Thursday, 31 October 2013

कच्छ से साक्षात्कार – १


कच्छ से साक्षात्कार – १

सचिन कुमार जैन

मैं इस आलेख में कोई गहरा विश्लेषण पेश नहीं करने वाला हूँ. इस बार सोचा कि गुजरात देखा जाए. नक्शा देखा तो पता चला कि पूरा राज्य घूमना तो बड़ा भारी मामला है, तो मन कच्छ पर आकर टिक गया. मैं आपको इस इलाके के बारे में बताना चाहता था, तो बस लिखने लगा. एक बात साफ़ कर दूं कि इस इलाके, यहाँ की जमीन, यहाँ के पक्षियों, लोगों, उनकी बुनकरी की कला, कपड़ों को सामने प्रत्यक्ष रूप से देख लेने के बाद ही यह तय हो जाता है कि इसकी आंशिक अभिव्यक्ति ही की जा सकती है. जब हमने (यानी मेरे परिवार ने) इस इलाके में प्रवेश किया तो हम एक गांव में रुके – बाजना नाम है उस गांव का.


सुरेंद्रनगर जिले के इस गांव में ३० साल पहले तक सभी ७३ परिवार कपड़ों की बुनाई और कढाई की ७०० साल पुरानी एक खास कला का काम करते रहे, पर अब इनमे से एक ही परिवार बचा है. इस बुनकरी का नाम है टांगलिया. गुजरात के २६ गांवों में ही इस कला का वास रहा है. यहाँ रहने वाली डांगसिया समुदाय ही एकमात्र ऐसा समुदाय रहा है जो इस कला की तकनीक में निपुण रहा है. इसमे बांधनी के साथ धागों से बिंदियों की बुनाई इस तरह की जाती है कि उनके उभार को महसूस किया जा सके. बुनकर सूट को इस तरह पकड़ कर उभरते हैं कि उस उभार के आसपास धागा लपेटा जा सके. जरूरत पड़ने पर कूटनी से कूटते भी हैं. आमतौर पर समुदाय अपने खुद के उपयोग के लिए ही टांगलिया बुनकरी का काम करता रहा है.  भारवाड समुदाय की महिलायें कढाईदार बांधनी कपड़ों (खासतौर पर बिंदीदार काले घागरे) को पहने हुए दिख जायेंगी.

बिंदियों को जोड़कर एक रूप उकेरने में अलग-अलग रूपों का उपयोग होता है; जैसे रामराज, धुसला, लोब्दी, गदिया, चर्मालिया. मूलभावों में लाडवा या लड्डू, मोर पक्षी, आम्बो (आम के पेड़), खजुरी (खजूर के पेड़) को सबसे ज्यादा उपयोग में लाया जाता है. चटक गुलाबी, लाल, नीला, हरा, मेहरून, बैंगनी और नारंगी रंग जम के उपयोग में लाया जाता है इस बुनकरी में. काले रंग की पृष्ठभूमि में सफ़ेद रंग का उपयोग पारंपरिक रूप से होता रहा है. 

ऊन, रेशम और सूती कपड़ों पर (ये कपडे भी डांगसिया समुदाय ही करता है) इन्ही सामग्रियों ऊन, रेशम, काटन की धागों से बिंदियाँ या दाने रचे जाते हैं. तागों की बुनाई और कढाई की दानों से निश्चित दूरी तय की जाती है.  

उन पर छोटे-छोटे बिंदी के आकार के हिस्से धागों से बाँध कर रंगे जाते हैं ताकि अलग अलग रंगों को उभारा जा सके. इन पर रंगीन धागों के ऐसे कढाई की जाती मानो कपड़ों को आभूषण पहनाए गए हैं. कपडे को धागों से बिंदी के आकार में बाँध कर धागों से उस पर मनका कढ़ाई का प्रभाव पैदा किया जाता है. यही इस कला की खासियत है. मूलतः टांगलिया हस्तकला में कपड़ों की बुनाई पिट करघों (पैर डालकर बैठने के लिए  जमीन में ३ फिर गहरे गड्ढे से जोड़ कर करघा लगाना) में होती है. ये करघे चौड़ाई में तो २ या तीन फिट के कपडे बुनते हैं पर इनकी लम्बाई २० फिट तक होती है. आज बाजना में केवल दह्या भाई का एक मात्र परिवार गांव में बचा है, जो यह काम करता है. 




जानकार बताते हैं कि टांगलिया कला का उद्भव दो समुदायों से सम्बन्ध रखने वाले एक युगल के प्रति सम्बंधित समुदायों द्वारा किये गए बहिष्कार के कारण हुआ. ये समुदाय इस युगल के कला से सम्बंधित विचारों को स्वीकार नहीं कर रहे थे. इस युगल ने जो कला रची उसने एक समुदाय का रूप ले लिया.  
 
दह्या भाई बताते हैं कि टांगलिया का काम करना अब पुराता नहीं है. एक समय पर काली भेड़ों या ऊँट के ऊन का उपयोग कच्चे माल के रूप में होता था, जो अब इतनी मात्रा में उपलब्ध नहीं है. लोग अपने बिस्तर के लिए चादर चाहते हैं, यदि टांगलिया कला में उसे बनाया जाता है तो हमें पूरे ३० दिन काम करना पड़ता है. तब एक चादर बन पाती है. माल और करघे की लागत निकाली जाए तो इस पर १२०० रूपए का तो सामान ही लगता है. हमें यह चादर यह २००० रूपए में बेंचना पड़ती है. इसकी हमें ३० रूपए रोज के हिसाब से ही मजदूरी मिलती है. वे कहते हैं कि हस्तकला को अब अमीरों का शौक माना जाने लगा है, जबकि हमारे समाज में तो ये कलाएं आम लोगों के रोज के जीवन का हिस्सा रही हैं. अब तो भारवाड़ी महिलायें भी खास मौकों पर ही कलाकारी से पूरे कते-बुने वस्त्र पहनती हैं. इसी बीच बाज़ार में अब कारखानों में बने हुए सिंथेटिक धागे भी आने लगे, जिससे भेड़ और ऊंट के ऊन का उपयोग कम हो गया.


हाथ करघों और मशीन के करघों के बीच संघर्ष हुआ और हाथ के करघे यह संघर्ष हारने लगे. दह्या भाई बताते हैं कि हाथ करघों में पैर, हाथ, आँख, दिमाग और मन (रचना की कल्पना) का एक साथ काम होता है. सबके बीच सामंजस्य भी जरूरी होता है. मशीन के करघे मशीन से चलते हैं. हम, यानी परिवार के ५ कामकाजी सदस्य मिल कर, एक साल में ३०० इकाईयां (शाल, पर्दे, पलंग की चादरें और पहनने के कपडे) बना पाते हैं. हम पांच श्रमिकों के काम से हम ६००० रूपए महीना कमाते हैं. थोडा रुक कर वे बताते हैं कि खेत और मकान बनाने वाले मजदूर से भी कम मोल है हमारी मेहनत का. दह्या भाई का अर्थशास्त्रीय विश्लेषण बहुत सीधा सा है. उनके मुताबिक हम अपने सामान की कीमत बहुत ज्यादा बढ़ा नहीं सकते हैं, क्योंकि आम लोग उसे वहन नहीं कर पायेंगे. यदि आम लोग ही टांगलिया कला का उपयोग न कर पाए तो यह कला तो खत्म होनी ही है. अब ज्यादा से ज्यादा यह कुछ शोरूमों और संग्रहालयों में बची दिखती है. अच्छा होगा यदि सरकार टांगलिया कलाकारों और डांगासिया समुदाय को संरक्षण दे. सरकारी कर्मचारियों और मजदूरों की आय के बारे में समितियां बन रही हैं. हम १.२ लाख बुनकर परिवारों के लिए भी तो सोचा जा सकता है; यदि आपका मन हो तो!

