क़ानून को कभी भी ख़त्म भी किया जा सकता है. इस क़ानून पर चली बहसों में जो पक्ष उभरे उन्हे तीन वर्गों में रखा जा सकता है; एक वर्ग जो यह मानता है कि सरकार ने बहुत लम्बे समय के बाद एक अच्छा क़ानून बना दिया है और इसमे अनाजों के अधिकार के जो प्रावधान किये गए हैं उनसे भुखमरी मिट जायेगी; दूसरा वर्ग यह मानता है कि क़ानून बहुत जरूरी कदम था और है, परन्तु इसके किये गए प्रावधान भुखमरी और खाद्य असुरक्षा के मूल कारणों से लडने के मामले में कमज़ोर हैं. यानी किसानों, प्राकृतिक संसाधनों, उन आर्थिक नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा न होना, जो असमानता बढ़ा रही हैं, के बारे में ईमानदार पहल नहीं करता है. वे यह भी मानते हैं कि इस क़ानून में जिस खाद्य सुरक्षा की बात की गयी है, उसमे पोषण की सुरक्षा का कोई स्थान नहीं है. तीसरा वर्ग कहता है कि सरकार राजनीतिक लाभ के लिए १.२५ लाख करोड़ रूपए रियायत (सब्सिडी) के रूप में बर्बाद कर रही है. इस कदम से आर्थिक विकास के लिए जरूरी सुधार (जिनमे जनकल्याणकारी कार्यक्रमों पर सरकारी खर्चा और सब्सिडी कम करने के कदम उठाये जाते हैं) की प्रक्रिया को आघात पंहुचेगा. वे यह माने को तैयार नहीं हैं कि देश में मौजूदा कुपोषण और खाद्य असुरक्षा के कारण हो रहा आर्थिक विकास खोखला है.  यह कहना भी गैरवाजिब है कि इस कानों पर होने वाले व्यय से कोई रचनात्मक लाभ नहीं होगा. लोगों को देने के लिए अनाज तो किसानों से ही खरीदा जाएगा न! इससे किसानों को साल भर में ८० हज़ार करोड़ रूपए का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलेगा. हमें इस तरह की कई सच्चाईयों को समझना होगा.
इस बहस में उभरे कई सवाल बहुत महत्वपूर्ण भी हैं. सार्वजनिक वितरण प्रणाली में फैले हुए भ्रष्टाचार (अध्ययनों के आधार पर माना जाता है कि लगभग ३५ प्रतिशत संसाधन भ्रष्टाचार की भेट चढ़ जाते हैं) को ख़त्म किये बिना इस क़ानून के तहत दिए गए अधिकार लोगों तक पनुच पायेंगे, इस पर शंका बरकरार है; क्योंकि हाल ही में बने क़ानून में भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा देने के लिए बहुत कमज़ोर प्रावधान हैं. यह एक सच्चाई है, पर इस आधार पर यह तर्क देना कि सरकार को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून नहीं बनाना चाहिए था, बहुत हे गैर-वाजिब तर्क था. बेहतर होता यदि पीडीएस, मध्यान्ह भोजन और आंगनवाडी जैसे कार्यक्रमों में ढांचागत विकास, उनकी गुणवत्ता बढाने और उनकी सामुदायिक निगरानी के लिए स्पष्ट और ठोस प्रावधान किये जाने के लिए सरकार पर और दबाव बनाया जाता. लोकसभा और राज्यसभा में इस विधेयक पर हुई बहसों में इन सभी पहलुओं पर बात हुई, पर वह आखिर में