Wednesday, 19 September 2012

तुम्हारा नहीं होते जाना






बेहद दर्दनाक है अब यह मान लेना
कि स्याही के प्रवाह पर बन गये हैं
नफे-नुकसान के बांध,
सड़ गई है वह नदी
जो सींचा करती थी आशाओं को,
पर तुम चुप हो
बस बहाने बनाकर,
तुमने भी छाप दिये हैं
विकास के सरकारी बयान,
साथी, विज्ञप्ति से परे हटकर
कभी यूं ही चले आते
हमारी जड़ों की गहराई में झांकनें,
यही पूछने चले आते
कि मेरे आंगन की तुलसी,
मिट्टी की महक
आम के झुरमुटों से झांकती धूप
और ख्वाजा की दरगाह का
क्या मोल लगा विकास के नाम पर,
तूमने यह भी नही पूछा
कि कहां डूब गई गांधी की मूर्ति,
और विस्थापित हो गये हैं हम
अपनी उम्मीदों के गांव से,
सत्ता ने तय कर दिया है मुआवजा
मिला एक झूठ जिन्दगी के एवज में,
पर तुमने कभी नही पूछा
मेरा कोई सवाल,
तुम्हारा चुप रह जाना है
संभावनाओं का खत्म हो जाना,
पर संघर्ष जारी रहेगा
अब तुम्हारे खिलाफ़ भी;;

सचिन 

नर्मदा जल सत्याग्रह - केवल जमीन का नहीं न्याय का आग्रह




गोघल गाँव और खरदना गाँव में 200 लोग 17 दिनों तक नर्मदा नदी में ठुड्डी तक भरे पानी में खड़े रहे। वे कोई विश्व रिकार्ड नहीं बनाना चाहते थे। उन्हे अखबार में भी अपना चित्र नहीं छपवाना था। उन्हे विकास के नाम पर जल समाधि दी जा रही थी, जिसके विरोध में उन्होने जल सत्याग्रह शुरू किया। वे कह रहे थे यदि देश के विकास के लिए बांध बना है तो उनके जीवन के अधिकार को क्यों ख़त्म किया जा रहा है? वे संसाधनों पर अधिकार चाहते थे क्यूंकि जमीन, पानी और प्राकृतिक संसाधन की उनके जीवन के अधिकार का आधार हैं।   
मध्यप्रदेश में दो बडे बाँध - इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर बाँध है। इन बांधों से बिजली बनती है और कुछ सिंचाई भी होती है। इन बांधों के दायरे के बाहर की दुनिया को इन बांधों से बिजली मिलती है और उनके घर इससे रोशन होते हैं। रेलगाड़ियाँ भी चलती है। ये बिजली सबसे ज्यादा रोशन करती है नए भारत के शहरों को, उन उद्योगों को, जो रोज़गार खाते हैं, माल्स और हवाई अड्डों को। खरगोन, खंडवा, हरदा, देवास ये वे जिले हैं जहाँ लगभग 2 लाख परिवारों को उनकी जड़ों से उखाड़ा गया यानी सरकार ने उनकी दुनिया का अधिग्रहण कर लिया  है। यह एक अध्यादेश होता है जो बात तो करता है जमीन के एक टुकडे की परन्तु सच में वह एक ऐसा दस्तावेज होता है जो लोगों को बताता है कि देश और समाज (शहर और एक ख़ास वर्ग) की विलासिता के लिए तुम्हे बलिदान देना होगा।  
स्वतंत्रता के बाद से लगतार देश में लोगों को विस्थापित किया जाता रहा है; विस्थापन के शिकार आदिवासी, दलित और भूमिहीन सबसे ज्यादा रहे, क्यूंकि सम्पत्तिवान लोगों की संख्या हमेशा से कम रही और सरकार ने उन्हे उनके प्रभावों के चलते उन्हे हमेशा कुछ हद तक सुविधाएं दीं। इन बांधों या किसी और भी परियोजना में जिन पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा उनकी जिन्दगी प्राकृतिक संसाधनों जैसे - जमीन, पानी, जंगल और पारंपरिक उद्योगों पर निर्भर रही है। वे मुद्रा यानी नकद यानी कागज़ की सम्पदा में रमते ही नहीं हैं। ऐसे में उन्हे उनकी जमीनों के बदले मुआवजे के तौर पर नकद राशि देने की व्यवस्था बनायी गयी। यह सरकार के हिसाब से सबसे सस्ता, आसान और सहज विकल्प था; परन्तु लोगों के लिए बहुत कठिन और जीवन ख़त्म कर देने वाला विकल्प; एक उदाहरण देखिये।