Sachin Kumar Jain (sachin.vikassamvad@gmail.com / 31st October 2013)

Sunday, 8 September 2013

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून की राजनीतिक अर्थव्यवस्था



सचिन कुमार जैन

भारत की संसद ने खाद्य सुरक्षा को एक अधिकार के रूप में मान्यता देकर एक ऐतिहासिक काम किया है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून (२०१३) बनने का मतलब है सरकार का भुखमरी, कुपोषण और खाद्य असुरक्षा की स्थिति में जवाबदेय बन जाना. हालांकि हमें यह स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि अब भी खाद्य सुरक्षा या भुखमरी से मुक्ति भारतीय संविधान के तहत मौलिक अधिकार नहीं है. इसलिए दूर की ही सही पर यह आशंका बनी रहेगी कि इस क़ानून को कभी भी ख़त्म भी किया जा सकता है. इस क़ानून पर चली बहसों में जो पक्ष उभरे उन्हे तीन वर्गों में रखा जा सकता है; एक वर्ग जो यह मानता है कि सरकार ने बहुत लम्बे समय के बाद एक अच्छा क़ानून बना दिया है और इसमे अनाजों के अधिकार के जो प्रावधान किये गए हैं उनसे भुखमरी मिट जायेगी; दूसरा वर्ग यह मानता है कि क़ानून बहुत जरूरी कदम था और है, परन्तु इसके किये गए प्रावधान भुखमरी और खाद्य असुरक्षा के मूल कारणों से लडने के मामले में कमज़ोर हैं. यानी किसानों, प्राकृतिक संसाधनों, उन आर्थिक नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा न होना, जो असमानता बढ़ा रही हैं, के बारे में ईमानदार पहल नहीं करता है. वे यह भी मानते हैं कि इस क़ानून में जिस खाद्य सुरक्षा की बात की गयी है, उसमे पोषण की सुरक्षा का कोई स्थान नहीं है. तीसरा वर्ग कहता है कि सरकार राजनीतिक लाभ के लिए १.२५ लाख करोड़ रूपए रियायत (सब्सिडी) के रूप में बर्बाद कर रही है. इस कदम से आर्थिक विकास के लिए जरूरी सुधार (जिनमे जनकल्याणकारी कार्यक्रमों पर सरकारी खर्चा और सब्सिडी कम करने के कदम उठाये जाते हैं) की प्रक्रिया को आघात पंहुचेगा. वे यह माने को तैयार नहीं हैं कि देश में मौजूदा कुपोषण और खाद्य असुरक्षा के कारण हो रहा आर्थिक विकास खोखला है.  यह कहना भी गैरवाजिब है कि इस कानों पर होने वाले व्यय से कोई रचनात्मक लाभ नहीं होगा. लोगों को देने के लिए अनाज तो किसानों से ही खरीदा जाएगा न! इससे किसानों को साल भर में ८० हज़ार करोड़ रूपए का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलेगा. हमें इस तरह की कई सच्चाईयों को समझना होगा.
इस बहस में उभरे कई सवाल बहुत महत्वपूर्ण भी हैं. सार्वजनिक वितरण प्रणाली में फैले हुए भ्रष्टाचार (अध्ययनों के आधार पर माना जाता है कि लगभग ३५ प्रतिशत संसाधन भ्रष्टाचार की भेट चढ़ जाते हैं) को ख़त्म किये बिना इस क़ानून के तहत दिए गए अधिकार लोगों तक पनुच पायेंगे, इस पर शंका बरकरार है; क्योंकि हाल ही में बने क़ानून में भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा देने के लिए बहुत कमज़ोर प्रावधान हैं. यह एक सच्चाई है, पर इस आधार पर यह तर्क देना कि सरकार को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून नहीं बनाना चाहिए था, बहुत हे गैर-वाजिब तर्क था. बेहतर होता यदि पीडीएस, मध्यान्ह भोजन और आंगनवाडी जैसे कार्यक्रमों में ढांचागत विकास, उनकी गुणवत्ता बढाने और उनकी सामुदायिक निगरानी के लिए स्पष्ट और ठोस प्रावधान किये जाने के लिए सरकार पर और दबाव बनाया जाता. लोकसभा और राज्यसभा में इस विधेयक पर हुई बहसों में इन सभी पहलुओं पर बात हुई, पर वह आखिर में औपचारिकता साबित हुई. विपक्ष ने भी सरकार को कमज़ोर क़ानून बनाने में समर्थन दिया. बार बार यह प्रचारित किया जा रहा है कि सरकार को इस क़ानून के क्रियान्वयन के लिए सवा लाख करोड़ रूपए का नया आवंटन करना पड़ेगा; पर यह झूठा प्रचार है. वास्तव में सरकार वैसे ही ९७ हज़ार करोड़ रूपए इस पर खर्च कर रही है. उसे क़ानून के क्रियान्वयन के लिए नयी व्यवस्था बनाने (जैसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा आयोग, पीडीएस का कम्प्यूटरीकरण आदि) पर २५ हज़ार करोड़ रूपए का नया आवंटन करना होगा. यह खर्च बिना क़ानून बनाए भी होना ही था क्योंकि पीयुसीएल बनाम भारत सरकार के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी सरकार को पीडीएस में ढांचागत बदलाव की व्यवस्था बनाने के आदेश दिए हैं. इसके अलावा एकीकृत बाल विकास परियोजना यानी आंगनवाड़ी और स्कूल में मध्यान्ह भोजन योजना भी पहले से ही चल रही है. सभी महिलाओं के लिए मातृत्व हकों (छह माह के लिए १००० रूपए प्रतिमाह की राशि का प्रावधान) की व्यवस्था एक नया और महत्वपूर्ण कदम है ताकि गर्भावस्था से लेकर प्रसव के बाद कुछ महीनों तक स्त्री को आराम, पोषण आहार और जरूरी स्वस्थ्य सेवाएँ मिल सकें. मातृ मृत्यु अनुपात, नवजात शिशु मृत्युदर और बाल मृत्यु दर को कम करने और बच्चों-महिलाओं में कुपोषण को रोकने के लिए यह अत्यंत जरूरी कदम माना जाना चाहिए.  एक तरफ तेज़ी से हो रहा आर्थिक विकास और दूसरी तरफ कुपोषण का ऊँचे स्तर पर बने रहना; ये विरोधाभासी स्थिति है. कुछ लोग सम्पन्न होते जाएँ और हर दो में एक बच्चे का शारीरिक-मानसिक विकास अवरुद्ध रहे; यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र के चारित्रिक पतन की सूचक मानी जा सकती है. सरकार की जिम्मेदारी थी कि वह इस स्थिति के सन्दर्भ में अपना पक्ष स्पष्ट करे.
डेनमार्क, स्वीडन ऐसे देश हैं, जहाँ वे अपने सकल घरेलु उत्पाद के अनुपात में ४० से ५० प्रतिशत तक कर राजस्व इकठ्ठा करते हैं; भारत में यह स्तर २० प्रतिशत से नीचे है. इतना ही नहीं सरकार आर्थिक विकास के नाम पर लगभग ६ लाख करोड़ रूपए (कुल करों के बराबर की राशि) की छूट दे देती है. इससे हमारे राजस्व आधे रह जाते हैं. बेहतर होगा कि इन दो बिन्दुओं पर ठोस काम करके वह अपना राजस्व बढाए.   भ्रष्टाचार को ख़त्म करने और नव उदारवादी नीतियों के विलासितापूर्ण खर्चों (जैसे कामनवेल्थ खेलों पर ५७ हज़ार करोड़ रूपए का व्यय) को रोकने की दिशा में हमारे उन नीतिनिर्माताओं और विद्वानों की आवाज़ नहीं निकलती है जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून बनाए जाने का खूब विरोध कर रहे थे; आखिर क्यों? यह प्रतिबद्धताओं में अंतर का प्रमाण है.
 वास्तव में अन्तर नज़रियों और प्रतिबद्धताओं का ही है. नव-पूंजीवादी नजरिया मानता है कि इस क़ानून पर होने वाला खर्चा रियायत या सब्सिडी है, जो कभी वापस नहीं आएगी, जबकि हमें मानना यह चाहिए कि गरीबी, कुपोषण और वृद्धिबाधित बचपन की चुनौती से जूझ रहे भारत के लिए यह दीर्घावधि के विकास के लिए किया गया निवेश है. भुखमरी-कुपोषण से मुक्त होकर ही हम समतामूलक विकास कर सकते हैं. आक्सफोर्ड की अर्थशास्त्री सबीना अलकेर ने द हिन्दू में अपने लेख में लिखा कि भारत में दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में सबसे ज्यादा वृद्धिबाधित (स्टनटेड) यानी गहरे जड़ें जमा चुके कुपोषण से ग्रसित बच्चे हैं, फिर भी भारत सामजिक संरक्षण पर  माध्यम आय वाले एशियाई देशों की तुलना में आधा ही खर्चा करता है; एशिया के उच्चा आय वाले देशों की तुलना में तो भारत का सामाजिक संरक्षण पर व्यय महज २० फीसदी है. माध्यम आय वाले एशियाई देश सामाजिक संरक्षण पर अपने सकल घरेलु उत्पाद का ३.४ प्रतिशत व्यय करते हैं, जबकि भारत १.७ प्रतिशत व्यय करता है. हम इस स्तर पर भी महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) के व्यय के कारण पंहुचे हैं. उच्च माध्यम आय वाले एशियाई देश जीडीपी का औसतन ४ प्रतिशत सामाजिक संरक्षण पर व्यय करते हैं, जबकि उच्च आय वाले देश १०.२ प्रतिशत खर्च करते हैं. जापान १९.२ प्रतिशत, चीन ५.४ प्रतिशत; यहाँ तक की सिंगापुर भारत से दुगना यानी ३.५ प्रतिशत खर्च सामाजिक संरक्षण के लिए करता है.

एक तबका मानता है कि मनरेगा और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून जैसे क़दमों से लोग आलसी हो रहे हैं और श्रम की कमी होने के कारण खेती और उद्योग नकारात्मक रूप से प्रभावित होंगे; सच तो यह है कि इन क़दमों से असंगठित क्षेत्र में होने वाला शोषण कम होगा. यह क़ानून भुखमरी और कुपोषण की समस्या को जड़ों से नहीं हटाएगा पर इससे एक प्रक्रिया की शुरुआत जरूर होगी.


राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा – विधेयक से क़ानून के बीच की राजनीति


सचिन कुमार जैन

भारत के लिए 26 अगस्त 2013 का दिन कुछ मायनों में महत्वपूर्ण लगता है। लोकसभा में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक इसी दिन पारित हुआ। क़ानून बनने के बाद यह देश की 67 प्रतिशत जनसंख्या को अनाज की सीमित सुरक्षा प्रदान करेगा। इस क़ानून को प्रभावी बनाने के लिए 318 संशोधन प्रस्तुत किए गए थे। एक दिन में साढ़े नौ घंटे की बहस को देखें तो पता चलता है कि खाद्य सुरक्षा के अन्तर्निहित पहलुओं को आर्थिक मजबूरियों का नाम देकर खारिज किया गया है। यह दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि 22 साल तक अर्थव्यवस्था के कारपोरेटीकरण और संसाधनों की लूट की नीतियों ने बुनियादी रूप से देश का भला नहीं किया है और आज भी हमें भुखमरी से निपटने के लिए एक करुणामयी क़ानून बनाने की जरूरत है। नए क़ानून में राज्य सरकारें केंद्र की उपनिवेश होंगी, क्योंकि उन्हे केवल क्रियान्वयन का काम करना है। नीति और व्यवस्थागत निर्णय का अधिकार केंद्र के पास रहेगा। 359 में से 250 सांसद राज्य सरकारों के अधिकार सीमित रखने के पक्ष में थे। राज्य सभा में तो विपक्ष ज्यादा ताकतवर था, परन्तु वहां भी उसने रणनीतिक विरोध ही दर्ज करवाया. यदि वह चाहता तो क़ानून का स्वरुप कुछ बेहतर हो सकता था.
हम सब लोग कुछ भूल गए हैं। खाद्य सुरक्षा अब भी एक कानूनी हक है, संवैधानिक हक नहीं। मतलब यह कि इस हक के अस्तित्व पर राजनीतिक बेईमानी की तलवार हमेशा लटकती रहेगी। आइए, इस परिदृश्‍य में हम नए सिरे से इस विधेयक और उसकी राजनीति को समझने की कोशिश करते हैं।
1. खाद्य सुरक्षा के मामले में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली वाली व्यवस्था (कुछ को लाभ मिले और कुछ इससे बाहर किये जाएं) को खत्म करते हुए इसे सार्वभौमिक किया जाना जरूरी था। अब जबकि लोकसभा में विधेयक पारित हो गया है, सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि इस 67 प्रतिशत जनसंख्या का चयन कैसे किया जायेगा। सरकार 15 साल में यही तय नहीं कर पाई कि ये गरीब कौन हैं? सरकार इतनी सी बात नहीं समझ पायी कि सभी को क़ानून के दायरे में लाने के बाद भी 30 प्रतिशत मध्यमवर्ग इस क़ानून के तहत पांच किलो अनाज लेने राशन दुकान पर नहीं जाता। उसे तो ऊंची गुणवत्ता का गेंहूं और चावल चाहिए। इसका मतलब यह कि वास्तव में 70 प्रतिशत जनसंख्या पर ही सरकार का व्यय होता। दूसरी तरफ इसका फायदा यह होता कि क़ानून के पात्र 67 प्रतिशत लोगों की पहचान (जिन्हें खाद्य असुरक्षित माना जायेगा) के मानक और पहचान की प्रक्रिया तय करने में होने वाली विसंगतियों से बचा जा सकता था। सरकार ने इस संशोधन को नहीं माना।
2. यह बात महत्त्व की है कि सरकार ने एकीकृत बाल विकास परियोजना (अब आंगनवाड़ी का पोषण आहार कार्यक्रम भी इसके दायरे में है) के तहत खाने के लिए तैयार (रेडी टू ईट) पोषण आहार के प्रावधान को हटा दिया है। इसमें बड़ी कंपनियों को पैकेटबंद भोजन बेचने का धंधा देने की बात थी। लेकिन इसके साथ ही जीएम तकनीक आधारित खेती और खाद्य सुरक्षा के सीधे अधिकार के बदले नकद हस्तांतरण के प्रावधान को ज्यों का त्यों रखा है. 
3. लोकसभा ने जिस विधेयक को पारित किया है, उसका प्राक्कथन तो पोषण की सुरक्षा का वायदा करता है। लेकिन दालों और खाने के तेल का प्रावधान न करके इस वादे को तोड़ा गया है। राष्ट्रीय पोषण संस्थान के अनुसार पोषक तत्‍वों की कुल जरूरत का अधिकतम 40 प्रतिशत हिस्सा अनाज से मिलना चाहिए। बाकी 60 प्रतिशत भोजन के अन्य स्रोतों (दालें, फल, सब्जियां, तेल, अंडा, दूध और पशु स्रोतों से प्राप्त सामग्री आदि) से मिलना चाहिए। इस वैज्ञानिक तथ्य को क़ानून से बेदखल किया जा रहा है। इस कानून में प्रोटीन और वसा (जिनकी कमी भारत में कुपोषण का सबसे अहम कारण है) की जरूरत को पूरा करने के लिए कोई प्रावधान नहीं हैं। हम जानते हैं कि भारत अभी 50 लाख टन दालों का आयात करता है। इसी तरह 100 लाख टन खाने के तेल का भी आयात होता है। इस काम में बड़े स्तर के बिचौलिए और व्यापारी अपना हित साधते हैं। यदि सरकार तेल-दाल का प्रावधान कर देती तो ये भी सख्‍त नियमन के दायरे में आ जातीं। लिहाजा दोनों को बाहर रखा गया।  अगर इन्हे भी क़ानून में शामिल किया जाता तो मंहगाई और कम उत्पादन से लड़ने का एक आधार भी तो बन जाता. हम जानते हैं कि शरद पवार हमेशा से बाज़ार में खाद्य सामग्री की कीमतों को बढाने के हिमायती रहे हैं ताकि उत्पादक सीधे उपभोक्ता से वसूली करे और सरकार के संसाधनों से कार्पोरेट्स के लाभों को बढ़ाया का सके.
4. खाद्य सुरक्षा कानून राजनीतिक नज़रिए से कोई नयापन लिए है, इसमें शंका है। पूर्व के रोज़गार गारंटी क़ानून ने भी इस शंका को मजबूत ही किया, क्योंकि पहले गांव में लोगों को सरकार से रोज़गार मिलता ही नहीं था। काम मिल जाए तो मजदूरी का भुगतान कभी नहीं होता था। इसके बावजूद उनके पास कोई ऐसा रास्ता नहीं था कि वे हक की लड़ाई लड़ पाते। सूचना का अधिकार क़ानून लाने से पहले किसी को सवाल पूछने का हक था ही नहीं। वन अधिकार क़ानून का मामला भी तकरीबन ऐसा ही है, क्योंकि हर पांच में से तीन आदिवासी जंगल के अतिक्रमणकारी घोषित होते रहे और संसाधनों पर से समुदाय के हक छीने गए। अब यह क़ानून भी क्‍या कुछ नया हक दे रहा है, जो नज़र आये? इसके दायरे में शामिल हर योजना पहले से चल रही हैं। राशन की दुकान लगभग 40 सालों से चल रही है, आंगनवाड़ी और मध्यान्ह भोजन योजना भी चल रही है। राशन से पहले भी गेहूं और चावल मिल रहा था, अब भी मिलेगा। मात्रा जरूर कम हो गयी है। क़ानून की वकालत करने वाले यूपीए नेता इसमें उन तत्वों को डालना लगभग भूल गए, जो इसे ‘गेम चेंजर’ बनाता।
5. जवाबदेहिता के सवाल पर सांसद बी. महताब ने कहा कि गड़बडी़ करने वाले पर केवल 5000 रूपए जुर्माने का प्रावधान है। इसे बढ़ाकर 50,000 रूपए किया जाए। जवाबदेहिता का ढोल पीटने सांसदों का बहुमत नौकरशाही को जवाबदेह बनाने के खिलाफ था।
6. खाद्य सुरक्षा क़ानून में प्रावधान है कि युद्ध, बाढ़, सूखा, चक्रवात समेत किसी भी प्राकृतिक आपदा की स्‍थिति में सरकार खाद्य सुरक्षा का अधिकार देने के लिए बाध्य नहीं होगी। यूपीए सरकार को कोई तो समझाए कि भूख का सबसे गहरा आघात आपदा के समय ही होता है। ऐसे में क्या यह प्रावधान नैतिक रूप से सही है? निराश्रितों और बेघरबारों को एक वक्त का खाना सामुदायिक रसोई से देने के प्रस्ताव को 344 में से 245 सांसदों ने खारिज किया। भठिंडा की सांसद हरसिमरत कौर बादल ने कहा कि पंजाब की जमीन अगले 20 सालों में रेगिस्तान बन जाएगी। सोचिए, इस खतरे को नज़रंदाज़ करके बन रहा यह क़ानून कितना मज़बूत है ?

