Wednesday, 12 June 2013

अन्नपूर्णा नहीं हैं ये सरकारें!



सचिन कुमार जैन

मैं पिछले ३ महीनों से मध्यप्रदेश में एक सरकारी विज्ञापन देख रहा हूँ, जिस पर लिखा है – एक दिन की मजदूरी में पूरे महीने का राशन”. यह मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री अन्नपूर्ण योजना का विज्ञापन है. इसमे सरकार ने गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को १ रूपए किलो गेहूं और २ रूपए किलो चावल देने वाला कार्यक्रम शुरू किया है. माफ कीजियेगा; कोई कार्यक्रम शुरू नहीं किया है बल्कि पहले से चल रही सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी सस्ते राशन की दुकान वाली योजना में कुछ फेरबदल किया है. फेर बदल यह है कि दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार गरीबों को ५ रूपए किलो गेहूं और ६.५० रूपए किलो चावल देती है, भोपाल में बैठी मध्यप्रदेश सरकार ने इस राशि को कम करके  १ रूपए और २ रूपए कर दिया. यानी लोगों को राहत मिली; पर क्या इसे अधिकार माना जाएगा? हमारा राज्य भोजन के अधिकार को भोजन की खैरात में तब्दील कर रहा है, जिसमे जरूरत पूरी करने के लिए व्यावस्था नहीं बनायी जाती, बल्कि सरकार अपनी सहूलियत और आत्ममुग्धता के आधार पर व्यवस्था बनाती है. सवाल यह भी है कि क्या मध्यप्रदेश में सूक्ष्मपोषक तत्वों की कमी से जूझ रही ८९ प्रतिशत जनसँख्या को पोषण (सम्मानजनक जीवन के लिए भोजन का पोषण युक्त होना जरूरी है) का अधिकार मिल पायेगा? केवल गेहूं और चावल से कुपोषण तो मिटेगा नहीं, तब सरकार पोषण आहार के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों के पक्ष में खड़ी हो जायेगी. मध्यप्रदेश सरकार के भोजन के अधिकार के इस दावे और १० जून २०१३ को भोपाल में जारी हुए जनगणना के नए आंकड़ों के बीच के संबंधों को भी देखिये. वर्ष २००१ में कुल कार्यशील जनसँख्या में से ४२.८ प्रतिशत लोग कृषक थे. यह संख्या २०११ में घट कर ३१.२ प्रतिशत पर आ गई. अब सवाल यह कि ये ११ प्रतिशत किसान कहाँ गए? वर्ष २००१ में कुल कार्यशील जनसँख्या में से २८.७ प्रतिशत लोग खेतिहर मजदूर थे, जो २०११ में बढ़ कर ३८.६ प्रतिशत हो गए.  किसान खेत के मालिक से खेत का मजदूर बन रहा है और मध्यप्रदेश सरकार इसकी क्षतिपूर्ति राशन की कीमत कम करके करने की कोशिश में जुटी हुई है.

मैं कुछ सवालों के जवाब दे देना चाहता हूँ. पहला तो यह कि मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना में महज २० किलो गेहूं और चावल मिलता है; यानी एक सदस्य को एक दिन के लिए १३३ ग्राम गेहूं. इससे ४ रोटियां बनती हैं. क्या ४ रोटियों से एक परिवार को भूख और पोषण की कमी से मुक्त किया जा सकता है? भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के मुताबिक भारत की परिस्थितियों में एक वयस्क को प्रतिदिन ४६६ ग्राम अनाज खाने को मिलना चाहिए.  मध्यप्रदेश सरकार इस जरूरत का एक तिहाई से भी कम दे रही है; पर विज्ञापन कहता है एक दिन की मजदूरी में पूरे दिन का राशन दे रही है सरकार!
दूसरी बात यह कि घर के राशन का मतलब केवल गेहूं, चावल और नमक नहीं होता है. भारत सरकार लगातार इस तथ्य  की उपेक्षा करती रही है कि कुपोषण से मुक्ति के लिए अनाज की मात्रा को बढाते हुए सस्ते राशन के कार्यक्रम में दालों और खाने के तेल को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए. केंद्र सरकार के अमानवीय रवैय्ये के सन्दर्भ में मध्यप्रदेश की योजना में इन दोनों वस्तुओं का समावेश करके जनोन्मुखी राजनीति का उदाहरण पेश कर सकती थी मध्यप्रदेश सरकार; पर ऐसा नहीं किया गया. जबकि दावा यह किया जा रहा है कि दालों और तिलहन के उत्पादन के मामले में हमारा राज्य देश में सबसे ऊपर है. वर्ष २०१२ में राज्य की कृषि  विकास दर १८ प्रतिशत रही; खेती के विकास में केवल गेंहू और चावल का ही योगदान नहीं रहा है. खेती का परिणाममूलक विकास उसे माना जाएगा जो भुखमरी और कुपोषण को खत्म करने में सीधी भूमिका निभाए.

