देश की पोषण और खाद्य सुरक्षा
अगर
सरकार यह तय कर ले कि खाद्यान्न के उत्पादन की नीति में स्थानीय अनाजों के उत्पादन
को प्रोत्साहन दिया जाएगा, तो गाँव के खाद्य सुरक्षा और
अर्थव्यवस्था अपने आप पुनर्जीवित होने लगेगी. 1960 के दशक में लायी
गयी हरित क्रान्ति ने 300 अनाजों वाले देश को 2
अनाजों - गेहूं और चावल के बीच ला पटका; 16 तरह के दालों के बजाये केवल 5
दालों की बात होने लगी, 11 तरह के तिलहनों को कभी प्रोत्साहित ही
नहीं किया गया. यदि भारत को भुखमरी से मुक्ति दिलाने वाला विकास करना है तो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून में विविधता पूर्ण
अनाजों, अलग अलग तरह की दालों के उत्पादन को
प्रोत्साहित करने की हिम्मत दिखाने की जरूरत होगी. हिम्मत इसलिए
क्यूंकि इससे खाद्यान्न का व्यापार करने वाले वर्ग के बदाव से बचने की की ताकत
सरकार को दिखानी होगी. यह सपष्ट है कि हम बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए इस तरह के
स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहित नहीं करने की वकालत करते हैं. बेहतर होगा कि सरकार
इसकी खरीदी करे और स्थानीय बाज़ार में इसका उपयोग हो. इसके बाद ही खुले बाज़ार में
रागी, कोदो,
कुटकी, ज्वार, मक्का
का व्यापार हो. यदि सरकार विकास खंड स्तर पर अनाज के भंडारण की व्यवस्था करने की
नीति बनाए और उसी स्तर पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये अनाज लोगों को उपलब्ध करवाए तो सरकार का भंडारण और अनाज परिवहन
पर होने वाला खर्चा बहुत कम हो जाएगा. इससे किसान को भी एक उम्मीदों से भरा बाज़ार
मिलेगा और वह आत्महत्या के विकल्प को त्याग सकेगा. यह तय है कि भुखमरी को मिटाने
के लिए सरकार को अपनी कृषि और खाद्यान्न नीति में बुनियादी बदलाव करने होंगे, इसके
बिना वृद्धि के साथ भूख का ऊँचा स्तर भी बना रहेगा.
भारत
का आर्थिक सर्वेक्षण 2012 के मुताबिक़ वर्ष 2011 में भारत में अनाज का कुल उत्पादन 24.48 करोड़ टन रहा और सार्वजनकि वितरण प्रणाली.
मध्यान्न भोजन योजना और आईसीडीएस जैसी खाद्यान्न योजनाओं में
कुल 6.1469 करोड़
टन अनाज (यानी देश के कुल उत्पादन
का 25.1 प्रतिशत) जारी किया गया. पिछले 2
वर्षों से बार बार यह तर्क (कृषि मंत्री से लेकर कारपोरेट प्रतिनिधियों तक) देते
रहे हैं कि यदि एक लोकव्यापीकृत राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून लागू किया जाना
इसलिए संभव नहीं है, जिसमे संभवतः देश की 78 प्रतिशत आबादी (जिसे पूरा पोषण प्राप्त
नहीं होता है और जिनकी क्रय क्षमता भी कम है) सस्ते राशन की अपनी जरूरत पूरी
कर पाएगी, क्यूंकि इतना उत्पादन ही नहीं होता है, फिर
संशोधित तर्क दिया गया कि इसके लिए तो देश का पूरा अनाज सरकार को खरीदना पड़ेगा. पर
सच यह है कि यदि हर व्यक्ति को भूख और कुपोषण से मुक्ति का अधिकार देने की मंशा है
तो सरकार को केवल 55 प्रतिशत अनाज खरीदना होगा. शेष 45 प्रतिशत
फिर भी बाज़ार में उपलब्ध रहेगा.
