Monday, 13 October 2014

जंगल से एकतरफा संवाद – चार



भूगोल का आध्यात्म
सचिन कुमार जैन 
ये जंगल, ये पर्वत और झरने हमें आध्यात्म का विषय लगते हैं, परन्तु इसे पहले ये भूगोल का विषय हैं  और आध्यात्म भूगोल का विषय भी है जब इन इन दृश्यों को मैने भूगोल के साथ जोड़ा तो इन पर्वतों की ऊँचाई से ज्यादा गहराई का अंदाज़ा हुआ। वास्तव में आज भारत पृथ्वी के जिस हिस्से पर है (यानी एशिया में) बहुत साल पहले ये यहाँ नहीं थे 22.5 करोड़ साल पहले यह आस्ट्रेलियाई तटों के आस पास तैरता एक द्वीप था टेथिस महासागर इसे एशिया से अलग करता था इसका जुड़ाव एशिया से नहीं थामैं धौलागिरी अंचल के जिन ऊँचे पहाड़ों को देख रहा था, वे लाखों साल पहले कहीं अस्तित्व में थे ही नहीं भारत तब गोंडवाना या गोंडवाना भूमि का हिस्सा थागोंडवाना भूमि में शामिल थे – दक्षिण के दो बड़े महाद्वीप और आज के अंटार्कटिका, मेडागास्कर, भारत, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे देशों से मिलकर बनी हुई भूमि गोंडवाना अंचल का अस्तित्व 57 से 51 करोड़ साल पहले माना जाता है आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक एडवर्ड सुएस ने यह नाम दिया था, जिसका मतलब होता है गोंडों का जंगल। एक बात और जानने लायक है कि आज जिस जमीन, जिस सीमा रेखा और राजनीतिक नक़्शे के लिए लोग लड़ रहे हैं, वह पहले ऐसा नहीं था और आगे भी ऐसा नहीं होगा। भू-भाग बदलते रहे हैं और आगे भी बदलते रहेंगे। फिर यह बदलाव चाहे एक या दो करोड़ सालों में ही क्यों न हो। यह कैसा राष्ट्रवाद, जबकि राष्ट्र की कोई स्थाई सीमा-रेखा ही नहीं है। बस जंगल, पहाड़, हवा, बूँद की बात कीजिये, वही हमारे अस्तित्व को जिन्दा रखेंगे; हमारे न होने के बाद भी।   



अपनी इस धरती की ऊपरी सतह को भू पटल कहते हैं इसमें एल्यूमीनियम, सिलिकान, लोहा, कैल्शियम, सोडियम, पौटेशियम और आक्सीजन सरीखे तत्व होते हैं भूपटल के नीचे की सतह को स्थलमंडल कहते है यही महाद्वीपों और महासागरों को आधार देता हैइसकी मोटाई साधारणतः 100 किलोमीटर या इससे कुछ ज्यादा हो सकती है इस आवरण में मजबूत चट्टानें होती हैं धरती में स्थलमंडल के नीचे की परत को दुर्बलतामंडल कहते हैं यह परत द्रवीय या तरल होती है मज़बूत चट्टानों वाला स्थलमंडल इसी परत पर तैरता रहता है स्थलमंडल में बहुत मजबूत चट्टानें होती है, जो तश्तरियों या प्लेट के रूप में होती हैं ये तश्तरियां (जिन्हें टेक्टोनिक प्लेट कहते हैं) स्थिर न होकर गतिमान होती हैं यानी भू-गर्भीय घटनाओं और परतों की चारित्रिक विशेषताओं के कारण खिसकती रहती हैं टेक्टोनिक प्लेटों की गतिशीलता के कारण कई महाद्वीप मिल कर तीन लाख साल पहले विशाल पेंजिया महाद्वीप (उस समय का सबसे बड़ा महाद्वीप, जो कई द्वीपों से मिलकर बना था) बन गए थे
स्पष्ट अर्थों में भारत तब अफ्रीका से सटा हुआ था 20 करोड़ साल पहले धरती के अंदर ताप संचरण की क्रियाओं के फलस्वरूप होने वाली भू-गर्भीय घटनाओं के कारण यह ये महाद्वीप टूटने लगा और छोटे-छोटे द्वीपों में बंट कर अलग-अलग दिशाओं में जाने लगे तब 8.40 करोड़ साल पहले भारत ने उत्तर दिशा में बढ़ना शुरू किया अपने तब के स्थान से शुरू करके इसनें 6 हज़ार किलोमीटर की दूरी तय की और 4 से 5 करोड़ साल पहले एशिया के इस हिस्से से टकराया इस टक्कर के चलते भूमि का वह हिस्सा ऊपर की और उठने लगा दो महाद्वीपों के टकराने से प्लेटें एक दूसरे पर चढ़ने के कारण हिमालय बना जरा सोचिये कि ऊपर उठने का मतलब क्या है? इन पर्वतों पर समुद्री जीवों के अवशेष मिलते हैं हिमालय श्रृंखला के पर्वतों पर समुद्री जीवों के अवशेष....इन पहाड़ों की ऊपरी सतह के खिरने से जो पत्थर निकलते हैं, वे भी ऐसे गोल होते हैं, जैसे नदियों या बहते पानी में आकार लेते हैं, यानी ये हिस्सा कभी न कभी पानी में रहा है
माना जाता है कि भारत का भूभाग ज्यादा ठोस था और एशिया का नरम, इसलिए एशिया का भूभाग ऊपर उठाना शुरू हुआ और हिमालय पर्वतीय श्रृंखला की रचना हुई अन्य दूसरे पर्वतों की तुलना में यहाँ के पर्वतों की ऊंचाई ज्यादा तेज गति से बढ़ी और यह अब भी हर साल एक सेंटीमीटर की दर से बढ़ रही है इनकी ऊंचाई बढ़ती रहेगी क्योंकि भारतीय विवर्तनिक प्लेट (टेक्टोनिक प्लेट) भूकंपों के कारण अब भी धीमी गति से किन्तु लगातार उत्तर की तरफ खिसक रही है; यानी हिमालय अब भी और ऊँचा होगा तथ्य यह है की हमेशा से हिमालय की ऊंचाई 1 सेंटीमीटर की गति से नहीं बढ़ रही थी यदि यह गति होती तो 4 करोड़ सालों में हिमालय की ऊंचाई 400 किलोमीटर होतीपर्यावरणीय कारणों और अनर्थकारी मानव विकास की लोलुपता के चलते विवर्तनिक प्लेटों में ज्यादा गतिविधि हो रही है और भूकंपों के नज़रिए से यह क्षेत्र बहुत संवेदनशील हो गया है प्रकृति विरोधी विकास हमें विनाश की और ले जा रहा है किसी को संकेतों में बात समझ आती है तो इसका मतलब यह है कि पहाड़ों को काटने, नदियों को बाँधने और जंगलों को मिटाने का मतलब विकास नहीं है, यह खुद को मिटाने की भौतिक तैयारी है। इन्ही कारणों से हिमालय पर्वत बहुत विशाल होने के बावजूद, बहुत नाज़ुक पहाड़ भी है। बांधों, सड़कों या अन्य निर्माण कार्यों के लिए इसके किसी भी हिस्से पर विस्फोट, खुदाई, पेड़ों की कटाई होना या सुरंगें बनाया जाना बहुत खतरनाक है। जिस तरह से गंगा पर बाँध बनाये जा रहे हैं, उनसे केवल और केवल पहाड़ टूटेंगे, बाढ़ें आएँगी और लोग बहेंगे।
जब किसी आधुनिक वाहन में सपाट सड़क के रास्ते हम पर्यटन के लिए निकलते हैं, तब क्या हमें कभी यह अहसास होता है कि धरती के जिस हिस्से पर हम चल रहे हैं, उसका जीवन 4 से 5 करोड़ साल का हो चुका है वह पर्वत दो महाद्वीपों की टक्कर के कारण पैदा हुआ और ये कभी पानी में डूबा रहा होगा? यह तब तक पता नहीं चलता जब तक हम इसके साथ अपने भीतर के तत्वों को जोड़ नहीं लेते अपने भीतर के वही तत्व, जिन्हें हम सुबह-शाम पंच तत्व कहते हैं
साल 2013 में उत्तराखंड के बद्रीनाथ में बाढ़ आई थी। खुद तो देखी नहीं पर सुना बहुत और चित्र – चलचित्र भी खूब देखे। 300 गांवों के बहा ले जाने वाली धाराओं से उसकी भयावहता का अच्छे से अंदाज़ा लग गया। मैं समझ नहीं पाता था कि पहाड़ पर बाढ़ कैसे आएगी? वहाँ तो बारिश के पानी को रोकने के लिए कहीं कोई बाधाएं ही नहीं है। वहाँ तो पानी आना चाहिए और बह जाना चाहिए। बाढ़ यदि आये तो भी समतल इलाकों में आये, पहाड़ों में कैसे? परन्तु बात इतनी सीधी सी नहीं है। आम तौर पर मेघ बूँदें बरसाते हैं, पर जब बादल फटते हैं तो धाराएँ बरसती हैं। तो संकट की पहली तैयारी तो यह हुई कि मौसम का चक्र बदलने, जमीन और आकाश के रिश्तों में कड़वाहट आने (अब जमीन आसमान को गर्मी सौपती है और जहरीली गैसें भी) से मेघ गुस्सा रहे हैं। अब वे बूँदें नहीं तूफ़ान बरसाते हैं। यही उन्होंने बद्रीनाथ में किया। संकट की दूसरी तैयारी हमने उत्तरखंड के पहाड़ों में की, वहाँ के जंगल काट दिए और जला दिए। अब पानी की धार को कौन रोकेगा? ये धार बांधों से नहीं रुकने वाली। ये धार जल्दी ही बांधों को भी बहा कर ले जाने वाली है।

