देश के प्रधानमंत्री के नाम,
सुना है कि इंटेलिजेंस ब्यूरो ने आपके कार्यालय को एक महत्वपूर्ण और राष्ट्रहित की एक रिपोर्ट सौंपी है. जिसमें कहा गया है कि कुछ संस्थाएं विदेशी अनुदान लेकर देश के विकास को बाधित कर रही हैं और उसकी छवि खराब कर रही हैं. जिन विषयों पर उन संस्थाओं का काम है वे हैं - जलवायु परिवर्तन, जीएम फ़ूड, यूरेनियम का खनन, भीमकाय औद्योगिक परियोजनाएं, जातिगत उत्पीडन और मानव अधिकार आदि-आदि. जहाँ तक मुझे लगता है कि सरकार भी जलवायु परिवर्तन से चिंतित है और जीएम फ़ूड को सुरक्षित नहीं मानती है. मुझे यह भी लगता है कि सरकार को भी विनाशकारी और जन-विरोधी विकास से लिए विदेशी निवेश, अनुदान और ऋण नहीं लेना चाहिए. यह कोई प्राकृतिक सत्य नहीं है कि सरकारें विदेशी पूँजी/धन से जो काम करती हैं, वही पुण्य का काम होता है. बेहतर होगा कि सरकार सत्य और असत्य, जनहित और जन-विरोधी के तत्व के आधार पर ही कोई बात सोचे, विचारे और लागू करे. इस तरह की प्रतिवेदनों के जरिये केवल और केवल गलत नीतियों की मुखालफत को दबाने के लिए किया जा रहा है.
दलित लड़कियों के साथ बलात्कार होता है, उन्हें न्याय नहीं मिलता, वे न्याय की तलाश में देश की राजधानी दिल्ली में जंतर मंतर पर जला देने वाली लू में धरने पर बैठती हैं. वहाँ भी उन्हे न्याय तो नहीं ही मिलता, बल्कि देश की सुरक्षा एजेंसियां उन्हें वहाँ से हथियारों के बल पर खदेड़ देती हैं. क्या उन्हे आपकी सरकार में कोई विश्वास होना चाहिए? और इसके बाद संसद के संयुक्त सत्र में आपकी सरकार की तरफ से महिलाओं की सुरक्षा और न्याय के शब्दों से सजा एक गुच्छा परोसा जाता है.
यह स्पष्ट है कि परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के दुष्प्रभाव बहुत गहरे हैं. यह कोई कल्पना नहीं है, पिछले कुछ महीनों में हुई घटनाएं सच सामने ला चुकी हैं. जब यह सच है, तो इस सच को कहने वालों के खिलाफ सरकार क्यों है? हाल ही में २५ छात्रों को बड़े बाँध ने डुबो दिया, इसके पहले भी मध्यप्रदेश में धाराजी में ४०० लोग मर गए थे. ऐसी कई दुर्घटनाएं बड़ी बांधों से हुई हैं. इन दुष्प्रभावों को उजागर करने वाले सरकार के हिसाब से देश-द्रोही या विकास विरोधी क्यों हैं? बेतरतीब, दृष्टिहीन विकास नीतियों ने पर्यावरण के चक्र को तोडा और जलवायु परिवर्तन के संकट को हमारे सामने लाकर खड़ा कर दिया. इस संकट के मूल कारणों पर बहस करने वालों को राष्ट्रद्रोही क्यों माना जाता है? ऐसा क्यों है कि राष्ट्रवाद और विकास के पक्ष में होने का मतलब आँख मूँद कर उन नीतियों और कृत्यों को स्वीकार करते रहना है, जो किसानों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर रही हैं, जिनके कारण ४० करोड़ लोग भूखे सोते हैं, गैर-बराबरी बढ़ी है, १००००० हेक्टेयर जमीन किसानों से छीन ली गयी और १० करोड़ लोगों को उनकी जगहों से उजाड़ कर विस्थापित होने के लिए मजबूर कर दिया गया.
ऐसा क्यों है कि इस देश में समाज के हित की बात करने का मतलब विकास विरोधी होना हो गया है? अब हमारी सुरक्षा एजेंसियां महिलाओं के गले से चेन खींचने वालों, छोटे बच्चों का अपहरण करने वालों और नाबालिग बच्चों-महिलाओं से बलात्कार करने वालों को खोजने का काम नहीं करती हैं. उनकी मुख्य जिम्मेदारी है कि उन्हें खोजो, जो सरकार (किसी की भी सरकार हो) की राष्ट्र-विरोधी, पर्यवारण को नुकसान पंहुचाने वाली, संसाधनों की लूट को प्रेरित करने वाली नीतियों की मुखालफत करते हैं. उन्हें खोजो, जो कलम चलते हैं और उन्हें दंड देने के भरसक जतन करो.
