Thursday, 18 October 2012




देश की पोषण और खाद्य सुरक्षा 

अगर सरकार यह तय कर ले कि खाद्यान्न के उत्पादन की नीति में स्थानीय अनाजों के उत्पादन को प्रोत्साहन दिया जाएगा, तो गाँव के खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था अपने आप पुनर्जीवित होने लगेगी. 1960 के दशक में लायी  गयी  हरित क्रान्ति ने 300 अनाजों वाले देश को 2 अनाजों - गेहूं और चावल के बीच ला पटका; 16 तरह के दालों के बजाये केवल 5 दालों की बात होने लगी, 11 तरह के तिलहनों को कभी प्रोत्साहित ही नहीं किया गया.  यदि भारत को भुखमरी से मुक्ति दिलाने वाला विकास करना है तो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून में विविधता पूर्ण अनाजों, अलग अलग तरह की दालों के उत्पादन को प्रोत्साहित करने की हिम्मत  दिखाने की जरूरत होगी. हिम्मत इसलिए क्यूंकि इससे खाद्यान्न का व्यापार करने वाले वर्ग के बदाव से बचने की की ताकत सरकार को दिखानी होगी. यह सपष्ट है कि हम बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए इस तरह के स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहित नहीं करने की वकालत करते हैं. बेहतर होगा कि सरकार इसकी खरीदी करे और स्थानीय बाज़ार में इसका उपयोग हो. इसके बाद ही खुले बाज़ार में रागी, कोदो, कुटकी, ज्वार, मक्का का व्यापार हो. यदि सरकार विकास खंड स्तर पर अनाज के भंडारण की व्यवस्था करने की नीति बनाए और उसी स्तर पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये अनाज लोगों को उपलब्ध करवाए  तो सरकार का भंडारण और अनाज परिवहन पर होने वाला खर्चा बहुत कम हो जाएगा. इससे किसान को भी एक उम्मीदों से भरा बाज़ार मिलेगा और वह आत्महत्या के विकल्प को त्याग सकेगा. यह तय है कि भुखमरी को मिटाने के लिए सरकार को अपनी कृषि और खाद्यान्न नीति में बुनियादी बदलाव करने होंगे, इसके बिना वृद्धि के साथ भूख का ऊँचा स्तर भी बना रहेगा. 

भारत का आर्थिक सर्वेक्षण 2012 के मुताबिक़ वर्ष 2011 में भारत में अनाज का कुल उत्पादन 24.48 करोड़  टन रहा और सार्वजनकि वितरण प्रणाली. मध्यान्न भोजन योजना और आईसीडीएस जैसी खाद्यान्न योजनाओं में कुल 6.1469 करोड़  टन अनाज (यानी देश के कुल उत्पादन का 25.1 प्रतिशत) जारी किया गया. पिछले 2 वर्षों से बार बार यह तर्क (कृषि मंत्री से लेकर कारपोरेट प्रतिनिधियों तक) देते रहे हैं कि यदि एक लोकव्यापीकृत राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून लागू किया जाना इसलिए संभव नहीं है,  जिसमे संभवतः  देश की 78 प्रतिशत आबादी (जिसे पूरा पोषण प्राप्त नहीं होता है और जिनकी क्रय क्षमता भी कम है)  सस्ते राशन की अपनी जरूरत पूरी कर पाएगी, क्यूंकि इतना उत्पादन ही नहीं होता है, फिर संशोधित तर्क दिया गया कि इसके लिए तो देश का पूरा अनाज सरकार को खरीदना पड़ेगा. पर सच यह है कि यदि हर व्यक्ति को भूख और कुपोषण  से मुक्ति का अधिकार देने की मंशा है तो सरकार को केवल 55 प्रतिशत अनाज खरीदना होगा. शेष 45 प्रतिशत फिर भी बाज़ार में उपलब्ध रहेगा. 

इतना ही नहीं आर्थिक सर्वेक्षण 2012 बताता है कि 1961 में देश में दालों की शुद्ध उपलब्धता 69 ग्राम प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन थी जो वर्ष 2010-11 में घट कर 31.6 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन रह गयी. सरकार का इस पर कितना  ध्यान है वह इस बात से समझा जा सकता है कि ताज़ा स्थिति में दालों का उत्पादन करने वाली केवल 16 प्रतिशत खेत सिंचित हैं. खाने का तेल भी लोगों की आसान पंहुच में नहीं है. यह बात बड़ी चौंकाती है कि हम आज भी अपनी जरूरत का लगभग 50 प्रतिशत खाने का तेल दूसरे देशों से आयात करते हैं. और केवल 27.1 प्रतिशत तिलहन उत्पादन जमीन सिचित हो पायी है. 