इतना
ही नहीं आर्थिक सर्वेक्षण 2012 बताता है कि 1961 में देश में दालों की शुद्ध उपलब्धता 69
ग्राम प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन थी जो वर्ष 2010-11 में घट कर 31.6 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन रह गयी. सरकार का इस पर कितना ध्यान है वह इस बात से समझा जा सकता है कि ताज़ा स्थिति में दालों का
उत्पादन करने वाली केवल 16 प्रतिशत खेत सिंचित हैं. खाने का तेल
भी लोगों की आसान पंहुच में नहीं है. यह बात बड़ी चौंकाती है कि हम आज भी अपनी
जरूरत का लगभग 50 प्रतिशत खाने का तेल दूसरे देशों से
आयात करते हैं. और केवल 27.1 प्रतिशत तिलहन उत्पादन जमीन सिचित हो
पायी है.
इस
बजट में उर्वरकों पर नकद सब्सिडी के साथ ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भी लोगों
को अनाज के बजाये नकद राशि देने की व्यवस्था कड़ी करने के संकेत दे दिए गए हैं.
इससे देश में उन किसानों पर बहुत गहरा असर पड़ेगा जिनसे सरकार लगभग 4
करोड़ टन अनाज की खरीदी करती है. जब लोगों को नकद देकर यह कहा जाएगा कि अब पीडीएस
से नहीं फुटकर बाज़ार में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करके खड़े किये गए मॉल
से अनाज खरीदो; तब
सरकारी खरीद में आधी कमी आ जायेगी. दूसरा संकट यह है कि गरीब परिवारों में नकद
जाने से संभावना यह है कि वह राशि अनाज पर खर्च न होकर अन्य जरूरतों पर खर्च हो जा
सकती है और संभव है कि पितृसत्तात्मक समाज में, जहाँ धन और पूँजी पर पुरुष का नियंत्रण रहता है, वहां यह लाभ महिला तक पंहुच ही न सके.
इसके
दूसरी तरफ सरकार ने एक ऐसे
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून की बुनियाद रखने
की ठानी है जो अपनी कमजोरियों
के कारण न तो भुखमरी और कुपोषण मिटा पायेगा,
न ही ससाधनों का सही उपयोग!
इसमें भी वही गरीबी की रेखा का जाल बुना गया है, जबकि
हर कोई जानता है कि योजना आयोग की गरीबी की परिभाषा 42
करोड़ लोगों को गरीबी के रेखा की पात्रता से वंचित कर देती है. एक बार फिर से
सरकार ने यही कहा है कि वह इस क़ानून के तहत केवल गेहूं और चावल और थोडे बारीक अनाज
की देगी; जबकि विज्ञान यह कहता है कि केवल अनाज
से पोषण की असुरक्षा दूर नहीं हो सकती है. जरूरी है कि इसमे खाने का तेल और दालों
का भी प्रावधान भी किया जाए. मौजूदा अर्थ व्यवस्था के पैरोकार बार बार यह कहते
दिखाई देते हैं कि इस पर 1.15 लाख करोड़ रूपए खर्च होंगे, और
इस तरह की रियायत पर कर देने वालों का पैसा क्यों खर्च किया जाना चाहिए? वे
यह भूल जाते हैं कि इन लोगों को गरीब और भुखमरी का शिकार बनाने में हमारी नीतियों
और उन नीतियों का फायदा उठाने वालों की सबसे केन्द्रीय भूमिका रही है. वित्तमंत्री
जी ने अपने बजट भाषण में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के सन्दर्भ
में यह संकेत दे दिए हैं कि यह क़ानून सभी कोखाद्य सुरक्षा नहीं देगा और बीपीएल का
जाल बना रहेगा. इतना ही नहीं, उन्होंने इसमें दालों और खाने के तेल का
प्रावधान किये जाने के कोई संकेत नहीं दिए. मतलब साफ़ है कि सब्सिडी कम रखने के
लक्ष्य को हासिल करने का दबाव एक कमज़ोर खाद्य सुरक्षा क़ानून की बुनियाद रखेगा.