1980 के दशक में जब रानी अवंती बाई परियोजना यानी बरगी बाँध बना, तब लोगों को 800 से 1500 रूपए प्रति एकड़ के मान से मुआवजा दिया गया। जैसे ही आस-पास के लोगों को पता चला तो सभी यह मानने लगे अब तो विस्थापित जमीन खरीदेंगे, ये उनकी मजबूरी है। और दो तीन दिनों के भीतर वहां जमीन के दाम बढे। एक हज़ार रूपए एकड़ की जमीन कुछ दिनों में 3500 रूपए की कीमत तक पंहुच गयी। लोगों को जो नकद राशि मिली थी उसके कोई मायने ही नहीं रह गए। सरदार सरोवर में मिले नकद मुआवजे से जमीन खरीदने के लिए जो व्यवस्था बनाई गयी उसमे पटवारी से लेकर राजस्व अधिकारी, वकीलों और भू-अर्जन अधिकारी के गिरोह को सक्रीय कर दिया। जिन्होने मिलकर आदिवासियों और विस्थापितों के चील-कौयों की तरह नोचा। सर्वोच्च न्यायालय में भी मामला गया और मध्यप्रदेश सरकार कहती रही हमारे पास परियोजना प्रभावितों को देने के लिए जमीन नहीं है; पर डुबोने के लिए जमीन थी। जमीन तो थी और है भी। यदि सरकार की मंशा होती तो परियोजना प्रभावितों का स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की तरह का सम्मान होता। उन्हे सामान्य इंसान से थोडा तो ज्यादा माना ही जाता। उन्हे अपने ही देश में गैर-कानूनी अप्रवासी और अतिक्रमणकारी और अधूरे नागरिक का दर्ज़ा नहीं दिया जाता।  जो अपनी पूरी सम्पदा देश के विकास के लिए दे रहा है, क्या उसके लिए बेदखली की प्रक्रिया चलाना कोई न्यायोचित कृत्य है। क्या है इनकी अपेक्षाएं - भूमिहीनों के लिए एक निर्धारित सम्मानजनक नकद राशि और जमीन के बदले जमीन; बस यही न।
जब समुदाय ने यह बताने की कोशिश की तो उसे विकास विरोधी और राष्ट्रद्रोह के मुकदमों में फंसाया गया। और फिर राज्य सरकार के प्रतिनिधि मंत्री ने सन्देश दिया कि ये मुट्ठीभर जल सत्याग्रही हमें कमज़ोर न समझे। हमें सरकार चलाना आता है और हम दबेंगे नहीं। हम अपना काम करेंगे। और ठीक 20 घंटे के बाद पुलिस बल ने ताकत का प्रयोग करने सत्य के आग्रह को ठुकरा दिया।
जो लोग गोघलगाँव और खरदना में 15 से 17 दिन पानी में इसलिए खड़े रहे ताकि उनकी बात सुनी जाए। जो इंसानी तरीकों से तो व्यवस्था सुन ही नहीं रही थी। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और पुनर्वास की नीति है कि जब तक पुनर्वास पूरा नहीं होगा तब तक बांधों में जलभराव के स्तर को इंदिरा सागर में 260 मीटर और ओंकारेश्वर में 189 मीटर तक रखा जाएगा परन्तु इन बांधों में दो मीटर से ज्यादा जलभराव का स्तर बढ़ा दिया गया, जिनसे 100 ऐसे गांव प्रभावित हुए जिनका सर्वे तक नहीं हुआ था।  खेत, जंगल और घर डूब में आये। यह सरकार और योजनाकारों की रणनीति होती है। पुनर्वास की प्रक्रिया को वे विलम्ब करते जाते हैं और दूसरी तरफ जल स्तर बढाते जाते हैं ताकी जमीनें डूबती जाएँ। जब घर और जमीन ही डूब जाते हैं तो फिर सर्वे नहीं हो पाता है। तब जमीनी स्तर पर भूअर्जन अधिकार, पटवारी, पंजीयक और स्थानीय प्रशासन का गठजोड़ ग्रामीणों की जिन्दगी में से संभावनाओं की आख़िरी बूँद तक निचोड़ लेता है। जिनका सब कुछ डूब रहा होता है वे कर्जे लेकर इन अधिकारियों को रिश्वत देते हैं। औरतें अपने घर के बर्तन और गहने बेंचने को मजबूर हुई। सिर्फ इस उम्मीद पर कि यदि जमीन मिल गयी तो जिन्दगी चल जायेगी।  सरदार सरोवर परियोजना में नकद मुआवजे और जमीन की खरीदी में अब तक 600 करोड़ रूपए का घोटाला और भ्रष्टाचार सामने आ चुका है।
