नयी सरकार क्या नया विचार लाएगी?
नयी सरकार विचार के आयात को प्राथमिकता देगी या देशज चिंतन, जरूरत और क्षमताओं को?
जो नयी सरकार में है, वह तो स्वदेशी की विचारधारा को मानते थे; क्या अब भी वे स्वदेशी की विचारधारा को मानते हैं?
ऐसे की कई और सवाल अब हम सबके सामने हैं. इनके विश्लेषण की एक प्रक्रिया के तहत मेरा पहला आलेख.
आर्थिक नीतियों में नैतिकता की जरूरत
सचिन कुमार जैन
भारत के लोगों ने भारतीय जनता पार्टी
के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को पूर्ण ही नहीं, सम्पूर्ण बहुमत
दिया है. यह इस बात का भी संकेत है कि अब वह कोई अधूरा काम न करे, यही जनमत उससे
अपेक्षा करता है. भारतीय जनता पार्टी की जड़ें मूलतः स्वदेशी की विचारधारा में रहीं
हैं, परन्तु १९९१ में अपनाई गयी आर्थिक नीतियों ने राजनीति और अर्थनीति, दोनों में
से ही देश ज्ञान, विज्ञान, संसाधन, प्रबंधन और सामुदायिक नियंत्रण के पहलुओं को
छील-छील कर बाहर निकाल फेंका. हमनें पूरी तरह से उन नीतियों को अपनाया, जो
अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और पूँजी वादी अर्थव्यवस्थाओं के हित में थीं.
उम्मीद यह की जाना चाहिए कि वे आज के दौर में कार्पोरेट्स, वित्तीय संस्थाओं के
साथ साथ किसानों, मजदूरों और कुटीर उद्योगों से भी बजट के पहले संवाद करेंगे.
कांग्रेस ने हार्वर्ड और केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के बुद्धिजीवियों की बात को
तवज्जो दी, अब जरा भारतीय अर्थशास्त्रियों की भी बात सुन लीजियेगा. अब अब नीति में
नैतिकता लाना होगी. पिछले कुछ सालों में अच्छे विकास के लिए काम और बुरे विकास के
लिए ज्यादा नीतियां बनी हैं. एक नीति बना कर हर किस्म के बेतरतीब खनन के लिए
अनुमति दे दी जाती है. पर्यावरण संकट के बावजूद वन विभाग जंगलों का आर्थिक लाभ के
लिए बेतरतीब दोहन कर रहा है, पूरी चिकित्सा शिक्षा निजी क्षेत्र में धकेलने की
नीति बनी गयी, जिससे यह शिक्षा बहुत मंहगी हो गयी और इससे स्वास्थ्य सेवाएँ
भी.
भारत के नीति बनाने वालों ने हमेशा
यही तर्क दिया कि आर्थिक विकास के लिए पूँजी चाहिए और पूँजी हमारे पास नहीं है,
पूँजी तो “कार्पोरेशंस
और अमेरिका” के
पास है. कार्पोरेशंस और अमेरिका ने कहा कि हम निवेश करेंगे, यदि भारत की व्यवस्था
और सरकार हमारे कहे मुताबिक नीतियां बनाये. परिणाम आप देख लीजिए एक तरफ सकल घरेलू
उत्पाद बढ़ता रहा, दूसरी तरफ नदियाँ सूखती गयीं, हवा में जहर फैलता गया, भुखमरी और
बेरोज़गारी बढ़ती गयी, जंगल खतम होते गए, जमीन पर कंपनियों का कब्ज़ा होता गया और
हमारे राजस्व को भी कम कर दिया गया. यह कैसा विकास है जिसमें सरकार तरह-तरह की
कंपनियों को एक साल में २ लाख करोड़ रूपए की “कर
और शुल्क छूट” देती
है. वे कम्पनियाँ १ करोड़ रूपए के व्यापार पर बस ५ व्यक्तियों को रोज़गार देती हैं.
और हम फिर भी हम जीडीपी-जीडीपी जपते रहते हैं.
नयी सरकार के सामने चुनौती भुगतान
संतुलन को बनाने की है. वर्ष २०१२-१३ में भारत ने कुल ३००२७ करोड़ डालर का निर्यात
किया जबकि ४९०५३ करोड़ डालर का आयात हुआ. यानी हमनें अपने खजाने से १९०२६.५ करोड़
डालर विदेशी मुद्रा के रूप में ज्यादा खर्च किये. वर्ष २०१३-१४ की अप्रैल’१३-जनवरी’१४
की अवधि में २५७०८.९ करोड़ डालर के निर्यात के विरुद्ध भारत में ११९९५.६ करोड़ डालर
ज्यादा खर्च करते हुए ३७७०४.५ करोड़ डालर का आयात किया. इसके दूसरी तरफ चीन निर्यात
ज्यादा करता है और आयात कम करता है क्योंकि उसनें निर्माण (मैन्युफेक्चारिंग) पर
ज्यादा निवेश किया है. जब तक कृषि, पेट्रोलियम, मशीनरी, आटोमोबाइल के क्षेत्र में बेतहाशा
आयात की बाध्यता से बाहर नहीं निलेंगे, तब तक हमारी आर्थिक नीतियों को विकसित और
प्रभावशाली देश नकारात्मक रूप से प्रभावित करते रहेंगे.