इस बजट में उर्वरकों पर नकद सब्सिडी के साथ ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भी लोगों को अनाज के बजाये नकद राशि देने की व्यवस्था कड़ी करने के संकेत दे दिए गए हैं. इससे देश में उन किसानों पर बहुत गहरा असर पड़ेगा जिनसे सरकार लगभग 4 करोड़ टन अनाज की खरीदी करती है. जब लोगों को नकद देकर यह कहा जाएगा कि अब पीडीएस से नहीं फुटकर बाज़ार में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करके खड़े किये गए मॉल से अनाज खरीदो; तब सरकारी खरीद में आधी कमी आ जायेगी. दूसरा संकट यह है कि गरीब परिवारों में नकद जाने से संभावना यह है कि वह राशि अनाज पर खर्च न होकर अन्य जरूरतों पर खर्च हो जा सकती है और संभव है कि पितृसत्तात्मक समाज में, जहाँ धन और पूँजी पर पुरुष  का नियंत्रण रहता है, वहां यह लाभ महिला तक पंहुच ही न सके. 

इसके दूसरी तरफ सरकार ने एक ऐसे  राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून  की बुनियाद  रखने  की ठानी  है जो अपनी कमजोरियों  के कारण न तो भुखमरी और कुपोषण  मिटा  पायेगा, न ही ससाधनों का सही उपयोग!   इसमें भी वही गरीबी की रेखा का जाल बुना गया है, जबकि हर कोई जानता है कि योजना आयोग की गरीबी की परिभाषा 42 करोड़ लोगों को गरीबी के रेखा की पात्रता से वंचित कर देती है. एक बार फिर से सरकार ने यही कहा है कि वह इस क़ानून के तहत केवल गेहूं और चावल और थोडे बारीक अनाज की देगी; जबकि विज्ञान यह कहता है कि केवल अनाज से पोषण की असुरक्षा दूर नहीं हो सकती है. जरूरी है कि इसमे खाने का तेल और दालों का भी प्रावधान भी किया जाए. मौजूदा अर्थ व्यवस्था के पैरोकार बार बार यह कहते दिखाई देते हैं कि इस पर 1.15 लाख करोड़ रूपए खर्च होंगे, और इस तरह की रियायत पर कर देने वालों का पैसा क्यों खर्च किया जाना चाहिए? वे यह भूल जाते हैं कि इन लोगों को गरीब और भुखमरी का शिकार बनाने में हमारी नीतियों और उन नीतियों का फायदा उठाने वालों की सबसे केन्द्रीय भूमिका रही है. वित्तमंत्री जी ने अपने बजट भाषण में  राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून  के सन्दर्भ में यह संकेत दे दिए हैं कि यह क़ानून सभी कोखाद्य सुरक्षा नहीं देगा और बीपीएल का जाल बना रहेगा. इतना ही नहीं, उन्होंने इसमें दालों और खाने के तेल का प्रावधान किये जाने के कोई संकेत नहीं दिए. मतलब साफ़ है कि सब्सिडी कम रखने के लक्ष्य को हासिल करने का दबाव एक कमज़ोर खाद्य सुरक्षा क़ानून की बुनियाद रखेगा. सार्वजनिक वितरण प्रणाली सहित खाद्य सब्सिडी पर वर्ष 2011-12 में 72823 करोड़ रूपए के खर्च का अनुमान है, और वर्ष 2012-13 के लिए प्रणब दादा ने 75 हज़ार करोड़ रूपए का प्रावधान किया है. अच्चा होता यदि  वे यह कहते कि इस क़ानून के जरिये हम देश के किसानों को भी संरक्षण प्रदान कर पायेंगे. यदि वे यह महसूस कर पाते तो उन्हें सब्सिडी के बोझ के कारण अनिद्रा का सामना नहीं करना पड़ता.  