7. लोकतंत्र में संसद का निर्णय महत्त्व रखता है। लोकसभा ने इस विधेयक को पारित कर दिया है। बहस के दौरान हुई उभरे मुद्दों को अब भूमि अधिग्रहण विधेयक के साथ भी जोड़कर देखा जाना चाहिए। दोनों क़ानून अलग-अलग नज़रिए से नहीं देखे जा सकते। संसद के ज्यादातर सदस्य यह मानते हैं कि क़ानून का क्रियान्वयन उत्पादन और उपलब्धता से सीधे जुड़ा है। ऐसे में मौजूदा कृषि संसाधनों, किसानों और औद्योगिक विकास की नीतियों की समीक्षा किये बिना इसका क्रियान्वयन संभव नहीं होगा। 19 सांसदों ने जमीन, सिंचाई, खेती के पक्ष को रखा, जिसका संज्ञान लिया जाना चाहिए। अर्थशास्त्रियों और भारत सरकार के मंत्रियों का एक वर्ग राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के खिलाफ केवल इसलिए नहीं है, क्योंकि इस पर 1.30 लाख करोड़ रूपए खर्च होंगे, बल्कि वह कारपोरेट हितों पर पड़ने वाले इसके प्रभावों को लेकर घबराए हुए हैं। वे जानते हैं कि इस क़ानून के बाद जमीन अधिग्रहण, खेती की जमीन का उद्योगों या अधोसंरचना के विकास के नाम पर जमीन कर कब्ज़ा जमाने की संभावनाएं कम होती जायेंगी। 

Thursday, 29 August 2013

आर्थिक संकट : यह वक्त सरकार की कार्ययोजना से बचने का है!




सचिन कुमार जैन

अगस्त 2013 की आखिरी सप्ताह की गह्त्नाओं का विश्लेषण यह है कि लोकसभा में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित होने से शेयर बाज़ार 500 से 1000 अंक गिरा गया. डालर का दाम बढ़ा और रूपया कमज़ोर हो गया. अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि अब तो ये देश बर्बाद ही हो जाएगा क्योंकि ये सबको भोजन देने और भुखमरी से मुक्त करने की दिशा में बढ़ रहा है. 
हद तो तब हो गयी कि पी चिदंबरम साहब की पीड़ा इतनी बढ़ गयी कि उन्होंने कह दिया कि वर्ष 2008 की नीतियों (जिन्हे प्रणब मुखर्जी ने अपनाया था) के कारण संकट आया है. एक बार फिर यह साबित हो गया कि शेयर बाज़ार या आर्थिक विकास तभी संभव है जब भूख बनी रहेगी और सरकारी खज़ाना सिर्फ कार्पोरेट्स के लिए खुला रहेगा. यदि खज़ाना आम लोगों के लिए खुलेगा तो कार्पोरेट्स और उनके हितेशियों के दिल-ओ-दिमाग का दौरा पड़ेगा.

भूख के साथ सोने और जागने वालों पर सवा लाख करोड खर्च करोगे तो देश रसातल में तो जाएगा ही न! कुछ भाई साबों को पता नहीं है कि सबसे बड़े भिखारी वो हैं जो आर्थिक वृद्धि, औद्योगिकीकरण और रौशनी का दावा करते हैं; पर सरकार से भीख लेकर. सात साल में 29 लाख करोड रूपए की छूटें ली हैं, विकास के उन ध्वज वाहकों ने. जिन्हे हम देश के सबसे बड़े ५ उद्योगपति मानते हैं, उन पर सवा छह लाख करोड का कर्जा है. अब इनके हाथ से सार्वजनिक संसाधन लूटने का मौका थोडा खिसक सा रहा है. एक बात कहूँ कि गरीबी और भूख को बनाए रखना भी एक किस्म की मनौवृत्ति है. आज यह मनौवृत्ति हावी है, तो खुल कर जनकल्याणकारी व्यवस्था का ही विरोध होता है. इन्हें लगता है कि बच्चों को पोषण आहार देने या लोगों को मुफ्त इलाज़ देने या सस्ते राशन की व्यवस्था के बनने से इनका प्रभुत्व कम हो जा रहा है. मुझे लगता है कि किसी भी मुद्रा की कीमत डालर के एवज में नहीं मापी जाना चाहिए; किसी भी मुद्रा की कीमत उसके समाज के नैतिक, राजनीतिक और आर्थिक पतन या उन्नयन के हिसाब से मूल्यांकित की जाना चाहिए.