औपचारिकता साबित हुई. विपक्ष ने भी सरकार को कमज़ोर क़ानून बनाने में समर्थन दिया. बार बार यह प्रचारित किया जा रहा है कि सरकार को इस क़ानून के क्रियान्वयन के लिए सवा लाख करोड़ रूपए का नया आवंटन करना पड़ेगा; पर यह झूठा प्रचार है. वास्तव में सरकार वैसे ही ९७ हज़ार करोड़ रूपए इस पर खर्च कर रही है. उसे क़ानून के क्रियान्वयन के लिए नयी व्यवस्था बनाने (जैसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा आयोग, पीडीएस का कम्प्यूटरीकरण आदि) पर २५ हज़ार करोड़ रूपए का नया आवंटन करना होगा. यह खर्च बिना क़ानून बनाए भी होना ही था क्योंकि पीयुसीएल बनाम भारत सरकार के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी सरकार को पीडीएस में ढांचागत बदलाव की व्यवस्था बनाने के आदेश दिए हैं. इसके अलावा एकीकृत बाल विकास परियोजना यानी आंगनवाड़ी और स्कूल में मध्यान्ह भोजन योजना भी पहले से ही चल रही है. सभी महिलाओं के लिए मातृत्व हकों (छह माह के लिए १००० रूपए प्रतिमाह की राशि का प्रावधान) की व्यवस्था एक नया और महत्वपूर्ण कदम है ताकि गर्भावस्था से लेकर प्रसव के बाद कुछ महीनों तक स्त्री को आराम, पोषण आहार और जरूरी स्वस्थ्य सेवाएँ मिल सकें. मातृ मृत्यु अनुपात, नवजात शिशु मृत्युदर और बाल मृत्यु दर को कम करने और बच्चों-महिलाओं में कुपोषण को रोकने के लिए यह अत्यंत जरूरी कदम माना जाना चाहिए.  एक तरफ तेज़ी से हो रहा आर्थिक विकास और दूसरी तरफ कुपोषण का ऊँचे स्तर पर बने रहना; ये विरोधाभासी स्थिति है. कुछ लोग सम्पन्न होते जाएँ और हर दो में एक बच्चे का शारीरिक-मानसिक विकास अवरुद्ध रहे; यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र के चारित्रिक पतन की सूचक मानी जा सकती है. सरकार की जिम्मेदारी थी कि वह इस स्थिति के सन्दर्भ में अपना पक्ष स्पष्ट करे.
डेनमार्क, स्वीडन ऐसे देश हैं, जहाँ वे अपने सकल घरेलु उत्पाद के अनुपात में ४० से ५० प्रतिशत तक कर राजस्व इकठ्ठा करते हैं; भारत में यह स्तर २० प्रतिशत से नीचे है. इतना ही नहीं सरकार आर्थिक विकास के नाम पर लगभग ६ लाख करोड़ रूपए (कुल करों के बराबर की राशि) की छूट दे देती है. इससे हमारे राजस्व आधे रह जाते हैं. बेहतर होगा कि इन दो बिन्दुओं पर ठोस काम करके वह अपना राजस्व बढाए.   भ्रष्टाचार को ख़त्म करने और नव उदारवादी नीतियों के विलासितापूर्ण खर्चों (जैसे कामनवेल्थ खेलों पर ५७ हज़ार करोड़ रूपए का व्यय) को रोकने की दिशा में हमारे उन नीतिनिर्माताओं और विद्वानों की आवाज़ नहीं निकलती है जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून बनाए जाने का खूब विरोध कर रहे थे; आखिर क्यों? यह प्रतिबद्धताओं में अंतर का प्रमाण है.