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सरकार कृषि को टुकड़ों-टुकड़ों में बाँट कर काम करती है और एक नज़रिए के बजाये योजनायें बना कर एक खाना पूर्ती करती रही है. उसे अहसास है कि इसे समग्रता में देखने से कारपोरेट केन्द्रित विकास की उसकी नीतियाँ धराशायी हो जायेंगी. कुछ ख़ास समास्याएं यह हैं - कृषि को गाँव आधारित अर्थव्यवस्था की धुरी के रूप में नहीं देखा जा रहा है. कुछ व्यावसायिक खाद्य वस्तुओं के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रीय कृषि विकास योजना चलाई गयी. इसमें वर्ष 2010-11 में 6755 करोड़ रूपए और वर्ष 2011-12 में 7860 करोड़ रूपए का प्रावधान था; इसे अब बढ़ा  कर 9217 करोड़ रूपए कर दिया गया है. जरूरत यह है कि गाँव में इस तरह का ढांचागत विकास किया जाए जिससे हर तरह के उत्पादन और कृषि गतिविधियों को समग्रता में संरक्षण मिले. इस योजना में यदि आप बारीक अनाज उगाना चाहते हैं तो आपको कोई सहयोग नहीं मिलेगा, इसके लिए दूसरे 25000 गाँव चुने गए हैं! इसी तरह  7 राज्यों में  धान के उत्पादन के लिए 400 करोड़ रूपए का आवंटन हुआ था, वह अब बढ़ कर 1000 करोड़ रूपए हो गया है. दालों के उत्पादन को बढ़ावा देने की जरूरत थी, इसके लिए साठ हज़ार गाँव  के लिए 300 करोड़ रूपए दिए गए थे, एक गाँव के लिए केवल 50000 रूपए! भारत में तिल, मूंगफली और नारियल का तेल न केवल खाने का स्वाद बढाता रहा है बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी योगदान करता रहा है. अब इन्हें कोई संरक्षण नहीं है, सरकार पाम  तेल को प्रोत्साहित कर रही है जिससे नारियल उत्पादक संकट में आये हैं.  

सरकार ने यह कोई व्यवस्था नही की है कि किसान घाटे में न रहे और और उसे किन्ही भी परिस्थितियों  में एक निश्चित आय प्राप्त हो.  सरकार खेती के लिए फुटकर में बजट प्रावधान कर चुकी है, परन्तु बाज़ार में बड़े-बड़े कारपोरेट लाकर खड़े कर रही है. किसान बहुराष्ट्रीय  कंपनियों से  प्रतिस्पर्धा कर नहीं पायेंगे. बेहतर होता यदि बाज़ार भी किसानों के लिए सहज और बराबरी की प्रतिस्पर्धा वाला बनाया जाता. प्रणव दा ने कर दिया है कि फुटकर में प्रत्यक्ष  विदेशी निवेश तो होगा ही. ताज़ा आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक़ सरकार मानती है कि खुदरा और किराना क्षेत्र में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश से ही सभी संकटों का निराकरण होगा; पर सच यह है कि इससे आजीविका, खाद्य सुरक्षा की स्थानीय व्यवस्था, उत्पादन की विविधता का समुदाय आधारित ढांचा तहस नहस हो जाएगा. तब बड़े कारपोरेट उत्पादन और वितरण की पूरी  व्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले लेंगे. 

कृषि




कृषि विकास बनाम भूख का विकास

हमारी सरकार ने रक्षा बजट 1.64 लाख करोड़ से बढ़ा कर 1.94 लाख करोड़ रूपए कर दिया और कृषि के लिए इसका केवल 10 फ़ीसदी यानी 20,822 करोड़ रूपए का ही प्रावधान किया गया है. रक्षा पर अगले 10 सालों में 49 खरब रूपए और अधौसंरचना ढाँचे पर 50 लाख करोड़ रूपए खर्च करने की मंशा सरकार ने दिखा दी है; पर कृषि, खाद्य सुरक्षा, पोषण और स्वास्थ्य के लिए इनके पास धन की बहुत ज्यादा कमी है.    वर्ष 2011-12 में हमारी सरकार ने अपने बजट अनुमान में 12 लाख  33 हज़ार करोड़ रूपए के व्यय का प्रावधान किया. वर्ष 2012 -13 में भारत सरकार का कुल व्यय यानी खर्चा 14,90, 925 करोड़ रूपए रहेगा.