वर्ष 2013 में आई बाढ़ को अपवाद माना गया और सब सोचने लगे कि आपदा टल गयी, भले ही 2-4 हज़ार की जान लेकर; पर वर्ष 2014 में आपदा फिर से आई। इस बार कश्मीर की घाटी में। यहाँ भी वही बात मन में आई कि कश्मीर तो पहाड़ पर बसा है, पानी आएगा और बह कर नीचे चला जायेगा। यहाँ रुकेगा थोड़े, पर रुक गया और ऐसा रुका कि बस साड़े साती की तरह जम गया....लोग कह रहे हैं साड़े सात साल तक यह बाढ़ हर रोज दिन और रात हमारे साथ रहने वाली है। श्रीनगर का उदाहरण लीजिए। यह एक कटोरे के रूप में बसा हुआ शहर है। झेलम नदी इसके बीच से गुज़रती है। कहीं एकाध हिस्सा था, जहाँ से अतिरिक्त मात्रा में आया पानी बह कर निकल जाता था। वहाँ वर्ष 1902 में कुछ ऐसी की बाढ़ आई थी। फिर राजनीतिक उथल-पुथल हुई और अब भी चल रही है। सबने कहा कि विकास करेंगे, इससे स्थिरता आएगी। बस इसी विकास के चलते वो नहरें और धारा बिंदु मिटा दिए गए, जहाँ से श्रीनगर का पानी बाहर निकलता था। वहाँ इमारतें बन गयीं। सड़कें बन गयीं। तो यह चौथी तैयारी हमने की कि जब आपदा आएगी तो उसे निकलने के स्थान भी बंद कर दिए। हम विकास का यह गीत गाते हुए खुश हो रहे थे कि प्रकृति को उल्लू बनाया, बड़ा माजा आया.....! पर यह भ्रम था। आसाम और अरुणचल प्रदेश में भी पिछले साल बाढ़ आई थी और कोई 2 लाख लोग बर्बाद हो गए। इस साल फिर कश्मीर के बाद उत्तर-पूर्व में बाढ़ आ गयी। यह जान लीजिए कि बाढ़ या सूखा किसी भी क्षेत्र में यदि चरम की स्थिति में जा रहे हैं और बार-बार हो रहे हैं, तो इसका मतलब है कुछ गंभीर रूप से गडबड है। यह एक्ट आफ गाड (भगवान का किया-धरा) नहीं है। यह एक्ट आफ ह्यूमन बीईंग है यानी इंसान का किया-धरा। हम वास्तव में किसी को मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए अब बीमा कराया जाते है और सरकार मुआवजा देती है। राहत कार्यों से नदी की बाढ़, आसमान से बरसने वाले प्रलय और हिमालय की बढ़ती ऊंचाई को कुछ समझ पायेंगे क्या? हर बाढ़ अब पहाड़ों की एक परत को बहा ले जाती है। हर बाढ़ खेत की मिट्टी की सबसे जिन्दा परत को उखाड कर ले जाती है। इसका मतलब यह है कि एक बार की राहत या मुआवजे के अब कुछ न होगा। अगले साल बाढ़ न भी आई, तो खेतों में क्या और कितना उगेगा? किस सरकार या कंपनी में इतनी दम है कि वह उत्तराखंड के पहाड़ों का पुनर्निर्माण करने वाली परियोजना चला सके? या किसान के खेतों के लिए अपने कारखाने में मिट्टी बना सके! बाढ़ उतना बड़ा संकट नहीं है, संकट यह है कि हम विश्व निर्माण की मूल कथा और उसके विज्ञान को जानना नहीं चाहते हैं। जिस दिन हम यह जान लेंगे कि एक नया घर बनाते समय जो हम फेंक देते हैं, वह मलबा नहीं, बल्कि हमारे अपने अवशेष हैं। हमारा जीवन कुछ सालों का नहीं, बल्कि करोड़ों सालों सालों का है। कोई न्यायलय,कोई समिति और कोई सरकार इतनी ईमानदार नहीं है कि वह यह कह सके कि यह आपदा नहीं, हमारे अपराध हैं।

जंगल से एकतरफा संवाद – तीन



पहाड़ मरते नहीं हैं!
(नेपाल के हिमालयी धौलागिरी अंचल से  लौटकर सचिन कुमार जैन)
नेपाल के पोखरा से बाग्लुंग के बीच हिमालय और धौलागिरी पर्वत श्रृंखला के परिवार के सदस्य इन पहाड़ों पर कुछ घाव नज़र आने लगे हैं। ऊपरी चोटी तक पंहुचने के लिए सड़कें बन रही हैं। इन्हें बनाने के लिए बारूद से पहाड़ों को तोडा गया। इसका परिणाम यह हुआ कि पहाड के भीतर तरतीब से जमे हुए पत्थर और मिट्टी खुल गयी। बारिश अब उन खुले हिस्सों को और उघाड़ती जा रही है। जैसे-जैसे मिट्टी और छोटे-बड़े पत्थर बारिश के वार से निकलते हैं, पेड़ों की जड़ें भी नंगी होने लगती हैं। जब जड़ें बाहर आ जाती हैं, तो पेड़ मरने लगते हैं। जब पेड़ मरते हैं, तो जंगल मरता है। और जब जंगल मरता है तो क्या हमारा-तुम्हारा कुछ बचेगा। हम इस भुलावे में हैं कि हर बीमारी का इलाज़ है, पर यह सबसे बड़ा भ्रम है। बीमारी पैदा करना हमारे हाथ में है, उसे न पैदा करना हमारे हाथ में है, पर बीमारी का इलाज़ हमारे हाथ में नहीं है। बस हमें इतना समझना है कि सड़क बनाने के लिए हजारों किलोमीटर दूर किया गया बारूदी विस्फोट हमारी जिंदगी को भी दहलाता है। वह केवल पेड़ और पहाड़ को वस्त्रविहीन नहीं करता। वह हमारे कपड़े उतार रहा होता है।  दूर से देखो तो लगता है पहाड़ इन घावों से कारण कराह रहा है। उसे पेड़-तोड़ (वैसे ही जैसे हमें बाल के उखड जाने पर बाल-तोड़ होता है) हो रहा है। इन पहाड़ों की मरहम-पट्टी करना ही हमारी सबसे बड़ी परियोजना होना चाहिए, पर हो इसके उलट रहा है। इन पहाड़ों के कपड़े उतरना, जड़ों पर से मिट्टी के कपड़े उतरना और बारूद बिछाना ही हमारी सबसे बड़ी परियोजनाएं हैं। इन्हें हम विकास परियोजना कहते हैं। जिस विकास के परिणाम हमारे हाथ में ही न हों, उस तरह के विकास के मायने क्या हैं? क्या इससे पलायन रुकेगा, क्या इससे बीमारियाँ कम हो जायेंगी? क्या इससे गैर-बराबरी मिटेगी? क्या इससे साफ़ हवा और पानी मिलेगा? क्या सबको दो वक्त का भरपेट भोजन मिलेगा? क्या यह विकास समाज में सुरक्षा का अहसास पैदा कर पायेगा? इस सवाल का जवाब हमें खुद को देना है और खुद से लेना है; बस!

जंगल ने अपने होने या नदी ने भी अपने होने के लिए कभी किसी बस्ती को नहीं उजाड़ा। हमें लगता है, नदी-पहाड-जंगल को मिटा कर ही हमारी उन्नति हो सकती है। क्या उन्हें मिटाए बिना हमारी बस्ती का बसे रहना संभव नहीं है? यह सोच ही रहा था कि बादलों का झुण्ड भी पहाड़ों से मिलने चला आया। कोई खेल खेल रहे थे शायद।
नेपाल के काठमांडू से पश्चिम दिशा में लगभग 275 किलोमीटर दूर एक छोटा सा शहर है बाग्लुंग। शहर का छोटा होना ही अच्छा है, पर यहाँ के जंगल और पहाड़ अभूतपूर्व। इतने ऊँचे पहाड़ कम से कम मैने तो नहीं ही देखे हैं। बस एक बात और ये पहाड़ धौलागिरी हिमालय की श्रृंखला के पहाड़ हैं।।।।विशालकाय! इस नगरपालिका की जनसँख्या कोई 30 हज़ार है। इसकी एक बसाहट तातापानी में 64 परिवार रहते हैं। ये दलित हैं। एक तरफ तो इस गांव में हर घर में बिजली है। ज्यादातर प्रसव अस्पताल में होते हैं। पानी तो उनके अपना ही है। बच्चों को सालाना छात्रवृत्ति भी मिल जाती है। छोटे बच्चों को पोषण भत्ता भी मिल जाता है;  पर दूसरी तरफ इस दूरदराज पहाड़ी गांव के हर एक घर से एक व्यक्ति भारत, मलेशिया, क़तर या दुबई में है। काम की तलाश में। ज्यादातर 3 या 4 साल में घर आते हैं;  क्योंकि बस रोज़गार नहीं है। इस इलाके में दलित समुदाय और संगठनों ने हर ताकत के केंद्र को चुनौती दी और अस्पृश्यता यानी छुआछूत बंद करने के लिए मजबूर किया। कम से कम इस इलाके में तो कोई उनसे रिश्वत नहीं मांगता है। वे मानते हैं कि सत्ता में ऊपर अब भी ऊँची जाति के लोग बैठे हैं, वे दलितों को काम नहीं मिलने देते। उन्हें लगभग हर रोज 20-30 किलो वज़न उठाना ही नहीं पड़ता, बल्कि उसके साथ पहाड़ भी चढ़ना पड़ता है। फिर भी यह पूछे जाने पर कि क्या वे पहाड़ छोड़ कर समतल में जाना चाहेंगे? जवाब होता है - नहीं, बिलकुल नहीं! नदी, जंगल और पहाड़ हमारे लिए चुनौती नहीं, बल्कि हमारी ताकत हैं। हमारे लिए तो चुनौती अपना खुद का समाज है जो शोषण और छुआछूत को सत्ता का माध्यम मानता है। हमारा समाज यह क्यों नहीं समाज पाता कि महावीर, बुद्ध, कालिका, शिव और राम का भी जंगल के बिना के बिना कोई अस्तित्व नहीं है, तो उसका अस्तित्व इसके बिना कैसे बचा रहेगा? जंगल के बिना बुद्ध बुद्ध नहीं, राम राम नहीं, शिव शिव नहीं और महावीर महावीर नहीं। हमारे धर्म और श्रृद्धा की धुरी तो जंगल ही है। मैं अंदाज़ा लगा पाया कि हम पहाड़, नदी और पेड़ मिटाने से क्यों हिचकते नहीं हैं; क्योंकि हम अब आध्यात्म के विपरीत दिशा में बहुत दूर जा चुके हैं, जहाँ मुक्ति नहीं अकाट्य बंधन अंतिम लक्ष्य है।   
पहाड़, नदी और जंगल मिलकर धौलागिरी घाटी बनाते हैं। यहाँ का इंसानी समाज प्रकृति के इस निर्माण का मतलब समझता है। शायद यही कारण है कि सैकड़ों किलोमीटर की इस घाटी में, यहाँ से निकलने वाले झरनों, सड़कों और पगडंडियों के आसपास भी मूत्रपात करना वर्जित है। जंगल, पहाड़ और नदी की त्रिवेणी को देवी माना जाता है। शब्दों में उनके संतोष को कह पाना असंभव है। धरती पर कोई भी क्रिया या प्रतिक्रिया होने पर (धरती का गर्म होना या जलवायु परिवर्तन) पहाड़ को खत्म नहीं करेगी, समुद्र को खत्म नहीं करेगी, पानी को खत्म नहीं करेगी; यदि किसी का अंत होगा तो विकास करने वाले मानव समाज का। भू-भाग कहीं भी तैरता रहेगा, हम कहाँ तैरेंगे? पेड़ तो बीज बनकर बच जाता है, इंसान को फिरा पैदा होने के लिए पहले बन्दर बनना पड़ता है। जानवर बनने के लिए हम इतने तत्पर क्यों हैं?
मुझे तो यही लगता है कि हम अक्सर अपनी महफ़िलें सजा कर खुद ही गैर-हाज़िर रहते हैं। इन जंगलों की महफ़िल से आप गैर-हाज़िर नहीं हो सकते। यहाँ आपको हाज़िर होना ही पड़ेगा। यह हाजिरी इस बात का अहसास कराती है कि पनपते जाओ, देखते जाओ जाओ जैसा है उसे जानो और आगे बढ़ते जाओ। किसी को नकारो मत, उसे भी होने दो। बस इतना ध्यान रखना तुम्हारी कोई रचना, किसी के अस्तित्व के खात्मे पर न टिकी हो। बड़ा अजीब सा लगता है यह जानकर कि हम तो अक्सर उसे मोहब्बत करने के लिए खोजते हैं, जो हाज़िर नहीं है। जो मौजूद है उसे अपनाते नहीं हैं। ये जंगल न तो बाहर जाता है, न बाहर से किसी के आने का इंतज़ार करता है। यह तो बस भीतर है।