 वास्तव में अन्तर नज़रियों और प्रतिबद्धताओं का ही है. नव-पूंजीवादी नजरिया मानता है कि इस क़ानून पर होने वाला खर्चा रियायत या सब्सिडी है, जो कभी वापस नहीं आएगी, जबकि हमें मानना यह चाहिए कि गरीबी, कुपोषण और वृद्धिबाधित बचपन की चुनौती से जूझ रहे भारत के लिए यह दीर्घावधि के विकास के लिए किया गया निवेश है. भुखमरी-कुपोषण से मुक्त होकर ही हम समतामूलक विकास कर सकते हैं. आक्सफोर्ड की अर्थशास्त्री सबीना अलकेर ने द हिन्दू में अपने लेख में लिखा कि भारत में दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में सबसे ज्यादा वृद्धिबाधित (स्टनटेड) यानी गहरे जड़ें जमा चुके कुपोषण से ग्रसित बच्चे हैं, फिर भी भारत सामजिक संरक्षण पर  माध्यम आय वाले एशियाई देशों की तुलना में आधा ही खर्चा करता है; एशिया के उच्चा आय वाले देशों की तुलना में तो भारत का सामाजिक संरक्षण पर व्यय महज २० फीसदी है. माध्यम आय वाले एशियाई देश सामाजिक संरक्षण पर अपने सकल घरेलु उत्पाद का ३.४ प्रतिशत व्यय करते हैं, जबकि भारत १.७ प्रतिशत व्यय करता है. हम इस स्तर पर भी महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) के व्यय के कारण पंहुचे हैं. उच्च माध्यम आय वाले एशियाई देश जीडीपी का औसतन ४ प्रतिशत सामाजिक संरक्षण पर व्यय करते हैं, जबकि उच्च आय वाले देश १०.२ प्रतिशत खर्च करते हैं. जापान १९.२ प्रतिशत, चीन ५.४ प्रतिशत; यहाँ तक की सिंगापुर भारत से दुगना यानी ३.५ प्रतिशत खर्च सामाजिक संरक्षण के लिए करता है.

एक तबका मानता है कि मनरेगा और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून जैसे क़दमों से लोग आलसी हो रहे हैं और श्रम की कमी होने के कारण खेती और उद्योग नकारात्मक रूप से प्रभावित होंगे; सच तो यह है कि इन क़दमों से असंगठित क्षेत्र में होने वाला शोषण कम होगा. यह क़ानून भुखमरी और कुपोषण की समस्या को जड़ों से नहीं हटाएगा पर इससे एक प्रक्रिया की शुरुआत जरूर होगी.


राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा – विधेयक से क़ानून के बीच की राजनीति


सचिन कुमार जैन

भारत के लिए 26 अगस्त 2013 का दिन कुछ मायनों में महत्वपूर्ण लगता है। लोकसभा में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक इसी दिन पारित हुआ। क़ानून बनने के बाद यह देश की 67 प्रतिशत जनसंख्या को अनाज की सीमित सुरक्षा प्रदान करेगा। इस क़ानून को प्रभावी बनाने के लिए 318 संशोधन प्रस्तुत किए गए थे। एक दिन में साढ़े नौ घंटे की बहस को देखें तो पता चलता है कि खाद्य सुरक्षा के अन्तर्निहित पहलुओं को आर्थिक मजबूरियों का नाम देकर खारिज किया गया है। यह दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि 22 साल तक अर्थव्यवस्था के कारपोरेटीकरण और संसाधनों की लूट की नीतियों ने बुनियादी रूप से देश का भला नहीं किया है और आज भी हमें भुखमरी से निपटने के लिए एक करुणामयी क़ानून बनाने की जरूरत है। नए क़ानून में राज्य सरकारें केंद्र की उपनिवेश होंगी, क्योंकि उन्हे केवल क्रियान्वयन का काम करना है। नीति और व्यवस्थागत निर्णय का अधिकार केंद्र के पास रहेगा। 359 में से 250 सांसद राज्य सरकारों के अधिकार सीमित रखने के पक्ष में थे। राज्य सभा में तो विपक्ष ज्यादा ताकतवर था, परन्तु वहां भी उसने रणनीतिक विरोध ही दर्ज करवाया. यदि वह चाहता तो क़ानून का स्वरुप कुछ बेहतर हो सकता था.