भारत की अर्थव्यवस्था में पिछले 61 वर्षों में क्या बदलाव आया है, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है. हमें यह याद रखना होगा कि भारत की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का आधार खेती रही है, पर उसी को लगातार नज़रंदाज़ करने की प्रवर्ति सरकार ने दिखाई है. बीते वर्ष में सरकार का मानना था कि देश की वृद्धि दर 8.4 प्रतिशत से ज्यादा रहेगी, जिसमे कृषि 4 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी; पर ऐसा नहीं हुआ और इस साल में यह दर 2.5 प्रतिशत के आसपास आकर टिक गयी. इसके दूसरी तरफ व्यापार होटल, परिवहन, संचार, वित्त सेवाओं, बीमा, जमीन-जायदाद के व्यापार ने 9 से 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की.  पिछली यानी कि ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में सरकार ने कृषि क्षेत्र में  4 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया था, परन्तु यह 3.3 प्रतिशत रहा. हमारी सरकार ने रक्षा बजट 1.64 लाख करोड़ से बढ़ा कर 1.94 लाख करोड़ रूपए कर दिया और कृषि के लिए  इसका केवल 10 फ़ीसदी यानी 20822 करोड़ रूपए का ही प्रावधान किया गया है. रक्षा पर अगले 10 सालों में 49 खरब रूपए और अधौसंरचना ढाँचे पर 50 लाख करोड़ रूपए खर्च करने की मंशा सरकार ने दिखा दी है; पर कृषि, खाद्य सुरक्षा, पोषण और स्वास्थ्य के लिए इनके पास धन की बहुत ज्यादा कमी है.   हर रोज़ 2000 किसान खेती छोड़ रहे हैं और हर आधे घंटे में एक किसान बदहाली के  कारण आत्महत्या कर  लेता है. 

खेती भारत में रोज़गार के नज़रिए से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र  तो है ही, साथ ही हमारी खाद्य सुरक्षा के लिए उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है. एक तरफ तो पिछली पंचवर्षीय योजना में यह कहा जा रहा था कि हम 7.94 प्रतिशत की दर से आगे बढे; परन्तु हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को यह कहने में कोई हिचक नहीं कि देश के 6.5 करोड़ बच्चे भुखमरी के शिकार हैं और वे उसे राष्ट्रीय शर्म का खिताब देते हैं. आखिर क्यों है यह भुखमरी हमारे देश में? वित्तमंत्री जी ने देश को बताया कि इस साल देश में 25 करोड़ टन अनाज का उत्पादन होगा, जो कि एक नया रिकार्ड भी होगा. 1951 में हम 5 करोड़ टन अनाज उत्पादन कर रहे थे, अब यह 5 गुना बढ़ चुका है. दुखद यह है कि हमारी सरकार रोटी के मामले में ही हमें आंकड़ों की बाजीगरी दिखाती है.   यह बिलकुल विश्वास नहीं किया जान चाहिए कि कृषिविहीन विकास देश में खाद्य सुरक्षा लाएगा. आज़ादी के बाद 1961 में यहाँ प्रतिव्यक्ति अनाज की उपलब्धता 399.7 ग्राम थी. जब खुले बाज़ार की नयी नीतियां लागू की गयीं तब यह उपलब्धता 468.5 ग्राम थी; परन्तु उसके बाद इसमें लगातार गिरावट होती रही या कोई वृद्धि ही नहीं हुई. वर्ष 2010-11 में देश में प्रतिव्यक्ति अनाज की उपलब्धता 407 ग्राम प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन रही. यह किस तरह का विकास है जिसमे हम वर्ष 1961 की स्थिति में ही खड़े हुए दीखते हैं. 