पत्ते, डालियाँ, घांस, टूटे तने, सब कुछ भारी मात्रा में जमीन पर गिरे पड़े थे। पानी भी बरसता ही रहा था। यानी उनके सड़ने (यह शब्द एक मनोवृत्ति का परिचायक है) के लिए माकूल व्यवस्था थी, पर वहाँ सडांध क्यों नहीं थी? वहाँ तो कोई कचरा (यह शब्द हमारे व्यवहार की कुछ परिणतियों का परिचायक है) उठाने और सुगंध छिडकने भी नहीं आता। इन सैंकडों किलोमीटर के पहाड़ी जंगलों में तो केवल सडांध ही होना चाहिए थी, पर लोग तो यहाँ खुशबु की तलाश में आते हैं और उसे पाते भी हैं। तो हमारे शहर या बस्ती में जो सडांध फैली है वह कहाँ से आती है? क्या हमारे व्यवहार और सोच से! यहाँ हमें वही रंग एक अलग अहसास क्यों देते है, वे जिन्दा क्यों लगते है; हमारी जिंदगी के रंग मर चुके हैं! अच्छे जीवन से हमारा आशय क्या है; प्रतिस्पर्धा, विद्वेष और भाव हिंसा? ये मेरे सवाल थे खुद से!         

जंगल से एकतरफा संवाद – दो


 (नेपाल के हिमालयी धौलागिरी अंचल से  लौटकर सचिन कुमार जैन)
नेपाल का धौलागिरी अंचल, जो अन्नपूर्णा पर्वत का आधार है, प्रकृति और मानव समाज को समझने के लिए सबसे उम्दा विश्वविद्यालय है। धौला गिरी शब्द की उत्पत्ति धवलसे हुई है, जिसका मतलब होता है बहुत चमकीला सफ़ेद; गिरीका मतलब पर्वत। धौलागिरी पर्वत का मतलब है दुनिया का सातवां सबसे ऊँचा पर्वत, जिसकी ऊंचाई 8167 मीटर यह एक अंचल माना जाता है, जिसमें नेपाल के चार जिले शामिल हैं। बाग्लुंग इनमें से एक है
हिमालयी पहाड़ों के हिमखंडों से निकल कर काली गण्डकी नदी अपनी पूरी तीव्रता से प्रवाहित हो रही है। जंगल और नदी के रिश्ते यह बता रहे हैं कि वे संसार को बनाए रखना चाहते हैं। नदी अपने रास्ते से नहीं भटकती, जब तक कोई जंगल पर आक्रमण करके उनका विनाश नहीं कर देता है। जंगल केवल जमीन के ऊपर ही थोड़े होता है। जंगल जमीन के भीतर भी उतना ही घना और गहरा होता है। जड़ें जमीन के अंदर फ़ैल कर मिट्टी को थाम लेती हैं। छोटे-छोटे कणों से मिट्टी को एक आधार बना देती हैं जड़ें और नदी में बह जाने से बचा लेती हैं। जंगल मूसलाधार और कभी-कभी कई दिनों तक होने वाली बारिश को भी थाम लेता।  यह लंबी यात्रा करके भारत के बिहार राज्य के हरिहर क्षेत्र (सोनेपुर) में गंगा नदी से मिल जाती है। उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश में जो गंगा दूषित और बीमार हो जाती है, वह गण्डकी से मिल कर पुनर्जीवन पाती है क्योंकि इस नदी को अब तक बाँधा नहीं गया है। दुखद यह है कि भारत की सरकार नेपाल को इस बात के लिए प्रेरित कर रही है कि वह गण्डकी सरीखी नदियों पर बाँध बनाये और बिजली पैदा करे। इससे हिमालय के पहाड़ कमज़ोर होंगे और प्राकृतिक आपदाएं आएँगी।
पहाड़ों के जंगल एक योजना बनाकर कोने-कोने में रातभर हुई बारिश की बूंदों को समेट ले रहे थे। कितनी व्यवस्थित है न यह प्रकृति। जब तक पानी जमीन से नहीं टकराता, तब तक बूँद ही बना रहता है। जमीन उसका रूप, आकार और प्रभाव ही बदल देती है और उसे धारा बना देती है। पता नहीं इन पहाड़ों का पेट कितना बड़ा होगा, जो बूंदों को धारा तो बना देता है, पर बाढ़ बनने से रोक देता है।
धौलागिरी हिमालयी पहाड़ों से ये धाराएँ निकलकर काली गण्डकी नदी में समा जाती हैं। एक धारा हो चाहे एक नदी, ये इंसान जानवरों, पेड़ों, पक्षियों, सरीसृपों, मछलियों और सूरज को उनका हिस्सा देती चलती हैं। कोई उससे उसका प्रवाह, उसकी निर्मलता, उसकी तरलता छीनने की कोशिश नहीं करता। उन्हें पता है, नदी के होने से जंगल है और जंगल के होने से नदी और पहाड़। ये दीगर बात है कि इंसान इस नदी से भी उसके होने का हक छीन लेना चाहता है। अब काली गण्डकी में से रेत खोद कर निकली जाने लगी है। बस यहीं से तो शुरुआत होती है, नदी के विनाश की, क्योंकि इससे नदी की वो झिरें मिटने लगती हैं, जिनसे आकर वह नदी में मिलती है।
शायद बादलों को भी अपने काम का अहसास है। मेरा मन एक सवाल पूछ रहा था। जब हम अपनी दुनिया से  निराश हो जाते हैं तो नदी-पहाड़ों-जंगल की त्रिकोणी दुनिया में ही क्यों आना चाहते हैं? ऐसा यहाँ क्या होता है जो निराशा को मिटा देता है? कुछ तो है, जिसे मैं हवा में, हजारों झींगुरों की एक साथ निकल रही चीं की खत्म न होने वाली धुन में, पहाड़ी झरनों में, पहाड़ों पर चढ़ते समय खुलते फेफड़ों में महसूस कर सकता हूँ। बाग्लुंग के तातापानी मोहल्ले तक पंहुचने के लिए हमने डेढ़  घंटे की फेंफड़ा खड्काऊ चढाई चढ़ी। मन में यह सवाल लेकर हम चढ़े कि कितनी कठिन जीवन है यहाँ के लोगों का? इनके आसपास कुछ नहीं है। हर छोटी-मोटी जरूरत के लिए पहाड़ चढ़ना-उतरना पड़ता हैं इन्हें। 65 घरों की यह बस्ती पहाड़ से नीचे क्यों नहीं उतर आती? इस सवाल का जवाब 60 साल की चूराकुमारी किसान (यहाँ रहने वाली एक दलित महिला) देती हैं – कोई पीड़ा नहीं है। जैसे कुछ लोग सपाट सड़क पर चलते हैं, वैसे ही हम पहाड़ पर और जंगल में चढ़ते हैं। हमारे रिश्ते केवल आपस में ही नहीं हैं, (जंगल और पहाड़ की तरफ देखते हुए कहती हैं) इनसे भी तो हैं। पिछले कई सालों में एक भी महिला की मातृत्व मृत्यु नहीं हुई, कोई बच्चा कुपोषण से नहीं मरा, एक भी बलात्कार नहीं हुआ। बच्चे स्कूल जाते हैं। हमें दुख ये पहाड़ नहीं देते, अपना समाज देता है। जब काम-काज नहीं मिलता तो दूसरे शहर पलायन करना पड़ा। हर घर से कोई न कोई क़तर, मलेशिया, जापान या भारत में जाकर काम कर रहा है। यहाँ जातिगत भेदभाव हमारे लिए चुनौती पैदा करता है, जंगल या पहाड़ नहीं। हमें तो यहीं अच्छा लगता है बस।


यहाँ के लगभग 7 हज़ार युवा पलायन करते हैं, क्योंकि सामाजिक भेदभाव ने उनके स्थानीय अवसर छीन लिए। उन्हें यहाँ काम मिल सकता था। इसी बदहाली के पलायन की स्थिति को अब सरकारें अवसर के रूप में पका रही हैं, ताकि इसे आधार बना कर यहाँ विकास के नाम पर बड़ी परियोजनाएं लायी जा सकें। उनके नज़र पहाड़ों के बीच की त्रिशूली और काली गण्डकी नदी पर है। जंगल अब भी बचा हुआ है, शायद इसलिए क्योंकि ऊँचे पहाड़ों तक पंहुचना अब भी थोडा कठिन है या फिर शायद इसलिए क्योंकि लोग इन्हें अपना आराध्य मानते हैं या यह भी हो सकता है कि इन पर अभी लुटेरों की नज़र न पड़ी हो!
इसके बावजूद सवाल यह है कि चलो, धौलागिरी के लोगों ने अपने विश्वास के चलते इन्हें (पेड़ों-पहाड़ों) को मिटने न दिया; तो क्या इससे वे खुद संकट से बच जायेंगे? बड़ा पेचीदा सवाल है क्योंकि हमारे घर को ठंडा रखने के लिए जो गर्मी और जहर हम बाहर फेंक रहे हैं, वह किसी सीमा में बंधता नहीं है। और पंहुच जाता है धौलागिरी। वह हिमालय पर्वत श्रृंखला के बर्फ के पहाड़ों को भी पिघला रहा है। जब बर्फ के पहाड़ पिघलेंगे तो काली गण्डकी में भी बाढ़ आएगी और विनाश फैलाएगी। दुनिया में एक व्यक्ति या एक समुदाय के कर्म दूसरे व्यक्ति, समुदाय और क्षेत्र को सीधे-सीधे प्रभावित करते हैं। यहाँ भी करेंगे। यही कारण है कि मैं धौलागिरी के पहाड़ों के बीच बसे गांवों से खुद को अलग करके नहीं देख सकता। कुछ न कुछ तो रिश्ते हैं ही।