लोग अपना शरीर गलाते हैं. हो सकता है ये उनका बाल हठ हो; पर क्या हमारे मुख्यमंत्री घटना जानने के बाद उनके पास जा नहीं सकते थे; उनके पास बात कर पूछ नहीं सकते थे - बताओ अम्मा क्या बात है; हम आज ही समस्या हल करेंगे; क्या वे मध्यस्थों को अपने से कुछ सौ मीटर दूर नहीं धकेल सकते थे; वे कहते हैं कि सरकार को विस्थापितों से सीधे बात नहीं करने दिया गया; बिलकुल सही बात है, आपने सत्ता और माफिया के उस गठजोड़ को जानते हुए भी तोडा क्यों नहीं और क्यों इसे झूठे अहम् का मुद्दा बनाया; आप के संज्ञान में यह बात क्यों नहीं लायी गयी कि लोग और आन्दोलन कुल मिलाकर 487 ज्ञापन मुख्यमंत्री कार्यालय के दे चुके हैं; 8 बार भोपाल में उनसे या उनके प्रतिनिधियों से मिले हैं; 170 दिन का अनशन कर चुके हैं; जिला स्तर और जल विधुत परियोजना कंपनी को दिए गए आवेदनों की गिनती अभी भी जारी है; इतनी सब के बाद आप यह कहते हैं बाँध भरेगा, किसी कोई कुछ और नहीं मिलेगा और दूसरे मंत्री कहते हैं हम दबेंगे नहीं; मान्यवर, दबना या दबाना तो मंशा ही नहीं रही है. मंशा तो संविधान को गले लगाने की है; जो सरकार लगाने नहीं दे रही है. 
भारत में चल रही बड़ी विकास परियोजनाओं का दो कारणों से जन-विरोध है। एक - चूँकि ज्यादातर परियोजनाएं गाँव, जंगल और नदियों-समुन्दर के आस-पास हैं और उन पर लोगों की आजीविका ही नहीं बल्कि उनकी सांस्कतिक और सामाजिक पहचान भी निर्भर करती है; इसलिए उन परियोजनाओं से प्रभावित होने वाले लोग संसाधनों की सुरक्षा चाहते हैं। वे एक एकड़ जमीन के बदले 10 लाख रूपए नहीं, बस उतनी ही जमीन चाहते हैं। वे एक सम्मानजनक पुनर्वास चाहते हैं। दो - लोग यानी समाज जानता है कि यदि जंगल ख़त्म हो गए, नदियाँ सूख गयी और हवा जहरीली हो गयी तो मानव सभ्यता ख़त्म हो जायेगी। यह बात सरकार और पूँजी समर्थक नव-उपनिवेशवादी नीति निर्माता समझने को तैयार नहीं हैं। लोग पर्यावरण और जैव-संस्कृति की के मत पर निजी विकास नहीं चाहते हैं। जब सत्ता इस मंतव्य को समझती नहीं है; तब टकराव होना स्वाभाविक है। समाज मूल्यों आधारित बात करता है और राज्य अपनी ताकत का इस्तेमाल करता है। विडम्बना देखिये कि सरकार जनहित में विकास की योजना को लागू करने के लिए जनता के ही खिलाफ हिंसा, दमन और शोषण का रास्ता अख्तियार करती है।   

सचिन कुमार जैन

विकास माने चिताओं से जीवन में गर्मी का सिद्धांत






विकास का पैमाना है कुछ हज़ार करोड़ रूपए के खर्च की परियोजना; उन परियोजाओं से कुछ कंपनियों का शेयर बाज़ार में दाम बढ़ना और कुछ हज़ार युवाओं को नए जमाने की बाबुगारी (रोजगारी) के अवसर; ताकि वे जौकी का अंडरवीअर, पेंटालून की शर्ट  और मर्दों वाली गोरेपन की क्रीम खरीद सकें। अब तो नया मोबाइल भी 2 महीने में पुराना हो जाता है क्यूंकि नया माडल आ जाता है। नई जीवन शैली में यदि दिन में बिजली चली जाए तो जिन्दगी रुक जाती है, अब जंगल और नदी की तरफ घूमने जाना हो, तो 3 महीने तो तनख्वाह