देखिये; हमें यह मान लेना होगा की सरकार जिस क्षेत्र को प्रोत्साहन देने की नीति बना लेती है, वह क्षेत्र आगे बढ़ता है. सरकार ने खेती पर सबसे ज्यादा चिंता जाहिर की होगी पर पर सबसे कम कदम उठाये हैं और खेती के संकट को ख़त्म करने के लिए जो बुनियादी कदम उठाने की जरूरत थी, उनसे वह हमेशा बचती रही है. वर्ष 1950-51 में देश के सकल घरेलु उत्पाद में खेती का योगदान 53.1 प्रतिशत का था  जो इस साल घट  कर 13.9 प्रतिशत के स्तर पर आ गया; इसके विपरीत तब सेवा का क्षेत्र 30.3 प्रतिशत का योगदान कर रहा था, उसका व्यापार इतना बढ़ाया गया कि आज वह जीडीपी में 59 प्रतिशत का योगदान दे रहा है. सरकार का मानना है कि अभी देश की 56 फ़ीसदी जनसँख्या खेती पर निर्भर है, हमें उसे वहां से निकाल कर दूसरे क्षेत्रों में लेकर जाना है. मकसद यह भी है कि बढ़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ और कारपोरेट घराने हज़ारों हेक्टेयर की जमीन के मालिक बन कर खेती का व्यापार करें. इसके लिए किसानों के सामने बदहाली के हालात खडे करना ही होंगे. यही कारण है कि भारत में अभी भी हर आधे घंटे में एक किसान आत्महत्या कर ले रहा है. सरकार का मानना है कि अब किसी भी क्षेत्र को सब्सिडी या रियायत देना सही नीति नहीं है. इससे खुले बाज़ार में प्रतिस्पर्धा का सही वातावरण नहीं बनता है. बाज़ार में आर्थिक लाभ कमाने के लिए यूद्ध कर रही कम्पनियाँ खेती का व्यापार तब तक नहीं कर सकती थीं, जब तक कि सरकार किसानों को सब्सिडी दे रही थी; इसीलिए लगातार किसानों और  किसानी के लिए दी  जाने वाली सब्सिडी को ख़त्म किया गया. इसी साल से बारहवीं पंचवर्षीय (2012-16) का कालखंड भी शुरू हो रहा है जिसमे सब्सिडियों को खत्म करने की प्रक्रिया को और तेज़ किया जाएगा. इस योजना के पहले ही बजट में प्रणब दादा ने उर्वरकों पर दी  जाने वाली सब्सिडी को नकद हस्तांतरण में बदल दिया. इसका मतलब यह है कि किसान को सरकार एक तयशुदा राशि दे देगी और किसान को उर्वरकों का बाज़ार मूल्य चुका कर खेती की सामग्री खरीदना होगी. अब उर्वरक कम्पनियाँ अपने उत्पाद की कीमत निर्धारित करेंगी और किसान से वसूल करेंगी. दुसरे तरीके से सरकार की सब्सिडी का लाभ उर्वरक कम्पनियाँ उठाएंगी. गाँव और किसानों को बिजली देने के लिए 18 राज्यों ने भारी कर्जे लिए हुए हैं. जब इन कर्जों को चुकाने के बारी आएगी तो सरकार किसानों से ही उसे वसूल करेगी और सन्देश देगी कि हमने तो आप ही के लिए कर्जा लिया था अब चुकाने के लिए बिजली की कीमतें तो बढ़ाना ही पड़ेंगी. 
अभी खाद्यान्न, पेट्रोलियम उत्पादों और उर्वरकों पर दी जाने वाली सब्सिडी  देश के जीडीपी  के  2.5 प्रतिशत के बराबर है. इसके अगले तीन वर्षों में 2 प्रतिशत पर और इसके बाद 1.75 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य 12वीं पंचवर्षीय योजना में है. इसका मतलब है कि पेट्रोल-डीज़ल, उर्वरकों की कीमतें बढेंगी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर से भी सरकार अपना हाथ खीचने की तैयारी में है. इस नीति से पेट्रोलियम उत्पाद महंगे होंगे, उर्वरक महंगे होंगे और राशन मंहगा होगा; कुल मिला कर मुद्रास्फीति  यानी मंहगाई   बढाने की पूरी व्यवस्था कर दी गयी है.   

खेती और किसान को संरक्षण देने के लिए केवल बीज या खाद के मसले पर कोई वायदा करने से काम नहीं चलेगा; न ही किसान आत्महत्या पैकेज इसका कोई हल है. इसके लिए कृषि की पूरी व्यवस्था - बीज, जमीन के उपचार, सही उर्वरक और कीटनाशक उपयोग, सिंचाई, बिजली की उपलब्धता से लेकर बाज़ार की उत्पादकोंमुखी व्यवस्था की रूपरेखा बनाई होगी. भारत सरकार ठीक इसके उलट नीतियां बना रही है. 

Land Rights, Madhya Pradesh



जमीन की राजनीति और राजनीति की जमीन 

सचिन कुमार जैन 

आन्ध्र प्रदेश में श्री काकुलम थर्मल पावर प्लांट का विरोध; उडीसा में पास्को का विरोध, गोवा में खनन घोटाला, बेल्लारी में भूमिगत संसाधनों की लूट, उत्तरप्रदेश में चिल्कदांड का संघर्ष और सड़कों-पावर प्लांट के नाम पर खेती की 1 लाख एकड़ जमीन की लूट की खिलाफत, हिमाचल प्रदेश में हुल -1 जल विधुत परियोजना और लुहरी परियोजना, रेणुका बाँध परियोजना का विरोध, पंजाब में कचरा आधारित प्रस्तावित बिजली घर का विरोध, राजस्थान में रावतभाटा में विकिरण रिसाव और बांसवाडा में सुपर क्रिस्तील पावर प्लांट के लिए जमीन अधिग्रहण का विरोध .....भारत में विकास के नाम पर जारी संसाधनों की विनाशकारी लूट के खिलाफ चल रहे संघर्षों की यह सूची बहुत लम्बी है। सरकार भले ही नासमझ बनती हो कि कोई विनाश नहीं हो रहा है; परन्तु लोग बखूबी समझते हैं लूट की अर्थनीति को।    क्या देश में 3000 से ज्यादा जन संघर्ष केवल मज़ाक के लिए चल रहे हैं? नहीं जनाब; लोग अपने देश और संसाधनों को बचाना चाहते हैं इसलिए लड़ रहे हैं।  दुखद यह है कि उन्हे अपनी ही सरकार, अपने ही देश के राजनीतिक दलों से लड़ना पड़  रहा है। 

