कृषि विकास बनाम भूख का विकास
हमारी सरकार ने रक्षा बजट 1.64 लाख करोड़ से बढ़ा कर 1.94 लाख करोड़ रूपए कर दिया और कृषि के लिए इसका केवल 10 फ़ीसदी यानी 20,822 करोड़ रूपए का ही प्रावधान किया गया
है. रक्षा पर अगले 10 सालों में 49 खरब रूपए और अधौसंरचना ढाँचे पर 50 लाख करोड़ रूपए खर्च करने की मंशा सरकार ने दिखा दी है; पर कृषि, खाद्य सुरक्षा, पोषण और स्वास्थ्य के लिए इनके पास धन की बहुत ज्यादा कमी है. वर्ष 2011-12 में हमारी सरकार ने अपने बजट अनुमान
में 12 लाख 33 हज़ार करोड़ रूपए के व्यय का प्रावधान किया. वर्ष 2012 -13 में भारत सरकार का कुल व्यय यानी खर्चा 14,90, 925 करोड़ रूपए रहेगा.
भारत
की अर्थव्यवस्था में पिछले 61 वर्षों में क्या बदलाव आया है, इसका
अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है. हमें यह याद रखना होगा कि भारत की सामाजिक और आर्थिक
व्यवस्था का आधार खेती रही है, पर उसी को लगातार नज़रंदाज़ करने की
प्रवर्ति सरकार ने दिखाई है. बीते वर्ष में सरकार का मानना था कि देश की वृद्धि दर
8.4 प्रतिशत से ज्यादा रहेगी, जिसमे
कृषि 4 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी; पर
ऐसा नहीं हुआ और इस साल में यह दर 2.5 प्रतिशत के आसपास आकर टिक गयी. इसके
दूसरी तरफ व्यापार होटल, परिवहन,
संचार, वित्त
सेवाओं, बीमा,
जमीन-जायदाद के व्यापार ने 9 से
11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की. पिछली यानी कि ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में सरकार ने कृषि क्षेत्र
में 4 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया था, परन्तु
यह 3.3 प्रतिशत रहा. हमारी सरकार ने रक्षा बजट 1.64 लाख करोड़ से बढ़ा कर 1.94 लाख करोड़ रूपए कर दिया और कृषि के लिए इसका केवल 10 फ़ीसदी
यानी 20822 करोड़ रूपए का ही प्रावधान किया गया
है. रक्षा पर अगले 10 सालों में 49
खरब रूपए और अधौसंरचना ढाँचे पर 50 लाख करोड़ रूपए खर्च करने की मंशा
सरकार ने दिखा दी है; पर कृषि,
खाद्य सुरक्षा, पोषण
और स्वास्थ्य के लिए इनके पास धन की बहुत ज्यादा कमी है. हर रोज़ 2000 किसान खेती छोड़ रहे हैं और हर आधे घंटे
में एक किसान बदहाली के कारण आत्महत्या कर लेता है.
खेती
भारत में रोज़गार के नज़रिए से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र तो है ही, साथ
ही हमारी खाद्य सुरक्षा के लिए उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है. एक तरफ तो पिछली पंचवर्षीय
योजना में यह कहा जा रहा था कि हम 7.94 प्रतिशत की दर से आगे बढे; परन्तु
हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को यह कहने में कोई हिचक नहीं कि देश के 6.5
करोड़ बच्चे भुखमरी के शिकार हैं और वे उसे राष्ट्रीय शर्म का खिताब देते हैं.
आखिर क्यों है यह भुखमरी हमारे देश में? वित्तमंत्री जी ने देश को बताया कि इस
साल देश में 25 करोड़ टन अनाज का उत्पादन होगा, जो
कि एक नया रिकार्ड भी होगा. 1951 में हम 5 करोड़ टन अनाज उत्पादन कर रहे थे, अब
यह 5 गुना बढ़ चुका है. दुखद यह है कि हमारी
सरकार रोटी के मामले में ही हमें आंकड़ों की बाजीगरी दिखाती है. यह बिलकुल
विश्वास नहीं किया जान चाहिए कि कृषिविहीन विकास देश में खाद्य सुरक्षा लाएगा.
आज़ादी के बाद 1961 में यहाँ प्रतिव्यक्ति अनाज की
उपलब्धता 399.7 ग्राम थी. जब खुले बाज़ार की नयी
नीतियां लागू की गयीं तब यह उपलब्धता 468.5 ग्राम थी; परन्तु
उसके बाद इसमें लगातार गिरावट होती रही या कोई वृद्धि ही नहीं हुई. वर्ष 2010-11 में देश में प्रतिव्यक्ति अनाज की उपलब्धता 407
ग्राम प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन रही. यह किस तरह का विकास है जिसमे हम वर्ष 1961 की स्थिति में ही खड़े हुए दीखते हैं.