जंगल से एकतरफा संवाद – एक



(नेपाल के हिमालयी धौलागिरी अंचल से  लौटकर सचिन कुमार जैन)
जब आस-पास शोर नहीं होता, तो डर क्यों लगता है? सन्नाटे और शांति में, चिंतन और शोर में थोड़ा नहीं, वरन् बुनियादी अंतर होता है। जिस तरह का शोर हमारे भीतर भरा हुआ है, वह हमें चेतना से दूर हटाता है। वह हमें शांति से डरने के लिए तैयार करता है। जंगल जो अहसास पैदा करता है वह भीतर बसी हिंसा की रचना होती है। शायद इसलिए क्योंकि तब हम केवल अपने साथ होते हैं। खुद को देखना और खुद से बात करना, खुद में झांकना डराता है। मैने जो जंगल देखा, बिलकुल अनछुआ सा था। नेपाल में हिमालय के रिश्तेदार पहाड़ों पर बसे ये जंगल इस बात का भी प्रमाण हैं कि जब उन्हें जीने दिया जाता है तो वे कितने विशाल, भव्य और आभावान हो सकते हैं। शुरू में उनकी सघनता से मेरा संघर्ष होता रहा। आखिरकार मैं उनके भीतर झांकने की कोशिश जो कर रहा था। जहाँ वो सूरज की रौशनी को प्रवेश नहीं करने दे रहे थे, मेरी नज़रों को भला कैसे भीतर जाने देते। फिर भी मैं चुपके से उनमे प्रवेश कर गया। पूरा न जा सका। टुकड़ों-टुकड़ों में गया। हर दरख्त अपने आप में एक पूरा जंगल, नहीं पूरा जीवन बना हुआ था। कोई पेड़ अकेला नहीं था। किसी पर छोटे पत्तों की बेलें चढ़ी हुई थीं, किसी पर बड़े पत्तों की बेलें। जिनकी बड़ी डगालें टूट गयी थीं, वहाँ दगालें टूटने से गड्ढे बन गए थे। उनमें किन्ही दूसरी प्रजाति पेड़ भी उग आये थे। किसी पेड़ ने उन्हें यह कहकर रोका नहीं कि मेरे शरीर पर मत उगो। उन्होंने यह भी नहीं कहा कि तुम्हारा रंग मुझ जैसा नहीं या तुम्हारी जाति कुछ और है। उनकी वरिष्ठता का अंदाज़ा मैने उन पर चढ़ी काई की मोटी परत से लगाया। कुछ पर गहरी हरी काई की परत जम चुकी है। यह काई पेड़ का श्रृंगार करती है। घोंघे, इल्लियां और मकड़ी उन्हें गुदगुदाते रहते हैं। वे पत्ते भी खा लेते हैं। पेड़ नये पत्ते पैदा कर देता। अगर काई संक्रामक बीमारी का स्रोत है, तो जंगल खड़ा कैसे है? उसे तो सूख जाना चाहिए था। अक्सर मैंने देखा अधूरी खाकर छोड़ी गयी पत्तियों को, जो छोड़ दी गयीं थीं ठीक वैसे ही, जैसे हमारे बच्चे छोड़ देते हैं खाना।
जंगल का मतलब केवल शेर, चीते या भालू जैसे जानवर तक सीमित नहीं हो सकता। ये तो जंगल के कुछ हिस्से हैं। घने जंगल की झाडियों में जंगली मुर्गों की अचानक हुई हलचल ने मुझे उतना ही चौंकाया था, जितना कोई और बड़ा जानवर चौंकाता। सैंकडों तरह के पंछी, कुकुरमुत्ते, मकड़ियाँ, इल्लियां, घोंघे, काई, घांस, मिट्टी, पत्थर, पेड़-पौधे, जमीन से बाहर निकल आई जड़ें, झींगुर, ऊंचाई और गहराई, टुकड़ों में धूप और कुछ टुकड़े छाँव, नमी के साथ टहलती हवा, सन्नाटे के बीच तेज ध्वनियाँ और वहाँ रहने वाले इंसान, ये सब मिल कर जो दुनिया बनाते हैं, वही तो जंगल है।
जब मैं वहाँ पंहुचा तो ऐसा लगा मानों अभी थोड़ी देर पहले ही कोई आया था और हर पत्ती को, हर तने को, घांस के हर तिनके को धो-पोंछ कर चमका कर गया है। कोई तो आता है यहाँ, जिन्होंने पत्थरों को सुन्दर से सुन्दर आकर दिए हैं। हर पत्थर का एक खास आकर – गोल, तिकोन, चतुष्कोण, और पता नहीं कितने कोण।।।।यकीन मानिए गोलाई भी एक प्रकार की नहीं होती। गोलाई लिया हर पत्थर दूसरे गोल पत्थर से भिन्न होता है। यहाँ मुझे पता चला कि हमें तो किताबों में कुछ ही आकारों के बारे में पढ़ाया गया है, यहाँ तो हजारों-लाखों प्रकार के आकर दिखाई देते हैं। हर पत्थर का एक खास आकार। जरूरी नहीं कि उसे कोई नाम दिया ही जाए।
हरा रंग कोई एक रंग नहीं है। हरा रंग कितनी विविधता से भरपूर है इसका अंदाज़ा आपको पोखरा से बाग्लुंग के बीच 80 किलोमीटर के पहाड़ चढ़ते हुए हो जाता है। इसकी गणना कर पाना भी संभव न रहा। बिलकुल हल्का हरा, काई का चमकदार हरा,  उत्तिस और साल का गहरा हरा।।।।और भी कई। हर रंग के नाम भी नहीं हो सकते। 
कहीं कोई सीमा रेखा नहीं दिखती। ठीक एक ही भू-बिंदु से दो अलग-अलग किस्म के पेड़ उगे और बढते चले गए। कहीं कोई रियासत भी नहीं दिखती। उनके होने का अहसास दीखता है। यह समझ भी कि अकेले होना संभव ही नही, बल्कि असंभव है। आकार से कुछ भी तय नहीं होता वहाँ। मैने छुआ अपनी नज़रों से इन अनछुए जंगलों को। स्पर्श इन्द्रीय से इन्हें पूरा महसूस कर पाना भी संभव नहीं है। घ्राण-इन्द्रीय अपनी आदत के मुताबिक कुछ हजारों गंध को खोज रही थी, पर पूरा जंगल एक गंध बन चुका था। कोई गंध दूसरी गंध को खतम करने की साजिश करती नहीं मिली। मैं इन्हें अनछुए इसलिए कहता हूँ क्योंकि विकास नाम के राक्षस के हाथ अब तक यहाँ नहीं पंहुचे हैं।
हर कोने में हर पगडंडी पर जंगल की एक ही सुगंध मिली। जब किसी पेड़ के करीब गए, तो कुछ नयी गंध का अहसास भी हुआ। उनके आकार भिन्न हैं, रूप भिन्न हैं, शायद चरित्र भी भिन्न हैं, पर उन्हें पता हैं कब वे एक स्वतंत्र अस्तित्व हैं, और कब एक पूरा जंगल, जिसमे कोई अस्तित्व स्वतंत्र नहीं होता। कोई विरोधाभास नहीं। लोग कहते हैं कि कुछ पेड़ जहरीले होते हैं, पर किसी को इन्होने मारा नहीं। वाह! कितना अच्छा जहरीलापन है ये!

जो जी चुके थे अपनी उम्र, उन दरख्तों का संस्कार कीड़े, घोंघे, चीटियाँ, पानी और मिट्टी मिल कर कर रहे थे। पेड़ों-पत्तियों का अंतिम संस्कार नहीं होता। उनका वैशिष्ट्य के साथ रूपांतरण होता है। हमारे यहाँ तो कई हज़ार पन्ने लिख कर यह बताया गया है कि हम पंच तत्वों से बने हैं और आखिर में उन्ही में मिल जायेंगे। इस जंगल में तो यह यूँ ही समझ आता है। होना और मिट जाना और फिर हो जाना कितनी सहजता से चलता रहता है। जंगल राज कोई हिंसक राज नहीं है; वह जीवन का एक चक्र है।
यहाँ पांच तरह के वन हैं। सदाबहार शंकुधारी वन, जिनके वृक्ष बहुत बड़े हैं और ये समुद्र तल से 1850 मीटर की ऊंचाई पर पहाड़ों में पाए जाते हैं। मिश्रित वन, इसमें चिलौं, कटुस और उत्तिस प्रजाति के पेड़ हैं, जो समुद्र तल से 1220 से 1850 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं। ये अब खतरे में हैं, क्योंकि इन्हें मार कर लोग घरों में सजाने के लिए उपयोग में लाते है। तीसरे वन हैं – मानसून वाले, ये समुद्र तल से 712 से 1219 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं। इनमे साल, सिमल, बार, पीपल सरीखे पेड़ हैं। चौथे वन हैं झाडीदार वन, जिनमें छोटी पत्ती और फूलों वाले छोटे पेड़ होते हैं। पांचवे वन हैं जल धारा या नदी के करीबी वन। ये खास तौर पर नदियों या किन्ही जल धाराओं के पास ही पाए जाते हैं। इस श्रेणियों में 31 तरह की प्रमुख प्रजातियां हैं। इनके अलावा 11 तरह की घांस और खरपतवार भी है। 2 सेंटीमीटर से लेकर 80 फुट लंबे पेड़ों-वनस्पतियों के बीच यह जंगल बिलकुल बराबरी में बंटा हुआ है।
भालू, हिरण, ऊदबिलाव, तेंदुआ, साही, लोमड़ी, जंगली छिपकली समेत 21 तरह के स्तनधारी जंगली जानवर इस दुनिया के निवासी हैं। इसी तरह अलग रंग और प्रकृति की 21 तरह के पंछी भी यहाँ रहते हैं। पेड़ों और जानवरों में हमारी तरह जातियां नहीं, बल्कि प्रजातियां होती है। प्रजातियां समाज को बांटती नहीं हैं, बल्कि विविधता से परिपूर्ण बनाती हैं। यह जंगल इंसानी बस्ती से बेहतर है।

मैं जंगल से संवाद कर पा रहा था, क्योंकि मैं किसी और से संवाद करना ही नहीं चाहता था। सब कुछ भूले बिना यह संवाद असंभव था। दिमाग से बिना कचरा हटाये यह महसूस कर पाना भी असंभव है कि जंगल निर्जीव नहीं होते हैं। जंगल सजीव होते हैं। तभी तो वह मुझमे कुछ चेतना भर पा रहे थे। बस छोटा सा अनुभव बांटना चाहता हूँ। इन पहाड़ों पर चढ़ते हुए फेंफडों का हर कोना धकर-धकर कर रह था। अपनी सामान्य गति से कई गुना ज्यादा। जब भी हम कुछ पलों के लिए रुकते यही जंगल मुझे मेरी पूरी ऊर्जा तुरंत लौटा देता। जिस यात्रा के बाद हमें थक कर चूर हो जाना चाहिए, वह हमें कुछ ज्यादा सक्रीय कर रही थी।  

Monday, 9 June 2014

ये सरकारें संविधान को क्यों नहीं मानतीं?