परतंत्रता, प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे की विकास नीति, राजनीति और सत्ता; इन चार के बीच सीधे और पारिवारिक सम्बन्ध हैं।  भारत में 5.37 करोड़ परिवार भूमिहीन हैं और 6.1 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके पास जमीन का इतना टुकड़ा भी नहीं है कि वे अपने लिए एक खुद का घर बना सकें। ऐसे लोग जहाँ भी रहते हैं उन्हे अतिक्रमणकारी कहा जाता है। अपने ही देश में इन लोगों को परायेपन  का बार बार अहसास करवाया जाता है। 1960 के दशक में देश में विनोबा भावे की कोशिशों और भूदान आन्दोलन ने भूमि सुधार लाने वाली व्यवस्था की जरूरत को सामने रखा था। देश आज़ाद तो हो चुका था, अँगरेज़ भी चले गए परन्तु जमींदार और वर्गभेद तो वहीँ का वहीँ था। देश की 78 प्रतिशत आबादी के लिए आज़ादी का मतलब केवल अंग्रेजों के चले जाने से जुदा हुआ नहीं था। जमींदारी, बंधुआ मजदूरी, संसाधनहीनता, क़र्ज़दारी और शोषण से मुक्ति के बिना उनकी जिन्दगी में 15 अगस्त कभी नहीं आ सकता था। इसी दशक में सरकारों ने भी कहा कि देश में भूमि सुधार नीति लायी जायेगी ताकि संसाधनों ख़ास तौर  पर  जमीन का न्यायोचित वितरण हो क्यूंकि इसके अभाव में देश की दो तिहाई आबादी बंधुआ मजदूरी, क़र्ज़ और शोषण के चक्र के बाहर निकल ही नहीं सकती थी। 

वायदे किये गए, वायदे इतनी कमज़ोर थे की भारत में कई कोशिशों के बाद भी 30 सालों में केवल 3 प्रतिशत   जमीन का ही वितरण हो पाया जबकि कोरिया सरीखे देशों में 2 वर्षों में 37 प्रतिशत जमीन का वितरण हो गया। अब यदि पिछले 22 वर्षों, यानी उदारवादी आर्थिक नीतियों की काल को देखें तो पता चलता है कि जमीन बांटना किसी भी सरकार की मंशा हो ही नहीं सकती। इसी जमीन और अन्य संसाधनों की लूट पर तो देश की वृद्धि दर फल फूल रही है। 20 साल पहले जिस डी एल ऍफ़ नाम की कंपनी को कोई नहीं जानता था वह कंपनी आज 3 लाख करोड़ की पूँजी की मालिक कैसे हो गयी? क्यूंकि उसने जमीनें लूटी हैं। कर्नाटक का एक समूह है - कर्थुरी समूह। इस समूह ने अफ्रीकी देशों में 3.50 लाख एकड़ जमीन हासिल की है, जिस पर वह फूलों का व्यापार करती है और स्थानीय अफ्रीकी उसके मजदूर बन कर काम करते हैं। जमीन जिन्दगी ही नहीं सत्ता का चरित्र भी बदल सकती है; नहीं; जमीन सत्ता का चरित्र बदल ही देती है। जिसके पास जमीन होगी वही स्वतंत्र होगा, उसके ही जीवन में सम्मान होगा और एक संभावना भी कि वह परिवार भूख और कुपोषण से मरेगा नहीं। आज 5.37 करोड़ लोग भूमि हीन हैं परन्तु पिछले 20 वर्षों में 81 लाख हेक्टेयर जमीन औद्योगिकीकरण और देश के विकास के नाम पर 200 घरानों को दे दी गयी। ये 200 घराने आज भारत की सत्ता और नीति बनाने वाली व्यवस्था को नियंत्रित करते हैं। बजट पेश करने से पहले हमारे वित्त मंत्री किसानों से नहीं मिलते, वे मजदूरों से भी नहीं मिलते; परन्तु औद्योगिक संगठनों के पास जाते हैं, उनकी बात सुनते हैं और पूरा किये जाने वाला वायदा करके भी आते हैं।  सत्ता उनकी हो गयी क्यूंकि उन्होने सरकार से संसाधन मांगे, लोगों से छीने और हर तरीका अपना कर उन पर कब्ज़ा किया। 