ऐसा लगता है कि देश की आवाम भी इस तरह की पहलकदमियों पर चुप रहना चाहती है. वह कभी नहीं देखती कि ये सरकार या सरकारें किनका हक छीन कर उनके घरों में पानी पंहुचा रही है? वह यह नहीं देखना चाहती कि जो रोशनी और बिजली उनके घर को अँधेरे-उजाले में भी रोशन कर रही है, उसके लिए कितने गांव, लोग, किसान, बच्चे और महिलायें जड़ों से उखाड़े गए और गुमशुदा कर दिए गए. वह सोचने के लिए तैयार नहीं है कि यह विकास उनके खुद के बच्चों को किस तरह से बीमार और खोखला बना रहा है. वे खुश हैं क्योंकि सरकार उद्योगपतियों से बड़े-बड़े अस्पताल बनवा रही है. समतल, सपाट और चमकती हुई सड़क पर धुआंधार गति से चलती गाडी उन्हें यह सोचने का कोई अवसर नहीं देती है कि हर चमकदार सड़क के नीचे भी एक शमशान है, जिसमें कई लोगों का भोजन, रोज़गार, खेल का मैदान, कई चिड़ियाओं के आशियानें, खेत, रोज़गार, लोगों के आराध्य, देवी-देवता, झरने, नदियाँ दफ़न हैं. आज जब आसमान से आग बरसती है तो लोग बस यही सोचते हैं कि बिजली आ जाती तो सब ठीक हो जाता. वे अब भी यह नहीं सोचते कि ये आग बरस क्यों रही है? यह आग इसलिए बरस रही है क्योंकि हमने सूरज को शीतल बनाने वाले हर साधन और सम्भावना को अपने विकास के हवन में झोंक दिया है.
और ऐसे में जब कोई कुछ कहता है, तो वह सरकार का अपराधी होता है. वह देश द्रोही और राष्ट्रद्रोही होता है. मेरी तो इतनी सी बात समझ में आती है कि आज यह जरूरी नहीं है कि सरकार का मतलब जनहित ही हो. कोई भी सरकार हो, उसे एक ऐसा समाज चुन रहा है, जो लगभग असहिष्णु हो चुका है. यह दुखद है कि तात्कालिक सुविधाओं और विलासिता वाले विकास के लिए, हम देश की अमूल्य सम्पदा की बलि देने के लिए तैयार हैं. यदि कोई उसे बचाने की कोशिश करेगा, जो सुरक्षा और राष्ट्रहित के नाम पर सरकारें उनके विचारों को, उनके घर और अस्तित्व के साथ तहस नहस कर देंगी. मेरा एक साधारण का सवाल है. जो विद्वान सरकार के लिए नीतियां बनाते हैं, क्या वे कभी एक पल को यह विचार भी करते हैं कि अगले २०-३० सालों के लाभ और चमक के लिए वे जिस कोयले का पूरा उत्खनन कर लेना चाहते है, वह भण्डार ५००० सालों में बना है. जिस बाक्साईट को वे हवाईजहाज़, मिसाइल, बड़ी इमारतें बनाने के लिए ३० सालों में खोद डालना चाहते हैं, वह भण्डार भी १० से १५ हज़ार सालों में बना है. ये जंगल और नदियाँ भी किसी कारखाने में रातो-रात नहीं बने हैं. इन्हें खतम करने का हक न तो हमारे मतदाता को है, न ही उसकी चुनी हुई सरकार को. यह बात कहने वाला सरकार के खिलाफ माना जायेगा. मुझे उस सरकार के पक्ष में क्यों होना चाहिए, जो २.९० लाख किसानों की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार हो, जिसकी शिक्षा नीतियों के कारण २०००० छात्रों में आत्महत्या की हो, जहाँ हर घंटे में ४ बलात्कार होते हों....ये सरकारें, समाज के हित की सरकारें कैसे मानी जाएँ?
हमारी सरकारों ने यह वक्तव्य भी देना छोड़ दिया है, जो भारत के संविधान में लिखा हुआ है - राज्य, विशिष्टया, आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा और न केवल व्यष्टियों के बीच बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए लोगों के समूहों के बीच भी प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असामनता समाप्त करने का प्रयास करेगा.
मेरा संविधान मुझे भाग-४ में कुछ मूल कर्तव्य भी सौंपता है, जो ताकीद करते हैं कि एक नागरिक के रूप में "हम प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और अन्य वन्य जीव है, रक्षा करें और उसका संवर्धन करें तथा प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव रखे". यदि मैं अपने संविधान का पालन करता हूँ, तो क्या मैं विकास विरोधी हूँ और वैश्विक पटल पर देश की छवि खराब कर रहा हूँ? कतई नहीं, इससे केवल पूँजी और संसाधन लूटने वाले समूह और लोग ही दुखी होंगे.
यही संविधान कहता है कि हम स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोये रखें और उनका पालन करें; हमारा स्वतंत्रता आंदोलन, हमें सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक गुलामी की मुखालफत करने का सन्देश देता है. हमारी सरकार उसे विकास-विरोधी क्यों मानती है? ऐसा क्यों है कि सरकारें और सरकार के नुमाईन्दे इस देश के मूल्यों और संविधान को ही राष्ट्र हित और विकास के खिलाफ मानने लगे हैं?
इन सवालों के जवाब मुझे नहीं चाहिए. मैं बस चाहता हूँ कि देश चलाने वाले खुद के लिए इन सवालों के जवाब खोजें.
बस इतना ही.
सचिन कुमार जैन
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