खर्च करे पैकेज लेना पड़ता है। इस पर विलासिता के लिए हर तरह का क़र्ज़ भी मिलता है; ताकि आप जाल में फंसे रहें; के इसका मतलब यह नही है कि नया विकास यानी भौतिकता का जाल। जिसमे आप जो हासिल करते हैं या करना चाहते हैं; उसके बारें आप आखिर में यही कहते हैं पता नहीं हमें यह क्यों चाहिए। इसी सोच को पालने-पोसने का काम हमारे वो नीति निर्माता समूह करते हैं, जिस समूह में चड्डी, बनियान, टेलिविज़न, फ्रिज और झूठे सपने बेचने वाले व्यापारी बैठे हुए हैं।  इन नीतियों में यह कभी तय नहीं किया जाता है कि इन योजनाओं के नफे-नुकसान क्या है। तात्कालिक हित और दीर्घकालिक अहित क्या हैं? वर्ष 2005 से 2008 के बीच मध्यप्रदेश में 39000 हेक्टेयर जंगल कम हो गया; पर विकास की बहस में सरकार इस सच को छिपा गयी।
जिन परियोजनाओं की बात आज हो रही है उन परियोजनाओं में भी यह आज तक तय नहीं हो पाया कि कितने गाँव और कितने जंगल और कितने लोग डूबेंगे; ऐसे में किस सरकार की बात कर रहे हैं हम? यह सरकार एक मृगतृष्णा है; जो नज़र आता है वह होता ही नहीं है; लोकतंत्र में विकास का मतलब यह नहीं कि 80 प्रतिशत को बिजली देने के लिए आपको बाकी के 20 प्रतिशत की हत्या कर देने का अधिकार है; यदि उन 20 फीसदी का सही पुनर्वास नहीं होगा तो किसी को भी सुकून से उस बिजली से वातानुकूलित यन्त्र चलाने का नैतिक अधिकार नहीं होना चाहिए; एक भी परियोजना ऐसी नहीं है जिसके बारे में तथाकथित विशेषज्ञ सही आंकलन करके बता पाए हों कि इसके चलते जैव विविधता और पारिस्थितिकीय व्यवस्था का कितना नुकसान होगा। ऐसे में हमें न्याय की परिभाषा और भारत की राजनीतिक व्यवस्था के चरित्र पर सवाल उठाने ही होंगे। जब विकास की रूप रेखा बनायी जाती है, तब क्या न्याय उसका मूल सूचक और अंतिम  लक्ष्य  नहीं होना चाहिए? बिना न्याय क्या कोई भी विकास संभव है? इंदिरा सागर और ओम्कारेश्वर बाँध परियोजनाएं तो यह बताती हैं कि जितना ज्यादा अन्याय होगा, विकास का चेहरा उतना ज्यादा उजला माना जाएगा। न्याय का मतलब केवल लोगों को जमीन मिलना नहीं है। न्याय का मतलब है समाज का राज्य की व्यवस्था में विश्वास होना कि वह यानी राज्य उसे बलि नहीं चढ़ाएगा। उसके दुखों को समझेगा और उसे मारने के लिए रणनीतिगत अनुष्ठान नहीं करेगा। न्याय का मतलब जिम्मेदारी के साथ पारिस्थितिकीय तंत्र का व्यवस्थापन करना, न्याय का मतलब है केवल इंसानी जरूरतों की पूर्ति के लिए काम न करना; बल्कि यह भी सुनिश्चित करना कि प्रकृति का संतुलन बना रहे। यदि कोई विकास एक सुखी जीवन और समानता के वातावरण को महत्व न दे, तो मान कर चलिए कि वह इमारत बेहद कमज़ोर नींव पर खड़ी है।
यह भी उल्लेख किया जाता है कि नर्मदा के बांधों से मध्यप्रदेश की 3.55 लाख हेक्टेयर जमीन को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो रही है। इसमे यह भी जोड़ा जाना चाहिए कि बाँध के जलभराव और नहरों के कारण इस पूरी घाटी की 1.4 लाख हेक्टेयर जमीन या तो जल मग्न हो गयी है या फिर उसका दलदली-करण हो गया है। 