देखिये; हमें
यह मान लेना होगा की सरकार जिस क्षेत्र को प्रोत्साहन देने की नीति बना लेती है, वह
क्षेत्र आगे बढ़ता है. सरकार ने खेती पर सबसे ज्यादा चिंता जाहिर की होगी पर पर
सबसे कम कदम उठाये हैं और खेती के संकट को ख़त्म करने के लिए जो बुनियादी कदम
उठाने की जरूरत थी, उनसे वह हमेशा बचती रही है. वर्ष 1950-51 में देश के सकल घरेलु उत्पाद में खेती का योगदान 53.1 प्रतिशत का था जो इस साल घट
कर 13.9 प्रतिशत के स्तर पर आ गया; इसके विपरीत तब सेवा का क्षेत्र 30.3 प्रतिशत का योगदान कर रहा था, उसका व्यापार इतना बढ़ाया गया कि आज वह जीडीपी
में 59 प्रतिशत का योगदान दे रहा है. सरकार का
मानना है कि अभी देश की 56 फ़ीसदी जनसँख्या खेती पर निर्भर है, हमें
उसे वहां से निकाल कर दूसरे क्षेत्रों में लेकर जाना है. मकसद यह भी है कि बढ़ी
बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ और कारपोरेट घराने हज़ारों हेक्टेयर की जमीन के मालिक बन कर खेती
का व्यापार करें. इसके लिए किसानों के सामने बदहाली के हालात खडे करना ही होंगे.
यही कारण है कि भारत में अभी भी हर आधे घंटे में एक किसान आत्महत्या कर ले रहा है.
सरकार का मानना है कि अब किसी भी क्षेत्र को सब्सिडी या रियायत देना सही नीति नहीं
है. इससे खुले बाज़ार में प्रतिस्पर्धा का सही वातावरण नहीं बनता है. बाज़ार में
आर्थिक लाभ कमाने के लिए यूद्ध कर रही कम्पनियाँ खेती का व्यापार तब तक नहीं कर
सकती थीं, जब तक कि सरकार किसानों को सब्सिडी दे
रही थी; इसीलिए लगातार किसानों और किसानी के लिए दी जाने वाली सब्सिडी को ख़त्म किया गया. इसी साल से बारहवीं
पंचवर्षीय (2012-16) का कालखंड भी शुरू हो रहा है जिसमे
सब्सिडियों को खत्म करने की प्रक्रिया को और तेज़ किया जाएगा. इस योजना के पहले ही
बजट में प्रणब दादा ने उर्वरकों पर दी जाने वाली सब्सिडी को नकद हस्तांतरण में बदल दिया. इसका मतलब यह है
कि किसान को सरकार एक तयशुदा राशि दे देगी और किसान को उर्वरकों का बाज़ार मूल्य
चुका कर खेती की सामग्री खरीदना होगी. अब उर्वरक कम्पनियाँ अपने उत्पाद की कीमत
निर्धारित करेंगी और किसान से वसूल करेंगी. दुसरे तरीके से सरकार की सब्सिडी का
लाभ उर्वरक कम्पनियाँ उठाएंगी. गाँव और किसानों को बिजली देने के लिए 18
राज्यों ने भारी कर्जे लिए हुए हैं. जब इन कर्जों को चुकाने के बारी आएगी तो सरकार
किसानों से ही उसे वसूल करेगी और सन्देश देगी कि हमने तो आप ही के लिए कर्जा लिया
था अब चुकाने के लिए बिजली की कीमतें तो बढ़ाना ही पड़ेंगी.
अभी
खाद्यान्न, पेट्रोलियम उत्पादों और उर्वरकों पर दी
जाने वाली सब्सिडी देश के जीडीपी के 2.5 प्रतिशत के बराबर है. इसके अगले तीन
वर्षों में 2 प्रतिशत पर और इसके बाद 1.75 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य 12वीं पंचवर्षीय योजना में है. इसका मतलब
है कि पेट्रोल-डीज़ल, उर्वरकों की कीमतें बढेंगी और सार्वजनिक
वितरण प्रणाली पर से भी सरकार अपना हाथ खीचने की तैयारी में है. इस नीति से
पेट्रोलियम उत्पाद महंगे होंगे, उर्वरक महंगे होंगे और राशन मंहगा होगा; कुल
मिला कर मुद्रास्फीति यानी मंहगाई बढाने की पूरी व्यवस्था कर दी गयी है.
खेती
और किसान को संरक्षण देने के लिए केवल बीज या खाद के मसले पर कोई वायदा करने से
काम नहीं चलेगा; न ही किसान आत्महत्या पैकेज इसका कोई हल
है. इसके लिए कृषि की पूरी व्यवस्था - बीज, जमीन के उपचार, सही
उर्वरक और कीटनाशक उपयोग, सिंचाई,
बिजली की उपलब्धता से लेकर बाज़ार
की उत्पादकोंमुखी व्यवस्था की रूपरेखा बनाई होगी. भारत सरकार ठीक इसके उलट नीतियां
बना रही है.
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