हम सब लोग कुछ भूल गए हैं। खाद्य सुरक्षा अब भी एक कानूनी हक है, संवैधानिक हक नहीं। मतलब यह कि इस हक के अस्तित्व पर राजनीतिक बेईमानी की तलवार हमेशा लटकती रहेगी। आइए, इस परिदृश्‍य में हम नए सिरे से इस विधेयक और उसकी राजनीति को समझने की कोशिश करते हैं।
1. खाद्य सुरक्षा के मामले में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली वाली व्यवस्था (कुछ को लाभ मिले और कुछ इससे बाहर किये जाएं) को खत्म करते हुए इसे सार्वभौमिक किया जाना जरूरी था। अब जबकि लोकसभा में विधेयक पारित हो गया है, सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि इस 67 प्रतिशत जनसंख्या का चयन कैसे किया जायेगा। सरकार 15 साल में यही तय नहीं कर पाई कि ये गरीब कौन हैं? सरकार इतनी सी बात नहीं समझ पायी कि सभी को क़ानून के दायरे में लाने के बाद भी 30 प्रतिशत मध्यमवर्ग इस क़ानून के तहत पांच किलो अनाज लेने राशन दुकान पर नहीं जाता। उसे तो ऊंची गुणवत्ता का गेंहूं और चावल चाहिए। इसका मतलब यह कि वास्तव में 70 प्रतिशत जनसंख्या पर ही सरकार का व्यय होता। दूसरी तरफ इसका फायदा यह होता कि क़ानून के पात्र 67 प्रतिशत लोगों की पहचान (जिन्हें खाद्य असुरक्षित माना जायेगा) के मानक और पहचान की प्रक्रिया तय करने में होने वाली विसंगतियों से बचा जा सकता था। सरकार ने इस संशोधन को नहीं माना।
2. यह बात महत्त्व की है कि सरकार ने एकीकृत बाल विकास परियोजना (अब आंगनवाड़ी का पोषण आहार कार्यक्रम भी इसके दायरे में है) के तहत खाने के लिए तैयार (रेडी टू ईट) पोषण आहार के प्रावधान को हटा दिया है। इसमें बड़ी कंपनियों को पैकेटबंद भोजन बेचने का धंधा देने की बात थी। लेकिन इसके साथ ही जीएम तकनीक आधारित खेती और खाद्य सुरक्षा के सीधे अधिकार के बदले नकद हस्तांतरण के प्रावधान को ज्यों का त्यों रखा है. 
3. लोकसभा ने जिस विधेयक को पारित किया है, उसका प्राक्कथन तो पोषण की सुरक्षा का वायदा करता है। लेकिन दालों और खाने के तेल का प्रावधान न करके इस वादे को तोड़ा गया है। राष्ट्रीय पोषण संस्थान के अनुसार पोषक तत्‍वों की कुल जरूरत का अधिकतम 40 प्रतिशत हिस्सा अनाज से मिलना चाहिए। बाकी 60 प्रतिशत भोजन के अन्य स्रोतों (दालें, फल, सब्जियां, तेल, अंडा, दूध और पशु स्रोतों से प्राप्त सामग्री आदि) से मिलना चाहिए। इस वैज्ञानिक तथ्य को क़ानून से बेदखल किया जा रहा है। इस कानून में प्रोटीन और वसा (जिनकी कमी भारत में कुपोषण का सबसे अहम कारण है) की जरूरत को पूरा करने के लिए कोई प्रावधान नहीं हैं। हम जानते हैं कि भारत अभी 50 लाख टन दालों का आयात करता है। इसी तरह 100 लाख टन खाने के तेल का भी आयात होता है। इस काम में बड़े स्तर के बिचौलिए और व्यापारी अपना हित साधते हैं। यदि सरकार तेल-दाल का प्रावधान कर देती तो ये भी सख्‍त नियमन के दायरे में आ जातीं। लिहाजा दोनों को बाहर रखा गया।  अगर इन्हे भी क़ानून में शामिल किया जाता तो मंहगाई और कम उत्पादन से लड़ने का एक आधार भी तो बन जाता. हम जानते हैं कि शरद पवार हमेशा से बाज़ार में खाद्य सामग्री की कीमतों को बढाने के हिमायती रहे हैं ताकि उत्पादक सीधे उपभोक्ता से वसूली करे और सरकार के संसाधनों से कार्पोरेट्स के लाभों को बढ़ाया का सके.