परन्तु भारत के वित्तमंत्री कुछ और ही सोचते हैं. अर्थव्यवस्था बचाने के लिए 27 अगस्त 2013 को उन्होंने 10 बिंदुओं की कार्ययोजना देश के सामने रखी. इस से अभी भी यही पता चलता है कि वे मौजूदा आर्थिक संकट के कारणों से अब भी वाकिफ नहीं हैं या उन कारणों की तरफ आँखें मूंदे रखना चाहते हैं. इस कार्ययोजना में से दो बिंदु खतरे को और बढाएंगे. उनका कहना है है कि हमें उत्पादन (प्रोडक्शन वाला नहीं मेन्यूफेकचरिंग वाला) बढ़ाना जरूरी है. इसके लिए वे फ्लेट स्क्रीन वाले टेलिविज़न का उदाहरण दे रहे हैं. आज की सबसे बड़ी जरूरत अपने उपभोक्तावादी व्यवहार को नियंत्रित करने की है, ताकि अनावश्यक हमें विदेशी आयात पर हमें निर्भर न होना पड़े. इसके बारे में न सोच कर वे अब भी यही मानते हैं कि समाज को लालच, लोभ और विलासिता में डूबे रहना चाहिए ताकि पूँजी का बहाव बना रहे. भारत सरकार सुरक्षित जमा (जैसे बैंक में बचत) को प्रोत्साहित नहीं करती, क्योंकि वहाँ बैंक को संयमित व्यवहार करना होता है और वे आम लोगों के धन का सट्टे (शेयर) में उपयोग नहीं कर सकते हैं. इसके दूसरी तरफ म्युचुअल फंड, बोंड और रियल एस्टेट में निवेश के लिए वह करों में छूट देती है. इन क्षेत्रों में लगा आम लोगों का धन एक तरह से सट्टे में लगा होता है. यदि वह डूब जाए तो लगभग कोई जिम्मेदार नहीं होता है. इसका साफ़ मतलब यह है कि एक तरफ तो सरकार ने पूँजी बाज़ार का सही और ठोस नियमन नहीं किया है और उस जोखिम भरे बाज़ार में वह लोगों को अपनी जमा पूँजी और बचत का निवेश करने के लिए मजबूर करती है. यही कारण है कि आज जब बाज़ार में संकट है तो इसका सीधा असर लोगों की निजी और दैनिक जिंदगी पर पड़ रहा है क्योंकि उनकी जमा पूँजी बाजार के धराशायी होने के कारण डूब रही है. अब भी वित्तमंत्री मानते हैं कि फ्लेट स्क्रीन टीवी, एयर कंडीशनर, विलासिता पूर्ण कारों में लोगों का पैसा खर्च करवाया जाए. यदि लोगों के पास पैसा न हो तो उन्हें सस्ता क़र्ज़ दिलवा दिया जाए, जिसकी वसूली के लिए वित्तीय संस्थान गुंडाई हथकंडे अपनाने के लिए स्वतंत्र रहते हैं. कुल मिला कर बैंक को अपना क़र्ज़ वापस मिल जायेगा, कंपनी की टीवी और कार बिक जायेगी, बाज़ार का आतंक भी बन जायेगा और आखिर में अगर कोई बर्बाद होगा तो एक सामान्य व्यक्ति क्योंकि उसे अपना क़र्ज़ चुकाने के लिए घर, गहने बेंचना पड़ेंगे या फिर भूख का साथ निभाना पड़ेगा. सम्मान तो जायेगा ही.    
वित्तमंत्री का दूसरा विचार है कि आज का संकट इसलिए है क्योंकि हमारा निर्यात कम हो गया है. निर्यात कम होने और आयात ज्यादा होने से भारत को अपने विदेशी मुद्रा भण्डार में से डालर खर्च करना पड़ रहा है. आयात के अनुपात में निर्यात इतना कम हो गया है कि हमारे पास अगले छह माह तक आयात करने लायक ही विदेशी मुद्रा बची है. अगर संकट यह है तो हमें इस स्थिति को एक अवसर मानना चाहिए. हमें आत्मविश्लेषण और चिंतन करना चाहिए कि यदि हमारी अर्थव्यवस्था इतनी असुरक्षित और विदेशी निवेश पर निर्भर है, तो हम खुद को आत्मनिर्भर क्यों कहते हैं? हम दाल और खाने का तेल आयात करते हैं, हम कपडे आयात करते हैं, इतना ही नहीं हम प्याज भी आयात करना चाहते हैं. ये हमारी बुनियादी जरूरतें हैं और इनके उत्पादन के मामले में देश आत्म निर्भर हो सकता है. बस सरकार ने ही पर-निर्भरता की नीति अपनाई. हम पेट्रोलियम उत्पादों और कच्चे तेल का आयात करते हैं क्योंकि हमारे पास इसके प्राकृतिक भण्डार नहीं हैं. हम इनके उपयोग को सीमित जरूर कर सकते हैं. भारत में कभी भी सार्वजनिक और सामूहिक परिवहन व्यवस्था को ठोस बनाने की नीति को मतवपूर्ण नहीं माना गया. स्वतंत्रता के बाद जब भी जिसके पास पैसा आया उसमे एक, के बाद दूसरी, दो के बाद तीसरी और इससे ज्यादा कारें खरीद कर अपनी सम्पन्नता का प्रदर्शन किया. हम सम्पन्नता के साथ जिम्मेदारी का कभी अहसास ही नहीं कर पाए क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था जिम्मेदार होना नहीं सिखाती है. जरूरत जन-हित की नीतियों की है, लागू हो रही हैं जन-अहित की नीतियां. वित्तमंत्री अपने इस सुझाव में कहते हैं कि हमें हमें ऊर्जा, स्टील, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रानिक्स हार्डवेयर, टेक्सटाइल की मेन्यूफेक्चारिंग करना चाहिए. वे यह नहीं बता रहे हैं कि वे जिस तरह की मेन्युफेक्चरिंग की वकालत कर रहे हैं उससे देश कई जैव-विविधता, पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधन को जबरदस्त और स्थाई नुक्सान तो होगा ही. भारी तादाद में विस्थापन भी होगा. बेहतर होगा कि अब सरकार, अर्थशास्त्री और वित्तमंत्री जो भी सुझाव देश के सामने रखें और लागू करें उनके समाज पर पड़ने वाले अच्छे-बुरे दूरगामी परिणामों का खाता भी शामिल हो. यह सही है कि कुछ मआयनों में आज देश के सामने आर्थिक संकट है, पर यह अस्तित्व का संकट नहीं है. देश भूखों नहीं मरेगा क्योंकि किसान ने हमें अनाज, पोल्ट्री, पशुपालन, दूध उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनाया है. बेहतर होगा कि इस आर्थिक संकट से उबरने की दिशा में हम एक बार फिर किसान और खेती को संरक्षण दें. दूसरी बात यह है कि देश के भीतर की लघु और स्थानीय उद्योगों की व्यावस्था में सरकार निवेश करे. हम जानते हैं कि टेक्सटाइल उद्योग इसलिए बर्बाद हुआ क्योंकि बड़े उद्योगों को फायदा पंहुचाने के लिए सरकारे ने नीतिगत तरीका अपना कर छोटे और स्थानीय उद्योगों को खत्म किया. बम्बई की टेक्सटाइल मिलों से लेकर इंदौर की मिलों और महेश्वर-चंदेरी के घरेलु उद्योगों तक कपडा उद्योग को भारी आघात पंहुचाया गया. हम बार बार यह सुनते हैं कि सिंचाई और ऊर्जा के लिए बड़ी परियोजनाओं की नहीं बल्कि छोटी परियोजनाओं की जरूरत है. हम सब जानते हैं कि बाँध बनाते समय सिंचाई और बिजली उत्पादन के जो दावे किये जाते हैं, उन दावों की तुलना में उत्पादन केवल 30 से 40 फीसदी होता है. इन बड़ी परियोजनाओं में 20 लाख हेक्टेयर ऐसा जंगल खत्म किया है जो हमारी खाद्य सुरक्षा और आजीविका का मूल आधार था. इसी तारतम्य में पी.चिदंबरम साहब को तीन साल पहले दिए गए अपने उस वक्तव्य को भी तत्काल वापस लेना होगा जिसमे उन्होंने कहा था कि वे वर्ष 2025 तक 85 प्रतिशत आबादी को शहरों में देखना चाहते हैं. इस वक्तव्य में कूट-कूट कर भरी अदूरदर्शिता को देख पा रहे हैं आप कि नहीं? जिन शहरों में मजबूरी में गांव से आकर बस जाने वाले लोगों को अतिक्रमणकारी, आदतन अपराधी कहा जाता है, जिनके घरों के समूह को गैर-कानूनीबस्ती के रूप में परिभाषित किया जाता है, वहाँ देश के 85 प्रतिशत आबादी के होने का मतलब क्या है? इन सन्दर्भों में आज का आर्थिक संकट केवल शेयर बाज़ार के आंकड़ों और डालर के मुकाबले रूपए की घटती कीमत का संकट नहीं है. यह हमारी भीतरी और चारित्रिक अर्थव्यवस्था के कमज़ोर होने का संकट है. इस संकट पर दुखी मत होईये, इसे अवसर मानिए. यह तय कीजिये कि हम सरकार के इन दस सूत्रों में नहीं फंसेंगे और अपने व्यक्तिगत व्यवहार और प्रतिबद्धता से इस संकट का सामना करेंगे.      

रूपए के इस संकट की जड़ों पर भी जाईये!




सचिन कुमार जैन

हम सब अखबार में पढ़ रहे हैं कि शेयर बाज़ार गिर रहा है, रूपया गिर रहा है, निर्यात घट रहा है, विदेशी मुद्रा का भण्डार खाली हो रहा है; मैं थोडा नासमझ हूँ. मेरा सवाल यह है कि पिछले २२ सालों में हमने जो विकास किया, अपने जो संसाधन विकास के नाम पर लुटाए, कारपोरेटों को राजस्व में छूट दी; वह सब कहाँ गया? घाटे की अर्थव्यावस्था को अभिव्यक्त कई बिन्दुओं से समझा जा सकता है. भारत की मौजूदा स्थिति में यह दिखा रहा है कि विदेशी निवेशक अब देश से अपना निवेश निकाल रहे हैं. उनका कहना है कि भारत में निवेश के लिए सकारात्मक माहौल नहीं है. कुडनकुलम से लेकर नियमागिरी से संघर्षों से यह तो स्पष्ट हो ही गया है कि हम एक सुसुप्त लोकतंत्र में नहीं रहते हैं. 12 ग्राम सभाओं ने बता दिया है कि उनकी और भारत की सरकारों की प्राथमिकताएं अलग हैं. इससे उन निवेशकों को पता चल रहा है कि यहाँ संसाधनों पर कब्ज़ा करना अब आसान नहीं रह गया है. बहरहाल तेलंगाना, जम्मू और आसाम में जो हालात बने हुए हैं, उनसे यह संकेत भी गया है कि देश में अभी अशांति का माहौल है; जबकि निवेश के लिए शान्ति होना जरूरी है. इन परिस्थितियों में पिछले कुछ दिनों में 50 हज़ार करोड़ रूपए की बिकवाली विदेशी निवेशकों ने की है.

घाटे की स्थिति को हम आयात-निर्यात संतुलन से भी जांचते हैं. आयात बहुत संकट पैदा नहीं करता यदि हमने अपने देश के भीतर की अर्थव्यवस्था को सम्मान दिया होता.  अपने लघु वनउपज, अपना हस्तशिल्प, अपनी देशी कपडा संस्कृति, अपना पर्यावरण, अपनी नदियाँ...इस्बसे ज्यादा पाने खेत और किसान. किसी भी अर्थ व्यवस्था की ताकत उसकी भीतरी अर्थव्यवस्था होता है. हमने उस ताकत को तोड़ दिया है.  यही कारण है कि हम आज अपना कुछ निर्यात कर पाने में सक्षम नहीं रह गए हैं. इतना ही नहीं हमने अपनी ताकत, यानी आपनी प्राकृतिक सम्पदा को बेंचना शुरू कर दिया. अपनी जमीन के भीतर दबी सम्पदा को बेतरतीब ढंग से लूट गया. नदियों से पानी और रेट लूटी गयी, पहाड़ों को डुबोया और खोखला किया गया, कोयला तो इतना निकला की अब अच्छी गुणवत्ता का कोयला बचा ही नहीं है. देश के लोगों, किसानों की जमीने और आदिवासियों से जंगल छीने और बड़ी कंपनियों और अमेरिका-यूरोपीय देशों को बेंचा. आज 3 बड़ी कम्पनियाँ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 80000 हेक्टेयर जमीन पर खुद खेती कर रही हैं. दूसरी तरफ 2.90 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं. इससे सरकार और बाज़ार को जो पैसा मिला उसे वे अपने विकास के मानक के रूप में पेश करते हैं.

आज जब हम यह कहते हैं की भुगतान संतुलन की स्थिति गड़बड़ा रही है, तो इसका मतलब ही यही होता है कि आयात ज्यादा हो रहा है और निर्यात कम. यह अंतर जितना बढ़ता जाएगा, अब संकट भी उतना ही बढेगा. आपको यह भी जान लेना चाहिए कि 1951 में भारत का आयात 608 करोड़ रूपए का था और निर्यात भी 608 करोड़ का. शायद तब हमारी अर्थव्यवस्था दुनिया में उतनी विश्वसनीय नहीं थी कि हम अपने विदेशी मुद्रा भंडार को पूरा दाँव पर लगा कर जरूरतों को पूरा करते; पर वहीँ एक मौका भी था कि हम. एक देश के रूप में पेट्रोलियम, बिजली, विलसित की वस्तुओं की वास्तविक जरूरतों का भी आंकलन करते और उन्हें सीमित रखते हुए विकास की नीतिगत परिभाषा बनाते. पर हमने तय किया कि हम अपनी जरूरतों को असीमित सीमा तक बढ़ाएंगे और उन्हे पूरा करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों से लेकर लोकतांत्रिक व्यवस्था तक सबकी बलि लेते जायेंगे.   