आज जब मध्यप्रदेश के विकास की बात हो रही है तब मध्यप्रदेश सरकार ने वायदा किया है कि पूंजीपति आयें, जहाँ वे चाहेंगे उन्हे जमीन दी जायेगी और सभी सुविधाएं और स्वीकृतियां देने के लिए एकल खिड़की व्यवस्था होगी। जिस राज्य में 1 करोड़ से ज्यादा किसान परिवार हों, जो किसान आत्महत्या के मामले में पांच सबसे ऊपर वाले राज्यों में शुमार हो, जहाँ किसान इसलिए आत्महत्या कर लेता हो क्यूंकि उसे उसकी अपनी ही जमीन के खसरा खतौनी के कागज़ बिना रिश्वत दिए न मिल पाते हों और उसके खेत की नप्ती न हो पाती हो। इस काम के लिए उसे 9 अधिकारियों के सामने मिन्नतें करना पड़ती हों और हर साल 212 किलोमीटर के चक्कर सरकारी दफ्तर के लगाने पड़ते हों, उसके लिए एकल खिड़की क्यों नहीं बनती!   हाल ही में 50000 पद यात्रियों ने ग्वालियर से दिल्ली की तरफ कूच किया। मध्यप्रदेश सरकार के मुखिया और सत्ताधारी दल के मुखिया ने तत्काल जमीन के हक़ और भूमि सुधार के लिए अपने घरों से निकल दिल्ली की तरफ चल पडे जन सैलाब के राजनीतिक निहितार्थ को समझा और कहा कि मध्यप्रदेश सरकार के दायरे में जो अधिकार हैं, उनके तहत लोगों  और भूमिहीनों को जमीन के हक़ दे दिए जायेंगे। इसके पहले जब एकता परिषद् के नेतृत्व में यह यात्रा 2 अक्तूबर को ग्वालियर से शुरू हुई तब भारत सरकार के दो महत्वपूर्ण केन्द्रीय मंत्री जयराम  रमेश और ज्योतिरादित्य सिंधिया यात्रा आरम्भ स्थल पर पंहुचे। जयराम रमेश एक पत्र लेकर आये थे जिसमे यह उल्लेख था कि केंद्र सरकार सत्याग्रहियों की मांगों को पूरा करेगी; परन्तु सत्याग्रही यह मांग कर रहे थे कि इस पत्र की बातों को लागू करने के लिए सरकार की बाध्यता कैसे तय होगी; क्यूंकि वर्ष 2007 में जनादेश यात्रा के बाद भी तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री के मुख के जरिये सरकार ने भूमि सुधार नीति लागू करने के वायदे किये थे। अब लोग उनसे अनुबंध चाहते थे और लिखित में अनुबंध भी। केन्द्रीय मंत्री का कहना था कि कुछ मांगों को पूरा करने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया चलाना होगी इसलिए उन पर वायदा नहीं किया जा सकता है। अंततः केंद्र सरकार इस यात्रा को रोक न पायी। 