अब जबकि राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन
को भरपूर जनमत मिला है, तो अब अपेक्षा की जाना चाहिए कि वे भारत और भारत के लोगों
के हितों को केंद्र में रख कर आर्थिक विकास की नीतियां बनायेंगे. पिछले दो दशकों
में यही धारणा स्थापित हो गयी है कि मानव विकास (शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक
समानता, आदिवासी अस्मिता और दलितों का सशक्तिकरण आदि) जैसे क्षेत्रों पर किया जाने
वाला निवेश आर्थिक विकास और आर्थिक विकास के लिए किये जाने वाले प्रयासों को
नुकसान पंहुचाता है. भारतीय जनता पार्टी ने लोगों की क्षमताओं और कौशल के विकास पर
बल देने की बात की है. जब तक बच्चों में कुपोषण और एनीमिया जैसी स्थितियों को खत्म
नहीं किया जायेगा, तब तक हम एक सशक्त और सक्रीय व्यक्ति पैदा नहीं कर सकते हैं, जो
किसी के सामने झुकने के लिए मजबूर न हो; तो क्या मानव विकास के लिए निवेश किये
बिना आर्थिक विकास लाया जा सकेगा, इस पर सरकार को अभी अपना नजरिया आधिकारिक रूप से
स्पष्ट करना होगा.
सबसे शुरूआती क़दमों के तौर पर
राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक गठबंधन की सरकार को पेट्रोलियम पदार्थों की नीति पर
पुनर्विचार करना चाहिए क्योंकि इस मामले में कुछ भी गलत होने पर हर पल हर व्यक्ति
सरकार को कोसता है और गुस्सा दिखाने की एक मौका खोजता है. दूसरी बात यह है कि
आदिवासियों को वनों पर हक देने वाले वन अधिकार क़ानून का आदिवासियों के नज़रिए से
क्रियान्वयन सुनिश्चित करे; न की खनन कंपनियों और वन विभाग के नज़रिए से, जो नहीं
चाहते हैं कि इस क़ानून के जरिये आदिवासियों को संसाधनों पर ऐसे हक मिलें, जो
वास्तव में उनकी जिंदगी सकारात्मक रूप से बदला सकते हैं.
इस व्यवस्था में “हितों
के टकराव – कानफ्लिक्ट आफ इंटरेस्ट” ने
बहुत नुक्सान पंहुचाया है. बच्चों के खाने का सामान बनाने वाली कंपनी के लोग भारत
सरकार की नीति बनाने वाली समिति में होते हैं, उच्च शिक्षा संस्थान चलने वाले लोग
शिक्षा की नीति बनाते हैं. इसका मतलब यह है कि वे अपने धंधे के हित देख कर नीति
बनाते हैं, न की जनहित देख कर. शुरू में ही एनडीए सरकार को तय करना होगा कि नीति
बनाने के काम में कोई भी ऐसा व्यक्ति या संस्थान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से
शामिल न हो, जिसके हित उस नीतिगत विषय से सम्बंधित हों.
अब कार्पोरेट्स को करों-राजस्व की माफ़ी
देने की नीति बदली जाना चाहिए. यह एक बड़ा कारण है, जिसके चलते हमारा टेक्स-जीडीपी
(जीडीपी के अनुपात में कर संग्रहण) अनुपात १७ प्रतिशत के आसपास है. यदि हम इसे
बढाकर २३ प्रतिशत पर ला सके तो देश में हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, हर
व्यक्ति को रोज़गार, सभी को सुरक्षा, सभी को सामाजिक सुरक्षा, बच्चों को संरक्षण और
पोषण सहित जीवन का हर अधिकार, पीने का साफ़ पानी दिया जा सकता है. इन सेवाओं की
सुरक्षा सुनिश्चित किये बिना लोग क़र्ज़ और असुरक्षा के बाव से मुक्त न हो पायेंगे.
प्राकृतिक संसाधनों की नीलामी को
नियंत्रित किया जाना चाहिए. यह सही है कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग विकास के
लिए जरूरी है, बेहतर होगा कि समुदाय के जरिये इन संसाधनों के उपयोग की नीति बनायीं
जाए. साथ में सूचक यह हो कि एक सीमा के बाद संसाधनों का दोहन नहीं किया जायेगा. इस
तरीके से हम तेज़ी से बढ़ रही गैर-बराबरी और क्षेत्रीय टकरावों को भी नियंत्रित कर
पायेंगे.