देश के प्रधानमंत्री के नाम, 

सुना है कि इंटेलिजेंस ब्यूरो ने आपके कार्यालय को एक महत्वपूर्ण और राष्ट्रहित की एक रिपोर्ट सौंपी है. जिसमें कहा गया है कि कुछ संस्थाएं विदेशी अनुदान लेकर देश के विकास को बाधित कर रही हैं और उसकी छवि खराब कर रही हैं. जिन विषयों पर उन संस्थाओं का काम है वे हैं - जलवायु परिवर्तन, जीएम फ़ूड, यूरेनियम का खनन, भीमकाय औद्योगिक परियोजनाएं, जातिगत उत्पीडन और मानव अधिकार आदि-आदि. जहाँ तक मुझे लगता है कि सरकार भी जलवायु परिवर्तन से चिंतित है और जीएम फ़ूड को सुरक्षित नहीं मानती है. मुझे यह भी लगता है कि सरकार को भी विनाशकारी और जन-विरोधी विकास से लिए विदेशी निवेश, अनुदान और ऋण नहीं लेना चाहिए. यह कोई प्राकृतिक सत्य नहीं है कि सरकारें विदेशी पूँजी/धन से जो काम करती हैं, वही पुण्य का काम होता है. बेहतर होगा कि सरकार सत्य और असत्य, जनहित और जन-विरोधी के तत्व के आधार पर ही कोई बात सोचे, विचारे और लागू करे. इस तरह की प्रतिवेदनों के जरिये केवल और केवल गलत नीतियों की मुखालफत को दबाने के लिए किया जा रहा है. 

दलित लड़कियों के साथ बलात्कार होता है, उन्हें न्याय नहीं मिलता, वे न्याय की तलाश में देश की राजधानी दिल्ली में जंतर मंतर पर जला देने वाली लू में धरने पर बैठती हैं. वहाँ भी उन्हे न्याय तो नहीं ही मिलता, बल्कि देश की सुरक्षा एजेंसियां उन्हें वहाँ से हथियारों के बल पर खदेड़ देती हैं. क्या उन्हे आपकी सरकार में कोई विश्वास होना चाहिए? और इसके बाद संसद के संयुक्त सत्र में आपकी सरकार की तरफ से महिलाओं की सुरक्षा और न्याय के शब्दों से सजा एक गुच्छा परोसा जाता है. 

यह स्पष्ट है कि परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के दुष्प्रभाव बहुत गहरे हैं. यह कोई कल्पना नहीं है, पिछले कुछ महीनों में हुई घटनाएं सच सामने ला चुकी हैं. जब यह सच है, तो इस सच को कहने वालों के खिलाफ सरकार क्यों है? हाल ही में २५ छात्रों को बड़े बाँध ने डुबो दिया, इसके पहले भी मध्यप्रदेश में धाराजी में ४०० लोग मर गए थे. ऐसी कई दुर्घटनाएं बड़ी बांधों से हुई हैं. इन दुष्प्रभावों को उजागर करने वाले सरकार के हिसाब से देश-द्रोही या विकास विरोधी क्यों हैं? बेतरतीब, दृष्टिहीन विकास नीतियों ने पर्यावरण के चक्र को तोडा और जलवायु परिवर्तन के संकट को हमारे सामने लाकर खड़ा कर दिया. इस संकट के मूल कारणों पर बहस करने वालों को राष्ट्रद्रोही क्यों माना जाता है? ऐसा क्यों है कि राष्ट्रवाद और विकास के पक्ष में होने का मतलब आँख मूँद कर उन नीतियों और कृत्यों को स्वीकार करते रहना है, जो किसानों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर रही हैं, जिनके कारण ४० करोड़ लोग भूखे सोते हैं, गैर-बराबरी बढ़ी है, १००००० हेक्टेयर जमीन किसानों से छीन ली गयी और १० करोड़ लोगों को उनकी जगहों से उजाड़ कर विस्थापित होने के लिए मजबूर कर दिया गया.

ऐसा क्यों है कि इस देश में समाज के हित की बात करने का मतलब विकास विरोधी होना हो गया है? अब हमारी सुरक्षा एजेंसियां महिलाओं के गले से चेन खींचने वालों, छोटे बच्चों का अपहरण करने वालों और नाबालिग बच्चों-महिलाओं से बलात्कार करने वालों को खोजने का काम नहीं करती हैं. उनकी मुख्य जिम्मेदारी है कि उन्हें खोजो, जो सरकार (किसी की भी सरकार हो) की राष्ट्र-विरोधी, पर्यवारण को नुकसान पंहुचाने वाली, संसाधनों की लूट को प्रेरित करने वाली नीतियों की मुखालफत करते हैं. उन्हें खोजो, जो कलम चलते हैं और उन्हें दंड देने के भरसक जतन करो. 

ऐसा लगता है कि देश की आवाम भी इस तरह की पहलकदमियों पर चुप रहना चाहती है. वह कभी नहीं देखती कि ये सरकार या सरकारें किनका हक छीन कर उनके घरों में पानी पंहुचा रही है?  वह यह नहीं देखना चाहती कि जो रोशनी और बिजली उनके घर को अँधेरे-उजाले में भी रोशन कर रही है, उसके लिए कितने गांव, लोग, किसान, बच्चे और महिलायें जड़ों से उखाड़े गए और गुमशुदा कर दिए गए. वह सोचने के लिए तैयार नहीं है कि यह विकास उनके खुद के बच्चों को किस तरह से बीमार और खोखला बना रहा है. वे खुश हैं क्योंकि सरकार उद्योगपतियों से बड़े-बड़े अस्पताल बनवा रही है. समतल, सपाट और चमकती हुई सड़क पर धुआंधार गति से चलती गाडी उन्हें यह सोचने का कोई अवसर नहीं देती है कि हर चमकदार सड़क के नीचे भी एक शमशान है, जिसमें कई लोगों का भोजन, रोज़गार, खेल का मैदान, कई चिड़ियाओं के आशियानें, खेत, रोज़गार, लोगों के आराध्य, देवी-देवता, झरने, नदियाँ दफ़न हैं. आज जब आसमान से आग बरसती है तो लोग बस यही सोचते हैं कि बिजली आ जाती तो सब ठीक हो जाता. वे अब भी यह नहीं सोचते कि ये आग बरस क्यों रही है? यह आग इसलिए बरस रही है क्योंकि हमने सूरज को शीतल बनाने वाले हर साधन और सम्भावना को अपने विकास के हवन में झोंक दिया है. 

और ऐसे में जब कोई कुछ कहता है, तो वह सरकार का अपराधी होता है. वह देश द्रोही और राष्ट्रद्रोही होता है. मेरी तो इतनी सी बात समझ में आती है कि आज यह जरूरी नहीं है कि सरकार का मतलब जनहित ही हो. कोई भी सरकार हो, उसे एक ऐसा समाज चुन रहा है, जो लगभग असहिष्णु हो चुका है. यह दुखद है कि तात्कालिक सुविधाओं और विलासिता वाले विकास के लिए, हम देश की अमूल्य सम्पदा की बलि देने के लिए तैयार हैं. यदि कोई उसे बचाने की कोशिश करेगा, जो सुरक्षा और राष्ट्रहित के नाम पर सरकारें उनके विचारों को, उनके घर और अस्तित्व के साथ तहस नहस कर देंगी. मेरा एक साधारण का सवाल है. जो विद्वान सरकार के लिए नीतियां बनाते हैं, क्या वे कभी एक पल को यह विचार भी करते हैं कि अगले २०-३० सालों के लाभ और चमक के लिए वे जिस कोयले  का पूरा उत्खनन कर लेना चाहते है, वह भण्डार ५००० सालों में बना है. जिस बाक्साईट को वे हवाईजहाज़, मिसाइल, बड़ी इमारतें बनाने के लिए ३० सालों में खोद डालना चाहते हैं, वह भण्डार भी १० से १५ हज़ार सालों में बना है. ये जंगल और नदियाँ भी किसी कारखाने में रातो-रात नहीं बने हैं. इन्हें खतम करने का हक न तो हमारे मतदाता को है, न ही उसकी चुनी हुई सरकार को. यह बात कहने वाला सरकार के खिलाफ माना जायेगा. मुझे उस सरकार के पक्ष में क्यों होना चाहिए, जो २.९० लाख किसानों की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार हो, जिसकी शिक्षा नीतियों के कारण २०००० छात्रों में आत्महत्या की हो, जहाँ हर घंटे में ४ बलात्कार होते हों....ये सरकारें, समाज के हित की सरकारें कैसे मानी जाएँ?

हमारी सरकारों ने यह वक्तव्य भी देना छोड़ दिया है, जो भारत के संविधान में लिखा हुआ है - राज्य, विशिष्टया, आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा और न केवल व्यष्टियों के बीच बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए लोगों के समूहों के बीच भी प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असामनता समाप्त करने का प्रयास करेगा. 

मेरा संविधान मुझे भाग-४ में कुछ मूल कर्तव्य भी सौंपता है, जो ताकीद करते हैं कि एक नागरिक के रूप में "हम प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और अन्य वन्य जीव है, रक्षा करें और उसका संवर्धन करें तथा प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव रखे". यदि मैं अपने संविधान का पालन करता हूँ, तो क्या मैं विकास विरोधी हूँ और वैश्विक पटल पर देश की छवि खराब कर रहा हूँ? कतई नहीं, इससे केवल पूँजी और संसाधन लूटने वाले समूह और लोग ही दुखी होंगे.

यही संविधान कहता है कि हम स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोये रखें और उनका पालन करें; हमारा स्वतंत्रता आंदोलन, हमें सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक गुलामी की मुखालफत करने का सन्देश देता है. हमारी सरकार उसे विकास-विरोधी क्यों मानती है? ऐसा क्यों है कि सरकारें और सरकार के नुमाईन्दे इस देश के मूल्यों और संविधान को ही राष्ट्र हित और विकास के खिलाफ मानने लगे हैं?