इसके बाद मध्यप्रदेश सरकार और सत्तारूढ़ दल ने मौके के मुताबिक़ काम किया। भारतीय जनता पार्टी ने कहा वह जन सत्याग्रह और लोगों की मांगों के साथ है और उन्हे पूरा करेगी। मुख्यमंत्री जी ने अमेरिका से सूचना प्रोद्योगिकी का उपयोग करते हुए लोगों को संबोधित किया और मध्यप्रदेश वापस आते ही सत्याग्रहियों के मिलने चले गए। अच्छा  लगा कि मुख्यमंत्री यह मानते हैं कि जमीन पर आम लोगों, आदिवासियों और किसानों का आज भी हक़ है पर उन्हे वैचारिक और कार्यशील  विरोधाभास को भी ख़त्म करना होगा। एक तरफ 50000 पैदल चल रहे सत्याग्रहियों को उन्होने प्रतिबद्धता दिखाई; पर इसके ठीक 1 महीने पहले इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर बाँध के प्रभावितों को उनके हक़ की जमीन देने के मामले में उन्होने इस तरह का सकारात्मक रुख नहीं रखा और एक तरह से आन्दोलनकारियों को अपराधी की श्रेणी में रख दिया गया। मध्यप्रदेश में पिछले 5 वर्षों से औद्योगिक निवेश ले लिए सम्मलेन हो रहे हैं। यदि मध्यप्रदेश सरकार के दस्तावेजों को ही आधार बनाएं तो 4 लाख हेक्टेयर जमीन किसानों ने उद्योगों को बेंच देने की सहमति दे दी है या कहें की बेंच दी है। इस मान से यह कहना शायद ठीक ही है होगा कि जमीन पर औद्योगिक और पूंजीवादी कब्जे के लिए माहौल बनाया जा चुका  है। इस बात का कौन जवाब देगा कि वन अधिकार क़ानून के तहत मध्यप्रदेश में आदिवासियों के 66 प्रतिशत दावे यानी 3.50 लाख दावे  निरस्त कर दिए गए। और वन पर सामुदायिक दावों को तो मानो छीन ही लिया गया है। पुनर्वास नीति कहती है कि परिवार के हर वयस्क को एक स्वतंत्र इकाई मानते हुए उनका पुनर्वास किया जाएगा और 10 लाख रूपए मुआवजा दिया जाएगा, क्यूंकि वहां उनसे जमीन, जंगल और पानी छीन लिया जाना है। इसके दूसरी तरफ डिंडोरी जिले में एक परिवार के अलग-अलग रह रहे सदस्यों, जिनका वन भूमि पर कानूनन हक़ बनता है, को एक ही इकाई माना गया। बात को थोडा स्पष्ट करता हूँ; जब पिता और 3 पुत्रों ने वन अधिकार क़ानून के तहत नियमानुसार 5-5 एकड़ जमीन पर अधिकार पत्र पाने के लिए आवेदन किये तो उन्हे कुल मिला कर 20 एकड़ जमीन देने के बजाये 5 एकड़ के अधिकार पत्र पर ही 4 हिस्से करके दे दिए। जबकि ये चारों परिवार 15 सालों से ज्यादा समय से अलग-अलग खेत जोत रहे हैं। आप बताईये, संसद का बनाया क़ानून हनी के बाद भी लोगों के अधिकार मिल रहे हैं या छिन रहे हैं! सतना के मझगवां ब्लाक में 85 एकड़ वन भूमि पर गाँव के लोगों ने दावा किया तो सबूत मिटाने के लिए वन प्रशासन ने उनकी खड़ी फसल ही तहस नहस कर दी। शिवपुरी के पोहरी विकास खंड के नोंहेटा खुर्द गाँव में वर्ष 2002 में 40 परिवारों को जमीन के पट्टे दिए गए, पर अब तक उन्हे जमीन पर कब्ज़ा नहीं मिला। यह व्यवस्था की पूरी असफलता ही है कि मालिक होने बाद भी लोगों को जमीन पर कब्ज़ा नहीं दिला पायी। 

जब उद्योगों के लिए जमीन है तो अब तक भूमिहीनों और बड़ी विकास योजनाओं के प्रभावित होने  वाले परिवारों को जमीन देने लिए क्यों नहीं मिलती। एक बात यह भी नहीं भूली जाना चाहिए कि राजनीतिक दलों की रैलियों या अभियानों में 50000 लोग बिना निवेश इकठ्ठा होते नहीं है, इसलिए राजनीतिक दलों के लिए यह विचार की भी घडी है कि लोग अब आन्दोलनों में ज्यादा विश्वास कर रहे हैं। देश के किसी भी राज्य पार्का सन्दर्भ ले लीजिये; हर कोने में छोटा या बड़ा जन आन्दोलन रूप ले रहा है। ये आन्दोलन जमीन, जंगल, पानी, पर्यावरण और सम्मान के हकों के लिए चल रहे हैं। जिस तरह राजनीतिक दल संसाधनों पर लोगों को हक़ दिलवाने के मामले में अपनी विश्वसनीयता खो रहे हैं; उस मामले में जन आन्दोलन न केवल सक्रीय हुए हैं, बल्कि उन्होने लोकतंत्र को कमज़ोर किये जाने की राजनीतिक कोशिशों पर भी सवाल उठाये हैं। इसीलिए आप यह देखेंगे कि सरकार अपनी उन विकास नीतियों से पीछे हटने के लिए बाध्य होती है, जिनका मकसद संसाधनों की लूट होता है। यह भी तय है कि जमीन, जंगल और पानी की लूट का घोटाला नयी वैकल्पिक राजनीति को जन्म देगा।