तेल/पेट्रोलियम के मामले में सरकार
को अपनी नीति में बदलाव लाने की जरूरत है, क्योंकि इससे सार्वजनिक परिवहन और हर
वस्तु की कीमतों का सीधा जुड़ाव है, जैसे ही डीज़ल-पेट्रोल की कीमतें बढती हैं, वैसे
ही टमाटर और कपड़े के दाम बढ़ जाते हैं. लोगों के दैनिक जीवन और बुनियादी जरूरतों पर
इसके प्रभावों को समझते हुए जिम्मेदार उपभोग प्रवर्ति विकसित करने की प्रक्रिया
शुरू हो. वर्ष २००४ में कच्चे तेल की कीमत ३० डालर प्रति बैरल थी, जो अब बढ़ कर १००
डालर तक पंहुच चुकी है. हमें यह समझना होगा कि हम हमेशा बढती हुई कीमतों के साथ
सामंजस्य बिठा कर नहीं चल पायेंगे, हमें अपने उपभोक्ता व्यवहार को तार्किक और
जिम्मेदार बनाना होगा. एक तरफ हम तेल की कीमतें बढ़ाते रहें, और दूसरी तरफ उसका
उपभोग गैर-जिम्मेदार तरीके से होता रहे, इससे मसला हल न हो पायेगा.
विकास के कार्यक्रमों, जैसे महात्मा
गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना, बेकवर्ड रीजन ग्रांट फंड, बुंदेलखंड पैकेज आदि
का विश्लेषण करने की जरूरत है. इन कार्यक्रमों में बड़े पैमाने पर आर्थिक संसाधनों
का उपयोग हो रहा है, निगरानी के अभाव, शिकायत निवारण व्यवस्था और जन-मूल्यांकन की
व्यवस्था के अभाव के कारण ऐसे कार्यक्रम अपने मकसद में सफल नहीं हो पाए. शायद नयी
सरकार यह समझ सके कि निगरानी और शिकायत निवारण व्यवस्था न होने के कारण भ्रष्टाचार
पनपता है और मशीनरी गैर-जवाबदेयता के साथ काम करती है. मनरेगा के तहत आठ सालों में
२ लाख करोड़ रूपए से ७ लाख काम शुरू किये गए, परन्तु आंकड़े बताते हैं कि केवल २०
प्रतिशत काम ही पूरे हो पाए. लोगों को का तो समय पर काम मिला, न ही बेरोज़गारी
भत्ता मिला; जिन्हें काम मिला पर मजदूरी नहीं मिली. ८० हज़ार करोड़ रूपए की मजदूरी
का भुगतान देरी से हुआ, पर लोगों को देरी मजदूरी भुगतान पर मिलने वाला मुआवजा नहीं
मिला, जो की क़ानून का प्रावधान है.
आज की स्थिति में १९.२० करोड़ लोगों
को रोज़गार की जरूरत है. रोज़गार की यह जरूरत केवल बड़े उद्योगों और सेवा क्षेत्र से
पूरी न की जा सकेगी. इसके लिए भारत में क्षेत्रीय संदर्भ को ध्यान में रखते हुए
उनके मौजूदा कौशल को भी स्थान देते हुए लघु-स्थानीय उद्योगों और कृषि को महत्व
देना होगा. निश्चित रूप से यह समय छोटे और मझोले किसानों के संरक्षण देने का भी
है. हांलाकि यह सही है कि इससे स्टाक एक्सचेंज में सूचीबद्ध ५०० बड़ी कंपनियों को
नुक्सान उठाना पढ़ेगा.
अब नयी सरकार को देखना होगा कि हम
अपने विकास के लिए अपनी परिभाषा, देशज परिभाषा कैसे गढ़ सकते हैं. बाजार और कुटिल
पूँजीवाद के इशारों पर विकास की परिभाषा न गढ़ी जाए. अब कदम कदम पर इस सरकार को
साबित करना होगा कि वह किसकी सरकार है? आर्थिक विकास के साथ मानव विकास और मानव
विकास का खुशहाली के सूचकों के सतह मूल्यांकन किये जाने व्यवस्था आज की सबसे बड़ी
जरूरत है. एनडीए के रणनीतिकारों को समझना होगा कि विकास का मुहावरा भी अगले ५
सालों में अपना महत्व खो देगा, यदि लोगों को हक़ के रूप में बुनियादी सेवाएँ नहीं
मिलीं और गैर-बराबरी काम नहीं तो!
(भारतीय जनता पार्टी, भारत सरकार, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, सचिन कुमार जैन)
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