तीसरी बात जो सबको जान लेना चाहिए कि मध्यप्रदेश सरकार सस्ते राशन की कीमत को और कम क्यों कर रही है; जबकि वास्तव में उसे हर परिवार को मिलने वाली अनाज की मात्रा को बढ़ाना चाहिए था. पीडीएस के तहत हर गरीब (इसका अब तक सही आंकलन नहीं हुआ है कि कौन गरीब है और किन आधारों पर) परिवार को ३५ किलो राशन दिया जाएगा, पर मध्यप्रदेश में २० किलो अनाज ही दिया जाता है. कारण यह है कि भारत सरकार ४२ लाख परिवारों को ही गरीब मान कर ३५ किलो राशन देती है, जबकि मध्यप्रदेश में ७० लाख परिवार गरीबी की रेखा में दर्ज हैं, इसलिए सबको ३५ किलो अनाज देने के बजाये वह २०-२० किलो का प्रावधान करके कार्यक्रम चला रही है. यह सर्वोच्च न्यायलय के आदेश (२००८) का उल्लंघन भी है. मध्यप्रदेश सरकार कीमत कम करने में राज्य सरकार के जिन संसाधनों का उपयोग कर रही है उसका उपयोग मात्रा को बढाने में किया जा सकता था.  यदि पीडीएस में ३५ किलो अनाज ५ रूपए के मान से भी दिया जाता तो १७५ रूपए खर्च होते; अभी की स्थिति में लोगों को १६ रूपए के मान से १५ किलो अनाज खरीदने में (पीडीएस से एक रूपए किलो और बाज़ार की खरीदी मिला कर) २६० रूपए खर्च करना पड़ रहे हैं. गरीबी की रेखा का जाल मध्यप्रदेश में अब भी ३० लाख लोगों की गर्दन फंसाए रखेगा. जिन आधारों पर यह रेखा खींची जाती है, वह रेखा वास्तव में भुखमरी की कगार पर रहने वाले नागरिकों की पहचान के लिए ही उपयुक्त है. वर्ष २००९ से गरीबी के नए मापदंडों और गरीबों की पहचान के तरीकों पर काम होना शुरू हुआ. ३ समितियां बनीं. अंततः योजना आयोग की दुराचारों की वजह से गरीबी की रेखा विवाद में फँसी और गरीब भूख के जाल में. यह मामला लोगों को केवल सस्ते राशन से ही वंचित नहीं करता है बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा के हकों से भी दूर हटाता है. यानी लोग वंचितपन के दुष्चक्र में फंसते हैं और फंसे रह जाते हैं.  

ऐसा नहीं है कि सरकार को ये सारे गणित पता नहीं है; गणित पर राजनीति का शासन है. कीमत कम करने से मध्यप्रदेश सरकार यह दावा कर सकती है कि राज्य सरकार यह योजना चला रही है; और यदि वह अपने संसाधन जोड़ कर भी ५ रूपए किलो के मान से ३५ किलो अनाज देती रहेगी तो वह लोगों के बीच जाकर या अखबारों में मंहगे विज्ञापन देकर यह नहीं कह सकती थी कि उसने कोई नया काम किया है; क्योंकि यह योजना तो पहले से चल रही है और यदि किसी विसंगति को दूर करने के लिए उसने कोई अतिरिक्त संसाधन खर्च किये भी तो यह उसका प्रशासकीय उत्तरदायित्व बनता. यह प्रकरण बहुत साफ़ है, सरकार अपनी योजना इस आधार पर बनाती है कि एक अच्छा राजनीतिक नारा कैसे बन सकता है; बस इससे ज्यादा कुछ और नहीं.


Tuesday, 4 June 2013

गरीबी की परिभाषा





गरीब तो विकास करते समाज के
खूबसूरत चेहरे पर काले तिल की तरह है
जो असमानता को सौंदर्य प्रदान करता है;

गरीबी तो राजनीति से उपजी कीचड़ है
जैसे प्रकृति कीचड में कमल खिलाती है
वैसे ही सत्ता इस गरीबी के कीचड़ में
उपनिवेश के सुन्दर नयनाभिराम कमल खिलाती है;

गरीब तो स्वर्ग की नृत्य करती
अप्सराओं की तरह है
जो दिल्लिओं में सजे दरबारों में
बिराजमान इन्द्रों के समक्ष
मृत्यु का नृत्य करने के लिए नियुक्त हैं;

राजनीतिक अर्थव्यवस्था में गरीब
रेगिस्तान में दिखाई देने वाली
मृग मरीचिका की तरह है,
जो पैदा होती है
होने का भ्रम उत्पन्न करती है
और अपने आप विलीन हो जाती है,
भ्रमों में पड़ कर
कोई नीति नहीं बनायी जाना चाहिए;

वक्त बदला है आप बस इतनी बदल जाईये
अब गरीब को आप सीधे गुलाम मत बनाइये,
वह अब साक्षर है, गुलामी बनाए रखने के लिए
उसे सहभागी और हितग्राही के रास्ते से
अपने पिंजरे की तरफ बुलाईये,

उदारवादी सफेदी पसंद समाज के लिए
गरीब उस अनिवार्य तिलचट्टे की तरह है,
जिसका होना अनादी अनंत है,
ताकि वह उनका मल खाता रहे
एक बुनियादी मूल्य की तरह,

विद्वानों के लिए गरीबी
विचार सौष्ठव का उपकरण है,
सिद्धांत के साथ गरीबी पर झूठ की
एक और परत चढ़ाना
उनकी उपलब्धि बन जाती है,

गरीबों को भी पता है वे पेशा हैं
और बसा हुआ है बाज़ार उनके चित्रों का
गांव से लेकर धरती के आखिरी कोने तक,

सरकारों के लिए जरूरी है
गरीबी का बने रहना
ताकि चुनाव लड़े जा सकें
उपनिवेशवादी लोकतंत्र
गरीबों को खाकर जिन्दा रहता है;