Wednesday, 19 September 2012

मुआवज़े में संसाधन के बदले नकद - जबरदस्ती का व्यापार





सचिन कुमार जैन
सरकार और निजी कारपोरेट साम्राज्य जमीन पर कब्ज़ा चाहता है। विकास की नीतियों को सामने रख कर लोगों को जमीन से बेदखल किया जाता है। लोगों को नकद के रूप में मुआवजा देने की योजना बनायी जाती है। एक हाथ से नकद राशि दी जाती है और दूसरे हाथ से उन्हे जीवन की जरूरी जरूरतों को जुटाने और कुछ उपभोक्तवादी व्यवहार में फंसा कर मुआवजे की पूरी नकद राशि सुनियोजित ढंग से छीन ली जाती है।  सरकार नकद मुआवजे की राशि बढाने तैयार है पर वह कभी भी संसाधनों यानी जंगल और जमीन और पानी पर हक़ देने को तैयार नहीं है। मध्यप्रदेश में तवा नदी पर तवा बाँध बना। बाँध प्रभावित लोग तवा जलाशय में मछली पालन और उसके व्यापार का हक़ चाहते थे। उन्हे बहलाने के लिए कुछ वर्ष मछलीपालन की अनुमति दी गयी; फिर उनसे यह हक़ छीन लिया गया। इसी तरह आष्टा में पार्वती नदी से प्रभावित लोगों को मजदूरी के रूप में ठेकेदारों की गुलामी में काम करने का अवसर दिया गया। संसाधन तो केवल छीने ही गए हैं।
प्रतिबद्धताएं बहुत स्पष्ट हैं; बाँध और विकास परियोजनाओं की बेदी पर बलि चढ़ाये जाने वाले लोगों, जिनमे 65 प्रतिशत आदिवासी और दलित हैं; के लिए सरकार के पास जमीन नहीं है। वर्ष 2007 से 2012 के बीच निवेश के नाम पर साढ़े चार लाख हेक्टेयर जमीन की व्यवस्था कर दी चुकी है। एक आवेदन पर हज़ारों एकड़ जमीन उद्योगों और जमीन के कारोबारियों को देने के व्यवस्था बना दी गयी।  8 सितम्बर 2012 को, जब लोग अपने लिए जमीन की मांग कर रहे थे थी उसी दिन भोपाल में कलेक्टर्स-कमिश्नर्स की कांफ्रेंस में मुख्यमंत्री जी ने अफसरों को निर्देश दिया है कि 15 सितम्बर 2012 तक 26000 हेक्टेयर जमीन 26 जिलों में निकालें और उद्योगों  विभाग को हस्तांतरित कर दें ताकि कंपनियों को जमीन दी जा सके। एक भी उदहारण सरकार का वंचितों और गरीबों के पक्ष में बता दें जब सरकार ने कहा हो कि इस तारीख तक वन अधिकार क़ानून के तहत वनों पर हक़ दे दें, राशन कार्ड इस तारीख तक बना दें, या दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित कर दें; नहीं, ऐसा कभी नहीं हुआ; जहाँ लूट है, वहां सरकार भी समयबद्ध और प्रतिबद्ध हो जाती है;
जमीन आज भारत के भीतर पनप रहे नए उपनिवेशों के लिए ताकतवर होने का नया हथियार है। देश 8000 लोग भारत के सकल घरेलु उत्पाद के 70 फ़ीसदी हिस्से पर कब्ज़ा रखते हैं। इस कब्ज़े में सबसे बड़ा हिस्सा जमीनों, पहाड़ों और नदियों पर कब्जे का है। इनकी सत्ता की ताकत इतनी ज्यादा है कि चुनी हुई सरकार भी इनकी अनुमति के बिना कोई नीति नहीं बना सकती है। पूँजी की यही व्यवस्था तय करती है प्राकृतिक संसाधनों पर लोगों का या कहें कि समुदाय का कोई हक़ नहीं होगा। खनिज संसाधनों के दोहन, जिसमे हमने देखा कि उडीसा, झारखंड, छतीसगढ़ में 24 लाख हेक्टेयर जमीन पर 20 कंपनियों ने नज़र डाली। उस पर उन्हे कब्ज़ा चाहिए था तो सरकार ने 6 लाख आदिवासियों को जमीन से बेदखल करना शुरू कर दिया। उन्हे आतंकित किया गया, गोलियां चली, बलात्कार किये गए, यानी हर वह काम किया गया जिससे लोगों में सत्ता और पूँजी का आतंक बैठाया जा सके और वह संसाधनों की लूट की नीतियों का विरोध करने का विचार भी न कर सकें। मध्यप्रदेश का सिंगरौली जिला देश की उर्जा राजधानी बना और साथ ही देश का सबसे प्रदूषित शहर भी, पर 2011 की जनगणना के मुताबिक़ इसी जिले के 90 प्रतिशत लोग मिट्टी के तेल यानी केरोसीन के अपने घरों को रोशन करते हैं।  जिस इलाके से विकास की धारा बहाई जाती है वह इलाका आम लोगों के नज़रिए से मौत के भय और सत्ता के प्रति अविश्वास के क्यों भर जाता है?