सार्वजनिक वितरण प्रणाली सहित खाद्य सब्सिडी पर वर्ष 2011-12 में 72823 करोड़ रूपए के खर्च का अनुमान है, और
वर्ष 2012-13 के लिए प्रणब दादा ने 75
हज़ार करोड़ रूपए का प्रावधान किया है. अच्चा होता यदि वे यह कहते कि इस क़ानून के जरिये हम देश के किसानों को भी संरक्षण
प्रदान कर पायेंगे. यदि वे यह महसूस कर पाते तो उन्हें सब्सिडी के बोझ के कारण
अनिद्रा का सामना नहीं करना पड़ता.
सबसे
बड़ी चुनौती यह है कि सरकार कृषि को टुकड़ों-टुकड़ों में बाँट कर काम करती है और एक
नज़रिए के बजाये योजनायें बना कर एक खाना पूर्ती करती रही है. उसे अहसास है कि इसे
समग्रता में देखने से कारपोरेट केन्द्रित विकास की उसकी नीतियाँ धराशायी हो
जायेंगी. कुछ ख़ास समास्याएं यह हैं - कृषि को गाँव आधारित अर्थव्यवस्था
की धुरी के रूप में नहीं देखा जा रहा है. कुछ व्यावसायिक खाद्य वस्तुओं के उत्पादन
को प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रीय कृषि विकास योजना चलाई गयी. इसमें वर्ष 2010-11 में 6755 करोड़ रूपए और वर्ष 2011-12 में 7860 करोड़ रूपए का प्रावधान था; इसे
अब बढ़ा कर 9217 करोड़ रूपए कर दिया गया है. जरूरत यह
है कि गाँव में इस तरह का ढांचागत विकास किया जाए जिससे हर तरह के उत्पादन और कृषि
गतिविधियों को समग्रता में संरक्षण मिले. इस योजना में यदि आप बारीक अनाज उगाना
चाहते हैं तो आपको कोई सहयोग नहीं मिलेगा, इसके लिए दूसरे 25000 गाँव चुने गए हैं! इसी तरह 7 राज्यों में धान के उत्पादन के लिए 400
करोड़ रूपए का आवंटन हुआ था, वह अब बढ़ कर 1000 करोड़ रूपए हो गया है. दालों के उत्पादन को बढ़ावा देने की जरूरत थी, इसके
लिए साठ हज़ार गाँव के लिए 300 करोड़ रूपए दिए गए थे, एक
गाँव के लिए केवल 50000 रूपए! भारत में तिल, मूंगफली
और नारियल का तेल न केवल खाने का स्वाद बढाता रहा है बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था
में भी योगदान करता रहा है. अब इन्हें कोई संरक्षण नहीं है, सरकार
पाम तेल को प्रोत्साहित कर रही है जिससे
नारियल उत्पादक संकट में आये हैं.
सरकार
ने यह कोई व्यवस्था नही की है कि किसान घाटे में न रहे और और उसे किन्ही भी परिस्थितियों में एक निश्चित आय प्राप्त हो. सरकार
खेती के लिए फुटकर में बजट प्रावधान कर चुकी है,
परन्तु बाज़ार में बड़े-बड़े
कारपोरेट लाकर खड़े कर रही है. किसान बहुराष्ट्रीय कंपनियों से प्रतिस्पर्धा कर नहीं पायेंगे. बेहतर होता यदि बाज़ार भी किसानों के
लिए सहज और बराबरी की प्रतिस्पर्धा वाला बनाया जाता. प्रणव दा ने कर दिया है कि
फुटकर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तो होगा ही. ताज़ा आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक़ सरकार मानती है कि खुदरा और किराना
क्षेत्र में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश से ही सभी संकटों
का निराकरण होगा; पर सच यह है कि इससे आजीविका, खाद्य
सुरक्षा की स्थानीय व्यवस्था, उत्पादन की विविधता का समुदाय आधारित
ढांचा तहस नहस हो जाएगा. तब बड़े कारपोरेट उत्पादन और वितरण की पूरी
व्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले लेंगे.