इन सवालों के जवाब मुझे नहीं चाहिए. मैं बस चाहता हूँ कि देश चलाने वाले खुद के लिए इन सवालों के जवाब खोजें.

बस इतना ही.


सचिन कुमार जैन 

Thursday, 22 May 2014

कितना जानती हैं सरकारें अपने देश के लोगों और संसाधनों के बारे में?



कहानियां नहीं आंकड़े सामने लाईये!

सचिन कुमार जैन

हमें अपनी नयी सरकार से सामान्य ज्ञान का एक सवाल पूछना चहिये कि यदि हमारे यहाँ नीतियां किस आधार पर बनती हैं, जबकि कई मूल विषयों पर भारत में आंकडें और जानकारियां एकत्र करने में परहेज किया जाता है? स्वास्थ्य के क्षेत्र से लेकर आर्थिक सूचकांकों, कुपोषण और विस्थापन तक ऐसे तमाम क्षेत्र हैं, जहाँ आंकड़ों और ताज़ा जानकारियों के प्रबंधन की कोई व्यवस्था ही नहीं है. इसका मतलब यह कि हम सरकार की किसी भी पहल और उसके परिणामों को विश्वसनीय नहीं मान सकते है. जो भी हुआ या हो रहा है, वह सच नहीं है, क्योंकि उसे सही आंकड़ों के अभाव में जांचना संभव ही नहीं है.

भारत में लोग वास्तव में कितना कमाते हैं उसकी जानकारी ही इकठ्ठा नहीं होती है. और बात की जाती है उनकी कमाई बढाने की. हमारे यहाँ जो भी जानकारियां है वह व्यय पर आधारित है. एन एस एस ओ भी प्रतिव्यक्ति मासिक उपभोग, व्यय की ही जानकारी इकठ्ठा करता है.

हमारा वित्त मंत्रालय हर साल आर्थिक वृद्धि के सूचक के रूप में बताता है कि देश की प्रति व्यक्ति आय कितनी बढ़ गयी है, परन्तु वह लोगों की आर्थिक परिस्थितियों एक सही आंकलन नहीं होता है, क्योंकि वह आय का औसत आंकलन होता है. एक व्यक्ति की वास्तविक वार्षिक आय 100 करोड़ रूपए, दूसरे व्यक्ति की आय 5 करोड़ रूपए, तीसरे व्यक्ति की आय 50 लाख रूपए, चौथे व्यक्ति की आय 5 लाख रूपए, पांचवे व्यक्ति की आय 1 लाख रूपए, छठवें व्यक्ति की आय 24 हज़ार रूपए, सातवें व्यक्ति की आय 20 हज़ार रूपए और आठवें, नवमें, दसवें व्यक्ति की आय 12 हज़ार रूपए है. इस मान से हमारी औसत आय हो गयी १०.५५६८ करोड़ रूपए. अब सवाल यह है कि इस आंकलन में आखिरी के 5 व्यक्तियों की वास्तविक स्थिति झलकती है या नहीं? यहाँ तक कि भारत में गरीबी का आंकलन भी व्यक्ति की आय के मानक (कि एक व्यक्ति की कम से कम कितनी आय होनी चाहिए) के आधार पर नहीं होता है. यह आंकलन केवल व्यय के आधार पर होता है कि यदि कोई भी व्यक्ति 22 रूपए से कम गाँव में या 28 रूपए से काम शहर में काम खर्च कर रहा है, तो उसे गरीब मान लिया जाएगा.

अब जरा इस बात पर विचार कीजिये. भारत में भुखमरी और कुपोषण एक बड़ा राजनीतिक, सामाजिक और अकादमिक सवाल बना हुआ है, लेकिन आज यानी 2014 में भी जब हम इन विषयों पर बहस करते हैं या कुपोषण प्रबंधन कार्यक्रम बनाने की पहल करते हैं, तब हमें वर्ष 2005-06 में सम्पादित हुए राष्ट्रीय परिवार स्वस्थ्य सर्वेक्षण का सहारा लेना पड़ता है क्योंकि पिछले 8 सालों में हमारी सरकार ने कुपोषण और स्वास्थ्य के विभिन्न आयामों की पड़ताल के लिए कोई सर्वेक्षण या अध्ययन किये ही नहीं. ऐसे में यही अहसास होता है कि वास्तव में सरकारें भुखमरी, कुपोषण और गरीबी के सन्दर्भ में साक्ष्य आधारित पहल करने के बजाये सतही और गैर-जवाबदेय पहल करते रहना चाहती हैं.

इसके साथ ही दूसरा मसला आंकड़ों और जानकारियों की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है. मध्यप्रदेश की शिशु मृत्यु दर 56 है, यानी जब एक हज़ार जीवित बच्चे जन्म लेते हैं, तब एक वर्ष से काम उम्र के 56 बच्चों के मध्यप्रदेश में मृत्यु हो जाती है, वास्तव में यह एक आंकलन होता है, जिसकी वास्तविक वास्तविक आंकड़ों के साथ पड़ताल की जाना चाहिए. जब एक हज़ार जीवित जन्म पर 56 बच्चों की मृत्यु होती है, तो 15 लाख जीवित जन्म पर 84000 बच्चों की मृत्यु हो रही है. इस आंकलन के ठीक उलट मध्यप्रदेश सरकार ने वर्ष 2013-14 के लिए जो आंकड़े दर्ज किये, उनके आधार पर राज्य में लगभग 7800 शिशु मृत्यु हुई. इस हिसाब से तो मध्यप्रदेश की शिशु मृत्यु दर लगभग 5 होना चहिये, जो की दुनिया के सबसे विकसित देशों की दर है. विडम्बना यह है कि हमारे यहाँ हर महीने जिला स्तर पर, हर तीन महीने में राज्य स्तर पर और सालाना मौके पर राष्ट्रीय स्तर पर समीक्षाएं होती हैं, नयी कार्य योजनायें और कार्यक्रम बनते हैं, पर सवाल है कि उनका समीक्षाओं का आधार क्या होता है और क्या उन चर्चाओं में इस विसंगति पर कोई सवाल नहीं उठता?

स्वतंत्रता के बाद से भारत में विकास के नीतियों में बड़ी विकास परियोजनाओं (बाँध, सड़क, बिजलीघर आदि) का बड़ा महत्त्व रहा है. पंडित नेहरु ने कहा था कि बाँध तो विकास के तीर्थ हैं. इन तीर्थों की स्थापना के कारण एक बड़ी आबादी विस्थापित होती है. 1950 से 1999 के बीच 5835 बड़ी और माध्यम विकास परियोजनाएं बनी और लागू हुई, जबकि 1999 से 2013 के बीच 21334 बड़ी और माध्यम विकास परियोजनाएं बनीं. इनमें से 6829 में लोगों की बड़ी संख्या में विस्थापन होना तय था, लेकिन भारत सरकार के स्तर पर योजना आयोग या सम्बंधित विभाग या प्रधानमंत्री कार्यलय (क्योंकि ये परियोजनाएं किसी एक विभाग से ही सम्बंधित नहीं है, इसलिए किसी एक को समन्वय आधारित भूमिका निभाना जरूरी था) ने ऐसी पहल नहीं की, जिसके तहत एक डेश-बोर्ड हो ताकि यह पता चल सके कि इन तमाम परियोजनाओं से किस राज्य के किस जिले में कौन से इलाके में कितने परिवार विस्थापित हो रहे हैं या परियोजना से अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रहे हैं, उनके पुनर्वास की क्या व्यवस्था की गयी है, कितनों का पुनर्वास हो गया है और कितनों का पुनर्वास बाकी है? बड़ी विकास परियोजनाओं की वकालत करने वाली सभी सरकारें विस्थापितों के हितों और हकों का संरक्षण करने में अरुचि रखती रही हैं, यही कारण है कि देश के सामने आज भी कोई ऐसा नाकड़ा नहीं है, जिससे पता चले की विकास ने कितनों को विस्थापित किया है? जाने-माने समाजशात्री प्रोफ. वाल्टर फर्नांडीस ने एक आंकलन किया और बताया कि वर्ष 1947 से 2000 के बीच भारत में 10 करोड़ लोगों का विस्थापन हुआ, जिनमें से 6 करोड़ दलित-आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रहते थे. क्या इसका मतलब यह है कि चूंकि विस्थापन केवल आदिवासियों, दलितों और गाँव में रहने वालों के लिए बड़ी विभीषिका लाता है, इसलिए जानबूझ कर विश्वसनीय आंकड़ों के प्रबंधन की कोई व्यवस्था नहीं बनायीं है?

मैं आपको अपने अनुभव के आधार पर एक और चुनौती देता हूँ. देश में लोगों को स्वास्थ्य का अधिकार देने के लिए बहुत जोरदार मंचबाज़ी हो रही है. स्वास्थ्य की एक ही परिभाषा है, पर उस परिभाषा को लागू करने के लिए अभी देश-प्रदेशों में 367 योजनायें चल रही हैं. कौन सी योजना कब शुरू होती है और कब बंद हो जाती है, इसके विषय में शायद ही किसी की पता चलता हो! स्वास्थ्य विभाग के सचिव को भी इसके बारे में कुछ अता-पता नहीं होता है, क्योंकि वो जब विभाग में आता है, तो उसे पता चलता है कि वहां स्वास्थ्य का कोई ठीक-ठीक परिस्थिति विश्लेषण ही मौजूद नहीं है, तो अपनी विद्वत्ता के आधार पर राजनीतिक लाभ-हानि का जोड़-घटना करते हुए वह कोई नयी फंडा-आधारित योजना चला देता है, जो उसके अपने कार्यकाल तक ही जीवित रहती है, पर नयी अधिकारी के आने से पहले दम तोड़ देती है. बस मध्यप्रदेश का एक सन्दर्भ ले लीजिये. राज्य में आप यह जानकारी इकठ्ठा नहीं कर सकते हैं कि यहाँ सरकारी अस्पतालों-स्वास्थ्य केन्द्रों-चिकित्सा महाविद्यालयों (जो सरकार चलाती है) में अलग-अलग स्तरों के स्वास्थ्य केन्द्रों (उप-स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक, स्वास्थ्य केंद्र, जिला अस्पताल, मुख्य अस्पताल आदि) के लिए अलग-अलग जिलों में डाक्टरों और विशेषज्ञों कितने पद स्वीकृत स्वीकृत हैं और उनमें से कितने पद भरे हुए हैं या खाली हैं, क्योंकि स्वास्थ्य विभाग का महकमा स्वास्थ्य संचालनालय, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, चिकित्सा शिक्षा जैसी इकाईओं में बंटा हुआ है, जो केवल अपने हिस्से की व्यापक जानकारी ही रखते हैं. उनके पास भी जिलों यानी जमीनी स्तर की स्पष्ट जानकारी नहीं होती है. आंकड़ों की बात होने पर उनका जवाब होता है कि जिन्हें ये जानकारी चाहिए, वे जिले-जिले जाएँ और वहां से जानकारी इकठ्ठा कर लें. यही संकट दवाओं और अन्य विशेष सेवाओं के साथ भी जुड़ा हुआ है. जब हमें किसी जिले के बारे में यही पता न चले कि वहां स्वास्थ्य से जुड़े मानव संसाधनों की क्या स्थिति है, तो कार्ययोजना कैसे बन सकती है; पर हमारे यहाँ बनती है और क्रियान्वित भी होती है और सही समय पर उसके लागू हो जाने की रिपोर्ट भी आ जाती है.