सरकार ने पहली पंचवर्षीय योजना से ही अधोसंरचनात्मक विकास की नीतियां बनाना शुरू की। 1951 में बनी पहली पंचवर्षीय योजना से ही यह तय हो गया कि देश के गाँवों और प्राकृतिक संसाधनों के शोषण से ही हमारे विकास का ढांचा खडे होने वाला है। यह तय था कि इसके लिए लोगों का विस्थापन होगा। विस्थापन हुआ भी। भाखड़ा नंगल और हीराकुंड बांधों से बड़ी परियोजनाओं की पक्रिया शुरू हुई; पर एक भी दस्तावेज में यह उल्लेख नहीं किया गया कि जिनका विस्थापन होगा, उनका पुनर्वास भी राज्य की जिम्मेदारी होगी। पंडित नेहरु ने इन्हे आधुनिक विकास का मंदिर कहा उन्होने यह कभी नहीं कहा कि विस्थापितों को हमें पूजना और सम्मानित करना होगा; पर सच यह था कि इन मंदिरों के निर्माण की नीव डालने के लिए समाज और प्रकृति की जड़ें खोद डाली गयीं। नींव में पत्थर नहीं डले, आदिवासियों और ग्रामीणों के शरीर की हड्डियाँ डाली गयी, और उनके विश्वास को बारीक करके जमीन में दबाया गया। इस देश में 7177 बड़ी विकास परियोजनाएं चल रही हैं; परन्तु कभी भी यह जानकारी संकलित नहीं की गयी कि कहाँ, कौन विस्थापित हो रहा है, लोग कहाँ जा रहे हैं, विस्थापन के बाद उनकी जिन्दगी का क्या हुआ? लोग जिंदा भी हैं या नहीं! 
उत्तरपूर्व के राज्यों में 100 बाँध बन रहे हैं, उत्तराखंड में गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों को बांधों से बाँध दिया गया है। अब वह एक ठंडा इलाका नहीं रह गया है। वहां पहाड़ों पर आग जल रही है और पहाड़ तप रहे हैं। मध्यप्रदेश में बुंदेलखंड और बघेलखंड इलाकों में 15 सालों से बार-बार सूखा पड़ रहा है, वहां विकास के लिए बनी नीति में थर्मल उर्जा के 30 सयंत्र लगाए जा रहे हैं, कोड़ा कुलम में हज़ारों लोग कह रहे हैं परमाणु संयंत्र मानव सभ्यता को नष्ट कर सकते हैं, इसलिए परमाणु संयंत्र मत लगाओ; जो भी यह कह रहा है कि बिजली पैदा करने के लिए हम दुनिया में स्थायी अँधेरा लाने की और बढ़ रहे हैं इसे रोका जाए; उसे सरकार और पूँजी के समर्थक राष्ट्रद्रोही करार दे रहे हैं। ऊर्जा के नाम पर जिस तरह का पागलपन दर्शाया जा रहा है वह विकास की सोच में आ चुकी विकृति को दर्शाता है। किसके लिये इस बिजली का उत्पादन होगा? देश में 60 प्रतिशत बिजली 600  उद्योगों, माल और एअरपोर्ट द्वारा उपयोग की जाती है पर इसके लिये पिछले 50 वर्षों में 6 करोड लोगों को विस्थापित किया जा चुका है और उनकी जमीन और जंगल डुबोए जा चुके हैं। उनसे अपेक्षा है कि वे सब कुछ डूब जाने के बाद भी चुप रहें।  जब नर्मदा घाटी में लोग, जिनका सब कुछ उजड़ा है, जमीन मांगते हैं तो मुख्यमंत्री, केबिनेट मंत्री से लेकर नौकरशाही और उसी पक्ष के पत्रकार बुद्धिजीवी यह कहने लगते हैं कि ये लोग विकास विरोधी हैं और उनकी मांगे जायज़ नहीं हैं। सच तो यही है कि हमारी पक्षधरता क्या है; हम किसके पक्ष में हैं; आखिर जायज़ और नाजायज़ का निर्धारण कौन करेगा?
यानी बात यह कि आज तक भारत में यह कोई समग्र आंकड़ा ही नहीं है कि किस परियोजना में कितने लोगों का विस्थापन हुआ और आज वे किस हाल में हैं; इसका मतलब है कि सरकार ने हमेशा यह चाहा है कि ये तो मर ही जाएँ तो अच्छा है; हम इनके लिए हैं  ही नहीं; यही कारण है कि जल सत्याग्रह के 13 दिनों तक सरकार लोगों पास नहीं गयी। फिर बात शुरू हुई और बड़ी ही कुटिलता के साथ उन्होने ओंकारेश्वर यानी एक बाँध के तहत जमीन देने की बात मान ली, पर दूसरे बाँध यानी इंदिरा सागर की बात को फिर से नकार दिया।
एक वक्त आता है जब अन्याय और शोषण के खिलाफ लड़ी जाने वाली लड़ाई लोगों की जिन्दगी की आखिरी लड़ाई बन जाती है। शायद कुछ लोगों के लिए अब हर लड़ाई आखिरी लड़ाई बन गयी है, नहीं तो कौन आत्महत्या करना चाहेगा; सब कुछ खो जाता है तब लोग बनाने की चाहत रखते हैं; पर जब यह लगने लगे कि उन्हे फिर से जिन्दगी खड़ी नहीं करने दी जायेगी; तब विचार यही होता है कि अब बस आखिरी लड़ाई है; भूखे और उजडे हुए लोगों को संविधान की किताब मत दिखाईएगा; ये किताब उन मंत्रियों और मुख्यमंत्री को दिखाइए जो इसके पन्नों को बार बार फाडते हैं।


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