इस दौर में 2 करोड़ एकड़ कृषि और कृषि योग्य भूमि का उपयोग बदल दिया गया. 10 लाख हेक्टेयर जंगल कम हो गया और देश की हर नदी प्रदूषित कर दी गयी. इसके बाद भी हम वही आर्थिक विकास चाहते हैं जो हमें गुलामी से निकलने नहीं देता. सिर्फ एक उदाहरण देखिये.  वर्ष 2010 में जब अमेरिकी राष्ट्रपति भारत आये थे, तब मीडिया तो यह कह रहा था कि भारत एक महाशक्ति बन गया है इसलिए ओबामा आये हैं. पर यह सच नहीं था. वे तो अपनी अर्थव्यवस्था और बेरोज़गारी के संकट से उबारने के लिए भारत से संसाधन लूटने आये थे. उस यात्रा के दौरान ही खुदरा बाज़ार में 100 फीसदी विदेशी निवेश की नीति लागू करने का भारत पर दबाव बढ़ा. उन्होने तीन दिन में अमेरिकी बैंकों से भारत की 10 बड़ी कंपनियों को 30 बिलियन डालर रूपए का क़र्ज़ दिलवाया ताकि उनके बैंकों को बाज़ार मिले. रूपए के मुकाबले डालर की कीमत के बढने के कारण यह क़र्ज़ बढ़ कर 35 बिलियन डालर हो गया है. इस क़र्ज़ को देने के बाद उन्होने भारतीय कंपनियों से कहा कि वे अमेरिकी कम्पनिओं से ही खरीदी करें. इससे बोईंग, जनरल इलेक्ट्रिक, डूपों को 20 हज़ार करोड़ रूपए का कारोबार मिला. ओबामा उस यात्रा में अमेरिका के लिए 50 हज़ार रोज़गार और 70 अरब रूपए का निवेश लेकर गए थे. वर्ष 2012-13 में अमेरिका सरकार ने अपनी अर्थव्यवस्था में 700 बिलियन डालर डाले हैं. वह क़र्ज़ सस्ते कर रहा है ताकि देश की भीतर निवेश बढे. भारत सरकार ने 2005 से 2012 तक बाज़ार को 29 लाख करोड़ की राजस्व छूट दी, पर किसानों को अब केवल क़र्ज़ मिलता है. पिछले 5 सालों में कृषि के लिए 12 लाख करोड़ का क़र्ज़ दिया गया है. सब्सिडी मिलती है – कारों के लिए, किसानों के लिए नहीं.

अमेरिका की अर्थनीतियों के कारण भारत में निवेश बढ़ा, जब 2008 में अमेरिका में मंदी आने लगी तब वहां ब्याज दरें बढ़ने लगीं। विदेशी निवेशकों ने भारत के बाजार से अपना पैसा निकालना शुरू कर दिया। इससे बैंकों में भी धन कम होने लगा। यह एक बनावटी वृद्धि थी। इस खोखली विकास दर का भारत सरकार खूब प्रचार कर रही थी। कर्ज देना तो आसान था, पर कर्ज चुकाना कई कारकों पर निर्भर करता है। जिनमें से एक है, अच्छा और सुनिश्चित रोजगार। कंपनियों ने अपनी उत्पादन लागत कम करने के लिए कामगारों की छटनी की, जिससे रोजगार में असुरक्षा बढ़ी। ऐसी स्थिति में जिन लोगों ने कर्ज लिया था, उन्हें कर्ज चुकाना भारी पड़ने लगा, जिससे अनुत्पादक सम्पत्तियां यानी एनपीए बढ़ा। भारत में लगभग डेढ़ लाख करोड़ रूपए का कर्ज वापस नहीं आया है। यह याद रखिए कि कर्ज वापस नहीं लौटाने वालों में बड़े उद्योगपति और पूंजीपति सबसे केंद्रीय भूमिका में हैं।


आखिर में थोड़ी आंकड़ों में बात करते हैं. 1951 में हम 5.08 करोड़ टन खाद्यान उत्पादन करते थे. यह अब 5 गुना बढ़ कर 25.74 करोड़ टन हो गया है. परन्तु 1951 में स्टील उत्पादन केवल 10 लाख टन होता था, जो अब 82 गुना बढ़कर 8.28 करोड़ टन हो गया है. सीमेंट 27 लाख टन बनती थी. इसमे 85 गुना बढौतरी हुई. अब 23.5 करोड़ टन सीमेंट बनती है. 1951 में 5 करोड़ किलोवाट बिजली की खपत होती थी; इसमे 175 गुना बढौतरी हुई है. अब हमारा देश 877 करोड़ किलोवाट बिजली की खपत करता है, यही रौशनी हमें दिखाई देती है.  1951 में हमारा विदेशी मुद्रा भण्डार 1.914 अरब डालर का था. इसमे 136 गुना की बढ़ोतरी हुई है. आज यह लगभग 280 अरब डालर का है. पर इसे नंगी अंकों से मत देखिये. इस अवधि में डालर के मुकाबले रूपया 13 गुना कमज़ोर हुआ है. 1950 में एक डालर 4.79 रूपए का था,  आज यह 64.50 रूपए का है. सीधी से बात यह है कि यदि भारत ने अपनी अंदरूनी और स्वाभाविक अर्थव्यवस्था को बचा कर रखा होता तो आज के विदेशी मुद्रा भण्डार का मूल्य 13 गुना ज्यादा होता. एक बात फिर भी साफ़ है कि देश उस स्थिति में नहीं है, जिस स्थिति में 1991 में था, लेकिन ये संकेत जरूर हैं, जिन्हे समझना होगा. आज हम केवल अपनी विकास की परिभाषा और उसके आधार पर अपनी नीतियों को बदल कर ही आने वाले समय को सुरक्षित बना सकते हैं. वर्ष 2004 से 2009 के बीच में 1.57 करोड़ लोग किसानी से बाहर कर दिए गए. निर्माण यानी कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में 2.6 करोड़ लोग आ गए यानी मजदूर बढ़ रहे हैं. हमें पेट्रोल और सोना तो ठीक खाने के लिए दाल और प्याज भी आयात करना पड़ती है. ऐसे में क्या यह समझना मुश्किल है कि क्यों कम इस आर्थिक संकट के शिकार बन रहे हैं? क्या यह संकट हमारी नीतियों की पैदाईश नहीं है?

यह बाज़ार नहीं, राजनीतिक अर्थव्यवस्था में सट्टे का खेल है.



सचिन कुमार जैन

अगर आप यह सोच रहे हैं कि रूपए की गिरती कीमत और अर्थव्यवस्था के संकट से अपने को क्या लेनदा-देना, तो आप गलत सोच रहे हैं. इससे पेट्रोल-डीज़ल मंहगा होगा, आयात होने वाला बना या कच्चा माला मंहगा होगा, सरकार को अपने द्वारा लिए गए कर्जे पर ज्यादा ब्याज देना पड़ेगा और इन सबसे अपना विदेशी मुद्रा का भण्डार खाली होता जाएगा. इन सबका बोझ लोगों पर आएगा और सरकार बाज़ार के खिलाड़ियों को राहत पैकेज देगी. इस संकट से कोई तो है जो सबसे ज्यादा फायदा उठाता है; क्या हमें नहीं पता कि वह कौन है?