जब तक हमारे पास सही सही जानकारियां नहीं होंगी, तब तक क्या समावेशी विकास के बात महज एक मुहावरा नहीं बना रहेगा. वास्तव में चूंकि एक नयी सरकार सत्ता की जिम्मेदारी संभाल रही है, उसे यह समझना होगा कि जब तक सही-सही जानकारी उसके पास या लोगों के पास नहीं होगी, तब तक "समावेशी विकास" और "गैर-बराबरी ख़त्म" करने की कोशिशें नाकाम ही साबित होंगी.

http://www.humanrights.asia/news/ahrc-news/AHRC-ART-039-2014-HI

Sunday, 18 May 2014

जो सरकार जी डी पी की बात करे, वह कितनी विश्वसनीय होगी?


जीडीपी यानी विकास का वायरस और भारत के चुनाव

सचिन कुमार जैन

हो सकता है कि कई लोगों (जो खास तौर पर राजनीतिक विचारधारा से ज्यादा राजनीतिक दल के प्रति समर्पित होंगे) को यह नजरिया पसंद नहीं आये कि ये चुनाव व्यवस्था में कोई मूल बदलाव नहीं लायेंगे. इस असहमति के बावजूद हमें उस संकट के मूल कारकों तक जाने की कोशिश करना ही चाहिए, जिन्हें इन चुनावों में दोनों बड़े राजनीतिक दलों ने बहुत सफलता के साथ छुपा दिया था. आखिर क्यों एक पूर्ण बहुमत वाली और स्थिर सरकार से सेंसेक्स इतना गदगद है, क्योंकि अब नयी सरकार को किसी का समर्थन नहीं चाहिए और वह खुल कर उन नीतियों को आगे बढ़ा सकेगी, जिनसे बेरोज़गारी और गैर-बराबरी बढ़ी है.

जो ये मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी एक ऐसे ताकतवर प्रधानमंत्री होंगे, जो अर्थव्यवस्था पर भारत की सरकार के नियंत्रण में ला सकेंगे, तो मुझे इस बात पर शंका है. बाज़ार का एक स्वाभाविक सा सिद्धांत है, जिसके पास पूँजी है, वह सबसे ताकतवर है. यह सिद्धांत केवल भारत के लिए ही लागू नहीं होता. कुछ दिन पहले नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशात्री जोसफ स्टिगलिट्ज़ भोपाल में थे. उन्होनें एक चर्चा में बताया कि १९८० के दशक में जब जनरल एग्रीमेंट आन ट्रेड और व्यापार समझौतों (ट्रिप्स) पर चर्चा चल रही थी, तब अमेरिका के व्हाईट हाउस के मुख्य सलाहकार होने के नाते अमेरिका की सरकार को इस पर सहमति नहीं देने का सुझाव दिया था, पर बड़े कार्पोरेशंस इतने वज़नदार थे कि अमेरिका सरकार ने भी ट्रिप्स पर सहमति दे दी. अब आप भावनात्मक तरीके से नहीं जरा तार्किक और तथ्यात्मक नज़रिए से सोचिये भारत की आज भी बाज़ार में आत्मनिर्भरता के सन्दर्भ में क्या औकात है?

भारत में हाल ही में संपन्न हुए चुनाव एक बदलाव की तरफ संकेत करते हैं. यह माना जा रहा ही कि टू जी घोटाला, कोयला घोटाला,  हेलीकाप्टर खरीद घोटाला, राष्ट्रमंडल जैसी घटनाओं के कारण लोगों ने यूपीए को खारिज किया और एनडीए को अपनाया है. अब हमें यह सोचना होगा कि इस तरह के भीमकाय घोटाले हुए क्यों? वास्तव में इनका मूल कारण वही आर्थिक नीतियां हैं, जिन्हें देश में क्रांतिकारी बदलाव के कारक के रूप में पेश किया गया. एक नीति बनी कि कोयले की नीलामी होगी और नीलामी कर दी गयी. एक नीति बनी की स्पेक्ट्रम की नीलामी होगी और नीलामी कर दी गयी. सरकार का तर्क है कि नीलामी एक नीति के तहत की गयी अब उस नीलामी में जो बोली लगी वह तो कोई निर्धारित कर नहीं सकता. ऐसे में कंट्रोलर-आडिटर जनरल ने आंकलन किया कि नीलामी में काम कीमत मिली जिससे सरकार को राजस्व का घाटा हुआ. वास्तव में यह मामला क़ानून के लिहाज से टिकेगा ही नहीं, क्योंकि जो कुछ भी हुआ नीति के तहत हुआ. बहरहाल कुछ हद तक स्पेक्ट्रम के मामले में कोर्ट कुछ कार्यवाही कर पाया जब उसने १२२ आवंटनों को खारिज कर दिया; परन्तु कोर्ट भी तो नीति पर सवाल नहीं उठा पाया. जो कि वास्तव में गलत थी. 

कारण बहुत साफ़ है. पिछले २३ सालों की नीतियों में जीडीपी को विकास का पैमाना माना गया है. इस जीडीपी पर ४० प्रतिशत नियंत्रण १०० बड़े उद्योग घरानों का है....जो बार-बार कूटनीतिक तरीकों से अर्थव्यवस्था में हलचल पैदा करके सरकार को डरते-धमकाते हैं और मन मुताबिक नीतियां बनवाते हैं. ये नीतियां देश के हित की नहीं जीडीपी के हित की होती हैं. जरा एक बार फिर जीडीपी को समझते हैं. जीडीपी का मतलब है एक साल में कुल कितने धन/मुद्रा का हस्तांतरण हुआ यानी वस्तु, सेवा या किसी भी क्षेत्र में कितने लेन-देन-उत्पादन हुआ. जितना ज्यादा लेन-देन जीडीपी का उतना ज्यादा विकास....अब जरा इसका व्यवहारिक पहलु देखते हैं. मुद्रा या धन का ज्यादा लेन-देन कब होता है? यदि आप स्वस्थ होंगे तो जीडीपी में कोई योगदान न करेंगे, लेकिंग बीमार होंगे तो डाक्टर, एक्सरे, दवाई, अस्पताल के लिए खर्च करेंगे. दूसरे मायने में आप जीडीपी के विकास में योगदान कर रहे हैं. यदि पेड़ या जंगल सुरक्षित रहते हैं, तो उनका जीडीपी में कोई योगदान नहीं है. जब जंगल कटते हैं तो फर्नीचर बनता है, आक्सीजन काम होती है, बीमारी बढ़ने की आशंका पैदा होती है....तब जीडीपी बढ़ता है. जब नदी साफ़ होती है और समुदाय के आधिपत्य में होती है तब जीडीपी में उसका कोई योगदान नहीं होता. जब वह मैली हो जाती है तो उसकी सफाई के लिए १००० करोड़ रूपए की नदी सफाई कार्य योजना बनती है. तब गंदी नदी जीडीपी में योगदान देती है.  जब तक लोगों के मन में दुर्घटना और असामयिक मृत्यु का भय नहीं बैठेगा, तब तक बीमा कंपनियां भला क्यों कर खुश होंगी! यह विकास ऐसा है, जिसमें इंसान के हर दुःख और कष्ट को उपजाऊ जमीन माना गया है. जितना दुख, जितना दर्द, जितनी अनिश्चितता, उतना ज्यादा व्यापार! दुनिया में आज सबसे बड़ा व्यापार हथियारों का है; जब तक युद्ध न होंगे, तब तक हथियार क्यों बिकेंगे भला; तो यह विकास युद्ध को भी एक लाभ कमाने का एक बड़ा अवसर मानता है और इसी लिए युद्ध होते नहीं हैं, करवाए जाते हैं. अमेरिका जैसे देशों की जीडीपी में युद्धों का बहुत बड़ा योगदान होता है.

यही जीडीपी एक कारण है कि पिछले २३ सालों में सरकारों की यह केन्द्रीय नीति रही है कि पानी, जमीन, जंगल, खनिज आदि सब कुछ समुदाय के हाथ से छीन लिया जाना चाहिए और उसका व्यापार होना चाहिए. सरकार बदल चुकी है, परन्तु क्या नीतियां बदलेंगी? इसी तरह भारत सरकार ने नीति बनायी कि जीडीपी को बढाने के लिए निजी क्षेत्र को अलग-अलग शुल्कों, करों और देनदारियों में रियायत दी जायेगी. यह भी नीति है. और वर्ष २००५ से २०१२ के बीच लगभग ३० लाख करोड़ रूपए की राजस्व छूट दे दी गयी. इसमें से ८ लाख करोड़ तो अकेले बड़े उद्योगों को दी गयी. इसके दूसरी तरफ जब भारत की संसद राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी क़ानून या खाद्य सुरक्षा क़ानून बनती है या सबको सामाजिक सुरक्षा का हक़ देने की पहल शुरू करती है, तो पूरा बाज़ार, खास तौर पर १०० चुने हुए औद्योगिक घराने भांति-भांति के तरीकों से सरकार पर सवाल उठाता है. शेयर बाज़ार गिर जाता है. सरकार पर दबाव बनता है कि ऐसी नीतियां न बनायी जाएँ.