4. खाद्य सुरक्षा कानून राजनीतिक नज़रिए से कोई नयापन लिए है, इसमें शंका है। पूर्व के रोज़गार गारंटी क़ानून ने भी इस शंका को मजबूत ही किया, क्योंकि पहले गांव में लोगों को सरकार से रोज़गार मिलता ही नहीं था। काम मिल जाए तो मजदूरी का भुगतान कभी नहीं होता था। इसके बावजूद उनके पास कोई ऐसा रास्ता नहीं था कि वे हक की लड़ाई लड़ पाते। सूचना का अधिकार क़ानून लाने से पहले किसी को सवाल पूछने का हक था ही नहीं। वन अधिकार क़ानून का मामला भी तकरीबन ऐसा ही है, क्योंकि हर पांच में से तीन आदिवासी जंगल के अतिक्रमणकारी घोषित होते रहे और संसाधनों पर से समुदाय के हक छीने गए। अब यह क़ानून भी क्‍या कुछ नया हक दे रहा है, जो नज़र आये? इसके दायरे में शामिल हर योजना पहले से चल रही हैं। राशन की दुकान लगभग 40 सालों से चल रही है, आंगनवाड़ी और मध्यान्ह भोजन योजना भी चल रही है। राशन से पहले भी गेहूं और चावल मिल रहा था, अब भी मिलेगा। मात्रा जरूर कम हो गयी है। क़ानून की वकालत करने वाले यूपीए नेता इसमें उन तत्वों को डालना लगभग भूल गए, जो इसे ‘गेम चेंजर’ बनाता।
5. जवाबदेहिता के सवाल पर सांसद बी. महताब ने कहा कि गड़बडी़ करने वाले पर केवल 5000 रूपए जुर्माने का प्रावधान है। इसे बढ़ाकर 50,000 रूपए किया जाए। जवाबदेहिता का ढोल पीटने सांसदों का बहुमत नौकरशाही को जवाबदेह बनाने के खिलाफ था।
6. खाद्य सुरक्षा क़ानून में प्रावधान है कि युद्ध, बाढ़, सूखा, चक्रवात समेत किसी भी प्राकृतिक आपदा की स्‍थिति में सरकार खाद्य सुरक्षा का अधिकार देने के लिए बाध्य नहीं होगी। यूपीए सरकार को कोई तो समझाए कि भूख का सबसे गहरा आघात आपदा के समय ही होता है। ऐसे में क्या यह प्रावधान नैतिक रूप से सही है? निराश्रितों और बेघरबारों को एक वक्त का खाना सामुदायिक रसोई से देने के प्रस्ताव को 344 में से 245 सांसदों ने खारिज किया। भठिंडा की सांसद हरसिमरत कौर बादल ने कहा कि पंजाब की जमीन अगले 20 सालों में रेगिस्तान बन जाएगी। सोचिए, इस खतरे को नज़रंदाज़ करके बन रहा यह क़ानून कितना मज़बूत है ?

7. लोकतंत्र में संसद का निर्णय महत्त्व रखता है। लोकसभा ने इस विधेयक को पारित कर दिया है। बहस के दौरान हुई उभरे मुद्दों को अब भूमि अधिग्रहण विधेयक के साथ भी जोड़कर देखा जाना चाहिए। दोनों क़ानून अलग-अलग नज़रिए से नहीं देखे जा सकते। संसद के ज्यादातर सदस्य यह मानते हैं कि क़ानून का क्रियान्वयन उत्पादन और उपलब्धता से सीधे जुड़ा है। ऐसे में मौजूदा कृषि संसाधनों, किसानों और औद्योगिक विकास की नीतियों की समीक्षा किये बिना इसका क्रियान्वयन संभव नहीं होगा। 19 सांसदों ने जमीन, सिंचाई, खेती के पक्ष को रखा, जिसका संज्ञान लिया जाना चाहिए। अर्थशास्त्रियों और भारत सरकार के मंत्रियों का एक वर्ग राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के खिलाफ केवल इसलिए नहीं है, क्योंकि इस पर 1.30 लाख करोड़ रूपए खर्च होंगे, बल्कि वह कारपोरेट हितों पर पड़ने वाले इसके प्रभावों को लेकर घबराए हुए हैं। वे जानते हैं कि इस क़ानून के बाद जमीन अधिग्रहण, खेती की जमीन का उद्योगों या अधोसंरचना के विकास के नाम पर जमीन कर कब्ज़ा जमाने की संभावनाएं कम होती जायेंगी।