देश की अपनी मुद्रा यदि कमज़ोर हो जाए तो इसका मतलब यह है कि अपनी अर्थ व्यवस्था पर उस देश का अपना नियंत्रण कमज़ोर हो रहा है. उसकी निर्भरता बाहरी अर्थव्यवस्था और अनिश्चित बाज़ार पर बढ़ रही है. दुनिया में वैश्विक बाज़ार में व्यापार में अम्रेरिकी डालर का महत्व अमेरिका के दुनिया पर जमे प्रभाव का सूचक भी है. हमें आज के बाज़ार और डालर की राजनीति पर दो नज़रिए से चर्चा करने की जरूरत है. पहला तो यह कि आज भारतीय मुद्रा यानी रूपए की कीमत डालर के मुकाबले इतनी कम क्यों हुई?; और दूसरा क्या डालर की राजनीति हमें अपनी विकास की परिभाषा और प्राथमिकताओं के बारे में कुछ सोचने के लिए मजबूर नहीं करती है?  मूलतः मैं यह मानता हूँ कि आर्थिक विकास और वृद्धि दर की परिभाषा एक तरह की सट्टेबाजी है. इस विकास में जो अस्तित्व में नहीं होता है, उसकी कीमत तय कर दी जाती है, कीमत बढ़ा दी जाती है और गिरा या कम कर दी जाती है. इसे सभ्य भाषा में वे शेयर बाज़ार और फ्यूचर ट्रेडिंग भी कहते हैं. जरा सोचिये, एक कंपनी स्टील बनाती है. उसके शेयर का भाव कल 100 रूपए था. आज 70 रूपए हो जाता है. एक दिन में क्या उसका उत्पादन इतना कम हो गया कि उसकी कीमत 30 फीसदी कम हो गयी? वास्तव में उसके उत्पादन या सेवा कीमत का पैमाना नहीं है. ये तो सट्टेबाज़ (आप ट्रेडर कह सकते हैं) तय करते हैं कि कंपनियों के कीमतों में क्या हेर-फेर हो. एक दिन में न तो देश में सेवा या वस्तु का उत्पादन बढ़ जाता है, न ख़त्म हो जाता है. पर अखबार की सुर्ख़ियों में एक शीर्षक होता है – निवेशकों के डेढ़ लाख करोड़ रूपए डूबे! यह किसी को पता नहीं होता कि ये डूब कर कहाँ गए?  हम ऐसे बाज़ार और उसमे होने वाले आर्थिक व्यवहार से देश की स्थिति, सुरक्षा और संभावना का आंकलन करते हैं. मैं अर्थशास्त्री नहीं हूँ और अपने अर्थशास्त्रियों को देख कर कभी होना भी नहीं चाहूँगा. मैं बहुत कुछ नहीं जानता हूँ इसलिए मेरे सवाल बहुत साधारण और बुनियादी से सवाल है. वर्ष 1991 में हमने एक देश के रूप में तय किया था कि भारत को हमें आर्थिक महाशक्ति बनाना है. इसका मतलब यह था कि लोगों के पास पैसा हो, साधन हों, सम्पन्नता हो. इन 22 वर्षों में देश में लोगों के पास पैसा आया, ऐसा अर्थशास्त्री बताते हैं. पैसा आया तो लोगों ने कारें खरीदीं. कईयों ने एकाध नहीं चार-पांच कारें ले लीं. वे हवाई जहाज़ में सफ़र करने लगे. बाहर कितनी ही गर्मी हो, एयर कंडीशनर से उनके हरम ठंडे रहने लगे. जंगल काट कर वहां कारखाने लग गए. लोगों ने अपने घरों में खूब सारी लाइटें भी लगा लीं. हम भारतीय हैं और भारतीय लोग सोने से खूब प्यार करते हैं, तो उन्होने खूब सोना भी खरीदा. जब पैसा आया तो यह तो किया ही जाना चाहिए न! अब ऐसा करेंगे तो पेट्रोल और डीज़ल खूब चाहिए. यह हमारे यहाँ ज्यादा नहीं होता है और हम आयात करते हैं. आपके धनवान होने के बाद हमारा पेट्रोलियम आयात 4 गुना बढ़ गया. इस आयत के लिए हम जो भुगतान करते हैं, वह रूपए में नहीं डालर में होता है. पहले, जब डालर 25 रूपए का था तब हम एक बेरल तेल के लिए 60 डालर यानी 1500 रूपए देते थे, जब डालर 60 रूपए का हो गया तो हम एक बेरल तेल के लिए डालर उतना ही चुकाते हैं पर रूपए में 3600 रूपए चुकाते हैं. इसी दौर में तेल कीमत भी बढ़ गयी तो हम 6500 रूपए चुका रहे हैं. अब सरकार दुखी है कि पेट्रोलियम आयात पर हमें 1 लाख करोड़ रूपए सरकारी खजाने से तो खर्च करना ही पड़ रहे हैं, साथ में भारत सरकार के खजाने में रखा डालर भी कम हो रहा है.


वृद्धि दर 8 और 9 प्रतिशत हो गयी तो हमने सोना भी खूब खरीदा. एक साल में 200, 300, 400 टन सोना हमने खरीदा. अब सोना भी हम पैदा नहीं करते हैं. यह भी आयात किया जाता है. जब आयात होगा तो और डालर खर्च होगा. हो भी रहा है. अब सरकार दुखी है कि आयात बढ़ रहा है और अपना डालर जा रहा है. अब हम विदेशी फल जैसे कीवी खाते हैं, विदेशी परफ्यूम लगाते हैं, विदेशी शराब पीते हैं, कपडे भी विदेशी पहनते हैं, क्योंकि हमने 8 और 9 प्रतिशत की दर से आर्थिक विकास किया है. इसके लिए फिर आयात होता है और डालर जाता है. इस सब पर हम 2 लाख 2 हज़ार करोड़ रूपए के बराबर के डालर खर्च करते हैं. हमारा चालू खाता घाटा मार्च 2013 में 88 अरब डालर का था, जिसे सरकार 70 अरब डालर पर लाना चाहती है. 18 अरब डालर की इस बचत के लिए अब कहा जा रहा है कि सुधार के बड़े कदम उठाए जाएँ. ये बडे कदम क्या हैं? पहला – पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें बढ़ाना, विनिवेश (यानी सरकारी उपक्रमों में से सरकारी हिस्सेदारी) को बेंचना, खुदरा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए नियमों को और कमज़ोर करना, वेदांत सरीखी कंपनियों को जमीन और जंगल के अधिग्रहण में मदद करना यानी लोगों को बलपूर्वक तरीके से विस्थापित करना और एक बार फिर बड़ी कम्पनियों को सरकारी खजाने से राहत पैकेज देना.  यादी रखिये की भारत के मौजूदा राजनीतिक माहौल में इनमे से कोई भी कदम उठाना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा है इसलिए बाज़ार में मंहगाई और अनिश्चितता का माहौल बनाया जा रहा है ताकि सुधार के इन तथाकथित क़दमों की खिलाफत का माहौल न बने. आशंका है कि मौजूदा आर्थिक हालातों का फायदा यह सरकार जरूर उठाएगी. हम सब को पता है कि संसद में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक और भूमि अधिग्रहण का विधेयक अटके हुए हैं ये दोनों विधेयकों का क़ानून बनना देश के लिए कितना जरूरी है, यह बहस का मामला है, पर राजनीतिक खेल के लिए जरूरी है. आज जिस तरह का माहौल बना दिया गया है उससे यह लगता है कि इन विधेयकों को पारित होने से रोकने के लिए माहौल बनाया गया लगता है. खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, परमाणु उर्जा के लिए संयंत्र लगाने और भीमकाय कारपोरेटों को चूना पत्थर, कोयले, बाक्साईट और धातुओं के खनन को खुली छूट देने के लिए भी यह माहौल बनाया गया है. भारत में मंदी इसलिए आई क्योंकि विदेशी निवेशक अपना पैसा निकाल रहे हैं; क्या भारत के किसानों, लघु उद्द्योग और स्थानीय सेवा क्षेत्र का कोई महत्व नहीं रहा?  हम खाद्यान्न उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर हैं, हमारे यहाँ अब खूब डाक्टर हैं, हम यदि खेती क्षेत्र और लघु उद्योगों को सच्चा संरक्षण दे दें, तो डालर की कोई जरूरत नहीं पडेगी. संकट सरकार की नैतिकता और मानसिकता का है, जो गुलामी को विकास मानती है और स्वाबलंबन को पिछड़ापन. अब हमें खुद तय करना है कि कौन से संकट से कैसे निपटना है?

Wednesday, 12 June 2013

अन्नपूर्णा नहीं हैं ये सरकारें!



सचिन कुमार जैन

मैं पिछले ३ महीनों से मध्यप्रदेश में एक सरकारी विज्ञापन देख रहा हूँ, जिस पर लिखा है – एक दिन की मजदूरी में पूरे महीने का राशन”. यह मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री अन्नपूर्ण योजना का विज्ञापन है. इसमे सरकार ने गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को १ रूपए किलो गेहूं और २ रूपए किलो चावल देने वाला कार्यक्रम शुरू किया है. माफ कीजियेगा; कोई कार्यक्रम शुरू नहीं किया है बल्कि पहले से चल रही सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी सस्ते राशन की दुकान वाली योजना में कुछ फेरबदल किया है. फेर बदल यह है कि दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार गरीबों को ५ रूपए किलो गेहूं और ६.५० रूपए किलो चावल देती है, भोपाल में बैठी मध्यप्रदेश सरकार ने इस राशि को कम करके  १ रूपए और २ रूपए कर दिया. यानी लोगों को राहत मिली; पर क्या इसे अधिकार माना जाएगा? हमारा राज्य भोजन के अधिकार को भोजन की खैरात में तब्दील कर रहा है, जिसमे जरूरत पूरी करने के लिए व्यावस्था नहीं बनायी जाती, बल्कि सरकार अपनी सहूलियत और आत्ममुग्धता के आधार पर व्यवस्था बनाती है. सवाल यह भी है कि क्या मध्यप्रदेश में सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी से जूझ रही ८९ प्रतिशत जनसँख्या को पोषण (सम्मानजनक जीवन के लिए भोजन का पोषण युक्त होना जरूरी है) का अधिकार मिल पायेगा? केवल गेहूं और चावल से कुपोषण तो मिटेगा नहीं, तब सरकार पोषण आहार के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों के पक्ष में खड़ी हो जायेगी. मध्यप्रदेश सरकार के भोजन के अधिकार के इस दावे और १० जून २०१३ को भोपाल में जारी हुए जनगणना के नए आंकड़ों के बीच के संबंधों को भी देखिये. वर्ष २००१ में कुल कार्यशील जनसँख्या में से ४२.८ प्रतिशत लोग कृषक थे. यह संख्या २०११ में घट कर ३१.२ प्रतिशत पर आ गई. अब सवाल यह कि ये ११ प्रतिशत किसान कहाँ गए? वर्ष २००१ में कुल कार्यशील जनसँख्या में से २८.७ प्रतिशत लोग खेतिहर मजदूर थे, जो २०११ में बढ़ कर ३८.६ प्रतिशत हो गए.  किसान खेत के मालिक से खेत का मजदूर बन रहा है और मध्यप्रदेश सरकार इसकी क्षतिपूर्ति राशन की कीमत कम करके करने की कोशिश में जुटी हुई है.