अब जरा यह देखिये. भारत में गरीबों के लिए नीति गरीबी की परिभाषा के आधार पर बनती हैं. आर्थिक उदारीकरण की हमारे समाज को एक बड़ी देन रही है - गरीबी की रेखा. यह रेखा खींचने का काम हमारा योजना आयोग करता है. योजना आयोग बताता है कि गाँव में जो २२ रूपए से काम और शहरों में २८ रूपए से काम खर्च करता है, वही गरीब माना जाएगा. और इस आधार पर वह कह देता है कि १२५ करोड़ में से २७ करोड़ लोग ही गरीब हैं. योजना आयोग के इस निर्णय पर संसद में कोई चर्चा भी नहीं होती है. इसका मतलब यह कि केवल छोटे से तबके को ही सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का हक़ मिलेगा. उन्हें ही वृद्धावस्था पेंशन मिलेगी. जबकि इसी सरकार के आंकलन बताते हैं कि वर्ष २००४-०५ की स्थिति में ७७ फ़ीसदी यानी आज की स्थिति में लगभग ९० करोड़ लोग केवल २० रूपए प्रतिदिन से काम खर्च करके जिन्दगी जीते हैं. यह आर्थिक नीतियों का ही प्रताप है कि सरकार खुद इन निष्कर्षों को खारिज कर देती है. नीतियों के भ्रष्टाचार पर चुप्पी बहुत खतरनाक है. बीमारी गंभीर है, हम सब उसका उपचार खोज रहे हैं, पर इस खोज के साथ दो तरह की दिक्कतें हैं - एक तो हमारी राजनीति व्यवस्था हिंसक रूप से प्रतिक्रियावादी व्यवहार कर रही है और दूसरी कि सभी इसका तात्कालिक निदान चाहते हैं. यह स्थिति हमें फिर तथाकथित सुधारों की नीतियों की तरफ ली जायेगी. उदारीकरण की नीतियों में सुधार का मतलब होता है कि सरकार अर्थव्यवस्था में सीधी भूमिका न निभाते हुए नियमन की भूमिका निभाये और बाज़ार को ढांचागत सुविधाएँ उपलब्ध करवाए. इसमें सरकार से यह उम्मीद नहीं की जाती है कि वह बच्चों के स्कूल चलाये या अस्पताल चलाये. स्कूल और अस्पताल चलाने का काम निजी क्षेत्र को करना चाहिए. लोगों को सस्ता राशन नहीं मिलना चाहिए क्योंकि इससे भोजन का व्यापार करने वालों का लाभ कम हो जाता है. और आगे बढिए; सरकार को राज्य परिवहन निगम यानी सरकारी बसें भी नहीं चलाना चाहिए और निजी बस संचालक उसू मार्ग पर सड़क चलता है, जहाँ उसे लाभ मिलता है यानी जहाँ गरीब या कम लोग होंगे उन्हे सार्वजनिक परिवहन का हक नहीं मिलेगा. सरकार को बिजली का उत्पादन भी नहीं करना चाहिए और ऐसे विद्युत नियामक आयोग बनाये गए, जो केवल बिजली कंपनियों के लिए ही ढपली बजाते हैं. खेती का काम किसान न करें और खेत कारपोरेट खेती के लिए एग्रो-बिजनेस कार्पोरेशंस को दे दिए जाएँ. २.९० लाख किसानों की आत्महत्या इस नीति की सफलता का सूचक है. पानी भी मुफ्त नहीं होना चाहिए और सरकार का काम लोगों को पानी देना नहीं है. यह सब कुछ निजी क्षेत्र के के आधिपत्य में दे दिया जाना चाहिए. और फिर निजी क्षेत्र लोगों से इसका शुल्क ले, निरंकुश तरीके से लाभ कमाए और सरकार को थोडा-बहुत शुल्क या कर दे दे. इस राजस्व का उपयोग फिर सरकार उन्हे और ज्यादा सुविधाएँ देने में करे. यानी सरकार और समाज १०० धनाड्य परिवारों की सेवा में जुटा रहे.

इन नीतियों को पिछले २३ सालों की सरकारों ने खूब शिद्दत से लागू किया है. सरकारी खर्च कम करने के नाम पर उन्होंने ३० लाख से ज्यादा लोगों को सरकारी और अर्द्ध सरकारी नौकरियों से निकाला और पदों को ख़त्म करते गए. अब सरकार खुद नौकरी नहीं देती और निजी क्षेत्र सबको रोज़गार देगा नहीं क्योंकि इससे उसके उत्पादन की लागत बढ़ती है और लाभ कम होता है. अब छोटा सा सवाल यह है कि भारत का संविधान तो भारत में जनकल्याणकारी राज्य की संकल्पना करता है न! जनता के हितों का ध्यान अब कौन रखेगा? क्या लोगों को पानी, स्वास्थ्य. शिक्षा, भुखमरी से मुक्ति, सुरक्षा उपलब्ध करवाने में सरकार की ही सीधी और केन्द्रीय भूमिका नहीं होना चाहिए. सरकार साल भर आज यही सोचती है कि वह अपना वित्तीय घाटा काम कैसे करे; इस घटे को काम करने के लिए वह शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, कृषि, रोज़गार पर अपना निवेश कम कर देती है; परन्तु निजी क्षेत्र को दी जाने वाली रियायत कम नहीं करती है. संभव है कि इन नीतियों को शिथिल किये जाने के बाद लोग अरबपति न बन पायें (अब भी कुछ ही बन रहे हैं), पर असमानता गैरबराबरी कम होगी, लोगों को अपने संसाधनों पर हक़ मिलेगा जो उनके जीवन में स्वतंत्रता और सम्मान लाएगा. बस एक बात सोचिये कि जिन संसाधनों का इस्तेमाल आज निजी क्षेत्र पूरी गैर-जिम्मेदारी और वहशियाने ढंग से कर रहा है, यदि वही हक़ समुदाय दिया जाए, तो संसाधनों का इस्तेमाल आर्थिक विकास के लिए भी होगा और उनका संरक्षण भी होगा. 

हम सब के दिल-दिमाग पर मीडिया ने हर रोज़ चौबीसों घंटे बार-बार जीडीपी-शेयर बाज़ार के सेंसेक्स को इस तरह पटका कि अब कोई इस वायरस के खतरनाक अंजामों के बारे में सुनने के लिए ही तैयार नहीं है. सेंसेक्स का आंकड़ा उसे चरस के नशे की तरह की अनुभूति देता है. वह सोचता है कि वाह! सेंसेक्स १००० पाईंट बढ़ गया, आज सब्जी सस्ती मिलेगी, अब दवाईयाँ सस्ती होंगी, अब हवा में जहर काम होगा; परन्तु सेंसेक्स के बढने का वास्तविक मतलब इसके ठीक उलट होता है. जब सरकार कहती है कि हम देश की ६७ प्रतिशत जनसँख्या की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क़ानून पारित करते हैं, तो सेंसेक्स गिर जाता है, बाज़ार में मायूसी छा जाती है. जब रोज़गार क़ानून बना, तब भी बाज़ार गिरा गया था. हमारा युवा और पढ़ा-लिखा देश विकास की इन नीतियों के असरों और दूरगामी परिणामों को क्यों नहीं समझना चाहता है?

विश्व बैंक से लेकर तमाम अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संगठन भारत सरकार से कहते रहे हैं कि वह नक्सलवाद को ख़त्म करे क्योंकि आंतरिक शांति के बिना भारत में निवेश की संभावनाएं कम होंगी. सरकार तत्काल कुछ करती है; किसके लिए? निवेश के लिये? लोगों के लिए नहीं? उन मसलों को हमेशा दबाया जाता है, जिनके कारण नक्सलवाद जैसे संकट हमारे सामने खड़े हुए और खून बहाकर जिन्दगी को दूभर कर रहे हैं. जब भी कोई घटना होती है, तो हमारे मंत्री तक कहते हैं कि हम बदला लेंगे और सबक सिखायेंगे...क्या बचकाने टाईप मंत्री इस देश को मिले हैं...जीडीपी और आर्थिक विकास की अनैतिक मंशा में हमारी सरकार इस कदर डूबी रही हैं, कि उन्हे पता ही नहीं चला कि ९८ फीसदी भारतीय बरोजगारी, पोषण की असुरक्षा, गुणवत्ताहीन असमान शिक्षा, भुखमरी और अपराधों से जूझ रहे हैं....

क्या कोई भी एक संकेत है कि नयी सरकार उन नीतियों को खारिज करने की ताकत रखती है, जिन्होने कुटिल पूंजीवादियों को संसद-सरकार-संविधान से ऊपर उठा दिया है? 

भ्रष्टाचार और मंहगाई से सतही संकट को मूल संकट मानना एक बड़ी भूल और अक्षम्य गलती है. मंहगाई, असमानता और भ्रष्टाचार तो परिणाम है......गलत नीतियों और सोच का....क्या हमें नहीं लगता है कि नयी सरकार अब ज्यादा विरोधभासी होगी केवल एक उदाहरण देखिये कभी वह निजी क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की नीति को ख़त्म करने की बात करती है तो कभी कहती है कि रोज़गार के लिए इसकी अनुमति देंगे. गंगा की सफाई की बात बहुत जोरों पर है, पर उसे गन्दा करने का काम तो जल-विद्युत परियोजनाएं कर रही हैं और कई उद्योग कर रहे हैं, उनके बारे में तो एक वक्तव्य भी नहीं आया. इसके साथ ही भारतीय जनता पार्टी नदियों को जोड़ने की परियोजना को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दिखाती रही है. गाय-गांव-गंगा के को सांस्कृतिक प्रतीक मानने वाले ये लोग इतनी बात क्यों नहीं समझते हैं कि हर नदी की एक अपनी एक जलीय दुनिया होती है, खास मछलियाँ होती हैं, बैक्टीरिया बैंक होता है, पानी का पीएच मानक होता है. यदि दो या अधिक नदियाँ जोड़ी जायेंगी तो असंतुलन पैदा होगा. बहरहाल बात किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक दल से जुडी हुई नहीं है. यह तो एक राजनीतिक चरित्र और आर्थिक विकास की विचारधारा को बदलने की बात है. जब तह यह न बदले, तब तक कोई बदलाव मत मानियेगा. पिछले कई सालों से हमारे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुप्पी पर बहुत कटाक्ष हुए, पर यह भी तो देखिये कि वे चुप रहते हुए किस तरह उदारीकरण और निजीकरण को आगे बढ़ा गए. अमेरिका के साथ परमाणु करार, खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, विश्व व्यापार संगठन में खाद्य सुरक्षा पर समझौते जैसे जन-विरोधी फैसले तो उन्होंने ले ही लिए. ये उल्लू बनायिंगवाली बात हो गयी...बुद्धिमान लोग चुटकुले बनाते रहे और नरसिम्हा राव से लेकर मनमोहन सिंह जी तक सब हमें जीडीपी की घुट्टी पिला कर चले गए.   आप किसी एक राजनीतिक दल की विचारधारा में विश्वास करते हैं, बिलकुल करना चाहिए और पूरी स्वतंत्रता के साथ किया जाना चाहिए; पर क्या इसका मतलब यह है कि इस अंधानुकरण में हम यह भी देखना और समझना बंद कर दें कि ये नीतियां और कुटिल पूँजी बाज़ार के विचार केवल राष्ट्र को ही नहीं, इंसानियत को भी जार-जार कर रहे हैं और भीतर ही भीतर उपनिवेशवाद की तरफ ले जा रहे हैं.