1960 के दशक में मकसद यह था कि इन बांधों से मध्यप्रदेश की बिजली की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा। अब दो बातें उभर कर सामने आ रही हैं कि नर्मदा घाटी परियोजनाओं के अंतर्गत वर्ष 2003 से 2012 के बीच बिजली का उत्पादन 90 मेगावाट से बढ़ कर 2371 मेगावाट हो गया है; इन परियोजनाओं पर हमारी सरकार नागरिकों से करों की वसूली करके 14458 करोड़ रूपए का खर्च कर चुकी है पर बिजली का संग्रहण, बिजली का वितरण और बिजली वसूली का काम पूरी तरह से निजी क्षेत्र की कंपनियों को थाली में गुलाबजामुन की तरह से परोस दिया गया। कहने को तो इन कम्पनिओं में सरकार के अंशधारिता है; परन्तु सच यह है कि विद्युत नियामक आयोग, निजी कंपनियों और सरकार के बीच एक माफिया गठजोड़ बन चुका है। इनका पहला मकसद है बिजली के दामों में लगातार बढौतरी करना।
यूँ तो बिजली की एक यूनिट की दर 5 रूपए निर्धारित है; पर विभिन्न शुल्कों के के नाम पर इस दर को लगभग 7.80 रूपए तक पंहुचा दिया गया है। विद्युत नियामक आयोग, जो उन पूर्व नौकरशाहों के नेतृत्व में काम कर रहा है, जिन्होने बिजली उत्पादन से लेकर उसके पूरे व्यापार के निजीकरण की अनुमति दी थी, पूरी तरह से निजी कंपनियों के हितों को ध्यान में रखते हुए विद्युत दरों को लगातार बढाने की अनुमति देता रहा है। आश्चर्य न हो तो क्या हो; इस मसले पर मध्यप्रदेश की विधान सभा भी किसानों और उपभोक्ताओं के हित में कोई दखल देने के लिए स्वतंत्र नहीं है। मैं बिजली की कमी का रोना नहीं रोना चाहता; मैं सिर्फ इतना कह रहा हूँ कि साढ़े तीन लाख एकड़  जमीन को डुबो कर; 8 लाख लोगों, जिनमे 3.52 लाख बच्चे थे, सवा लाख हेक्टेयर का जंगल डुबो कर हम किस्ये हित और विकास की बात कर रहे हैं? इनमें से, किनकी जिन्दगी रोशन हुई; यह सवाल किसी और से नहीं; खुद अपने आप से पूछिए।
जन संसाधनों की लूट की एक और बानगी देखिये। जिस जिले में गोघल गाँव के 51 लोग पानी में खडे होकर लोग जल सत्याग्रह कर रहे थे; उसी जिले में यानी खंडवा जिला मुख्यालय में शहरी पानी के निजीकरण का काम तेज़ गति से चल रहा है। वहां शहर के लोगों को 60 किलोमीटर दूर नर्मदा नदी से पानी लाकर पिलाए जाने की योजना बनायी गयी। षड़यंत्र को जरा यूँ समझिये। 106.72 करोड़ रूपए की इस योजना में 80 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार से, 10 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार से और शेष 10 प्रतिशत खंडवा नगर निगम के योगदान से इकठ्ठा होना था। केंद्र और राज्य तैयार हो गए; खंडवा नगर निगम ने 10 प्रतिशत यानी लगभग 10.6 करोड़ रूपए का योगदान दे पाने में असमर्थता दर्ज करा दी। इतनी राशि का और योगदान दे देना राज्य सरकार के लिए बहुत आसान था; पर इसके बजाये उसने कहा कि यह हिस्सा हम निजी कंपनी से सार्वजनिक-निजी साझेदारी के तहत निवेश करवा लेंगे। ये क्या साझेदारी है; 90 प्रतिशत सरकार का हिस्सा और 10 प्रतिशत कंपनी का; पर कितना पानी दिया जाएगा और पानी न मिलने पर कोई अदालत में जाने के लिए स्वतंत्र नहीं होगा; यह सब शर्तें कंपनी ने तैयार की। सच तो यह है कि सरकार के प्रतिनिधि यानी किसी अफसर या किसी मंत्री की अन्तर्निहित भूमिका के बिना इस तरह के निर्णय हो नहीं सकते; खंडवा में भी यही हुआ। इस शहर के 22 हज़ार परिवार लिख कर दे चुके हैं हमें यह व्यवस्था नहीं चाहिए; पर राज्य सरकार निजी हितों के सामने 'नागरिकों' के मत को दफ़न करने को पूरी तैयार रही।