मैं कुछ सवालों के जवाब दे देना चाहता हूँ. पहला तो यह कि मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना में महज २० किलो गेहूं और चावल मिलता है; यानी एक सदस्य को एक दिन के लिए १३३ ग्राम गेहूं. इससे ४ रोटियां बनती हैं. क्या ४ रोटियों से एक परिवार को भूख और पोषण की कमी से मुक्त किया जा सकता है? भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के मुताबिक भारत की परिस्थितियों में एक वयस्क को प्रतिदिन ४६६ ग्राम अनाज खाने को मिलना चाहिए.  मध्यप्रदेश सरकार इस जरूरत का एक तिहाई से भी कम दे रही है; पर विज्ञापन कहता है एक दिन की मजदूरी में पूरे दिन का राशन दे रही है सरकार!
दूसरी बात यह कि घर के राशन का मतलब केवल गेहूं, चावल और नमक नहीं होता है. भारत सरकार लगातार इस तथ्य  की उपेक्षा करती रही है कि कुपोषण से मुक्ति के लिए अनाज की मात्रा को बढाते हुए सस्ते राशन के कार्यक्रम में दालों और खाने के तेल को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए. केंद्र सरकार के अमानवीय रवैय्ये के सन्दर्भ में मध्यप्रदेश की योजना में इन दोनों वस्तुओं का समावेश करके जनोन्मुखी राजनीति का उदाहरण पेश कर सकती थी मध्यप्रदेश सरकार; पर ऐसा नहीं किया गया. जबकि दावा यह किया जा रहा है कि दालों और तिलहन के उत्पादन के मामले में हमारा राज्य देश में सबसे ऊपर है. वर्ष २०१२ में राज्य की कृषि  विकास दर १८ प्रतिशत रही; खेती के विकास में केवल गेंहू और चावल का ही योगदान नहीं रहा है. खेती का परिणाममूलक विकास उसे माना जाएगा जो भुखमरी और कुपोषण को खत्म करने में सीधी भूमिका निभाए.

तीसरी बात जो सबको जान लेना चाहिए कि मध्यप्रदेश सरकार सस्ते राशन की कीमत को और कम क्यों कर रही है; जबकि वास्तव में उसे हर परिवार को मिलने वाली अनाज की मात्रा को बढ़ाना चाहिए था. पीडीएस के तहत हर गरीब (इसका अब तक सही आंकलन नहीं हुआ है कि कौन गरीब है और किन आधारों पर) परिवार को ३५ किलो राशन दिया जाएगा, पर मध्यप्रदेश में २० किलो अनाज ही दिया जाता है. कारण यह है कि भारत सरकार ४२ लाख परिवारों को ही गरीब मान कर ३५ किलो राशन देती है, जबकि मध्यप्रदेश में ७० लाख परिवार गरीबी की रेखा में दर्ज हैं, इसलिए सबको ३५ किलो अनाज देने के बजाये वह २०-२० किलो का प्रावधान करके कार्यक्रम चला रही है. यह सर्वोच्च न्यायलय के आदेश (२००८) का उल्लंघन भी है. मध्यप्रदेश सरकार कीमत कम करने में राज्य सरकार के जिन संसाधनों का उपयोग कर रही है उसका उपयोग मात्रा को बढाने में किया जा सकता था.  यदि पीडीएस में ३५ किलो अनाज ५ रूपए के मान से भी दिया जाता तो १७५ रूपए खर्च होते; अभी की स्थिति में लोगों को १६ रूपए के मान से १५ किलो अनाज खरीदने में (पीडीएस से एक रूपए किलो और बाज़ार की खरीदी मिला कर) २६० रूपए खर्च करना पड़ रहे हैं. गरीबी की रेखा का जाल मध्यप्रदेश में अब भी ३० लाख लोगों की गर्दन फंसाए रखेगा. जिन आधारों पर यह रेखा खींची जाती है, वह रेखा वास्तव में भुखमरी की कगार पर रहने वाले नागरिकों की पहचान के लिए ही उपयुक्त है. वर्ष २००९ से गरीबी के नए मापदंडों और गरीबों की पहचान के तरीकों पर काम होना शुरू हुआ. ३ समितियां बनीं. अंततः योजना आयोग की दुराचारों की वजह से गरीबी की रेखा विवाद में फँसी और गरीब भूख के जाल में. यह मामला लोगों को केवल सस्ते राशन से ही वंचित नहीं करता है बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा के हकों से भी दूर हटाता है. यानी लोग वंचितपन के दुष्चक्र में फंसते हैं और फंसे रह जाते हैं.  

ऐसा नहीं है कि सरकार को ये सारे गणित पता नहीं है; गणित पर राजनीति का शासन है. कीमत कम करने से मध्यप्रदेश सरकार यह दावा कर सकती है कि राज्य सरकार यह योजना चला रही है; और यदि वह अपने संसाधन जोड़ कर भी ५ रूपए किलो के मान से ३५ किलो अनाज देती रहेगी तो वह लोगों के बीच जाकर या अखबारों में मंहगे विज्ञापन देकर यह नहीं कह सकती थी कि उसने कोई नया काम किया है; क्योंकि यह योजना तो पहले से चल रही है और यदि किसी विसंगति को दूर करने के लिए उसने कोई अतिरिक्त संसाधन खर्च किये भी तो यह उसका प्रशासकीय उत्तरदायित्व बनता. यह प्रकरण बहुत साफ़ है, सरकार अपनी योजना इस आधार पर बनाती है कि एक अच्छा राजनीतिक नारा कैसे बन सकता है; बस इससे ज्यादा कुछ और नहीं.


Tuesday, 4 June 2013

गरीबी की परिभाषा





गरीब तो विकास करते समाज के
खूबसूरत चेहरे पर काले तिल की तरह है
जो असमानता को सौंदर्य प्रदान करता है;

गरीबी तो राजनीति से उपजी कीचड़ है
जैसे प्रकृति कीचड में कमल खिलाती है
वैसे ही सत्ता इस गरीबी के कीचड़ में
उपनिवेश के सुन्दर नयनाभिराम कमल खिलाती है;

गरीब तो स्वर्ग की नृत्य करती
अप्सराओं की तरह है
जो दिल्लिओं में सजे दरबारों में
बिराजमान इन्द्रों के समक्ष
मृत्यु का नृत्य करने के लिए नियुक्त हैं;

राजनीतिक अर्थव्यवस्था में गरीब
रेगिस्तान में दिखाई देने वाली
मृग मरीचिका की तरह है,
जो पैदा होती है
होने का भ्रम उत्पन्न करती है
और अपने आप विलीन हो जाती है,
भ्रमों में पड़ कर
कोई नीति नहीं बनायी जाना चाहिए;

वक्त बदला है आप बस इतनी बदल जाईये
अब गरीब को आप सीधे गुलाम मत बनाइये,
वह अब साक्षर है, गुलामी बनाए रखने के लिए
उसे सहभागी और हितग्राही के रास्ते से
अपने पिंजरे की तरफ बुलाईये,

उदारवादी सफेदी पसंद समाज के लिए
गरीब उस अनिवार्य तिलचट्टे की तरह है,
जिसका होना अनादी अनंत है,
ताकि वह उनका मल खाता रहे
एक बुनियादी मूल्य की तरह,

विद्वानों के लिए गरीबी
विचार सौष्ठव का उपकरण है,
सिद्धांत के साथ गरीबी पर झूठ की
एक और परत चढ़ाना
उनकी उपलब्धि बन जाती है,

गरीबों को भी पता है वे पेशा हैं
और बसा हुआ है बाज़ार उनके चित्रों का
गांव से लेकर धरती के आखिरी कोने तक,

सरकारों के लिए जरूरी है
गरीबी का बने रहना
ताकि चुनाव लड़े जा सकें
उपनिवेशवादी लोकतंत्र
गरीबों को खाकर जिन्दा रहता है;