जब पानी में बैठ- बैठे उनकी चमड़ी और अंग गलने लगे तो मानवीयता और नैतिकता का सवाल उठाया जाने लगा। कहा गया कि सरकार पर दबाव बनाने  का यह तरीका आपराधिक है। एक पत्रकार ने लिखा जब हमने लोकतांत्रिक व्यवस्था को अंगीकार किया है तो विरोध के नाम पर लोगों को आत्महत्या के लिए उकसाना गलत है। ये गंभीर अपराध है। विरोध होते रहना चाहिए लेकिन आत्म उत्पीड़न का ये तरीका गलत है इसे जब जब दुहराया जाए सरकार को इस पर अंकुश लगाना चाहिए। यहाँ सवाल यह उठता है कि जब लोगों ने इस तरह प्रदर्शन का निर्णय लिया होगा तब उनकी मनः स्थिति क्या रहो होगी, क्या यह हम कल्पना कर सकते हैं? शायद कुछ लोगों के लिए अब हर लड़ाई आखिरी लड़ाई बन गयी है, नहीं तो कौन आत्महत्या करना चाहेगा; सब कुछ खो जाता है तब लोग फिर से बनाने की चाहत रखते हैं; पर जब यह लगने लगे कि उन्हे फिर से जिन्दगी खड़ी नहीं करने दी जायेगी; तब विचार यही होता है कि अब बस आखिरी लड़ाई है। इस पूरी लड़ाई में शहर का समाज परियोजना प्रभावितों को अपना दुश्मन मानता है। वह उन परिवारों की पीड़ा को महसूस करने को तैयार ही नहीं है। जब विस्थापितों की बात उनकी गाँव में नहीं सुनी जाती है तभी वे जिला मुख्यालय आते हैं और शायद आखिर में राजधानी में। और जब ये आते हैं तो बजाये इनके साथ खडे होने के, इनके गरियाया जाता है; क्यूंकि शहर के सड़क कुछ घंटों के लिए रुक सी जाती है। हम लोग शापिंग के लिए नहीं जा पाते हैं। वे भूल जाते हैं कि लकड़ी की आग की तरह ही अन्याय की आग भी एक स्तर से बाद यह भेद नहीं करती है कि उसे किसी को जलना है और किसी को नहीं। वह सबको जलाती है। गाँव की यह आग शहर तक भी पंहुचेगी एक दिन।   हम उस स्थिति को क्या कहेंगे जब राज्य के कुछ हिस्से समाज को अपना प्रतिद्वंदी मानने लगे और समाज का हक़ उसे अपना विरोध लगने लगे। नर्मदा के मामले में पूरा राज्य (यानी स्टेट) तो लोगों के खिलाफ नहीं हुआ पर राज्य के कुछ हिस्से; मंत्री, जनप्रतिनिधि और अफसरान जरूर लोगों के हकों को राज्य के अहम् का विषय बनाते नज़र आये। जब भी राज्य की नीति पर सवाल उठते हैं; तब यह होना स्वाभाविक है कि जिनके हित प्रभावित होंगे वे सत्याग्रह को भी टकराव और अहम् का विषय बनायेंगे ही।  ऐसे में सहूलियत में जीने वाला व्यापक समाज का एक हिस्सा सत्याग्रह और सत्याग्रहियों के खिलाफ होते जाता है।
उपनिवेशवादी व्यवस्था, यानी जब हम पर कोई बाहर की ताकत शासन करती है, तब सरकार कहती है कि हम व्यापक हितों और व्यवस्थापन के लिए नीतियां बनाते हैं। हमारी सरकार भी आज यही कहती है हम छोटे समूह या कुछ लोगों के हितों को पूरा करने के चक्कर में नहीं पड़ेंगे। हमें तो व्यापक हित और राज्य के विकास को महत्व देना है। अब सवाल यह खड़ा होता है कि क्या किसी विकास से यदि किसी भी समूह, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, का अहित होता हो या उसका जीवन असहज और सुरक्षित होता ही, तो क्या वह विकास व्यापक समाज का हित कर पायेगा? यदि बीज जहरीला या कमज़ोर होगा तो वृक्ष मीठे और जनहित के फल कैसे पैदा कर सकता है! इसका मतलब यह भी है कि हम विकास के नाम पर आज भी उपनिवेशवादी मानसिकता को शासन व्यवस्था के केंद्र में रखे हुए हैं।
 सचिन कुमार जैन