Wednesday, 19 September 2012

नर्मदा जल सत्याग्रह - केवल जमीन का नहीं न्याय का आग्रह




गोघल गाँव और खरदना गाँव में 200 लोग 17 दिनों तक नर्मदा नदी में ठुड्डी तक भरे पानी में खड़े रहे। वे कोई विश्व रिकार्ड नहीं बनाना चाहते थे। उन्हे अखबार में भी अपना चित्र नहीं छपवाना था। उन्हे विकास के नाम पर जल समाधि दी जा रही थी, जिसके विरोध में उन्होने जल सत्याग्रह शुरू किया। वे कह रहे थे यदि देश के विकास के लिए बांध बना है तो उनके जीवन के अधिकार को क्यों ख़त्म किया जा रहा है? वे संसाधनों पर अधिकार चाहते थे क्यूंकि जमीन, पानी और प्राकृतिक संसाधन की उनके जीवन के अधिकार का आधार हैं।   
मध्यप्रदेश में दो बडे बाँध - इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर बाँध है। इन बांधों से बिजली बनती है और कुछ सिंचाई भी होती है। इन बांधों के दायरे के बाहर की दुनिया को इन बांधों से बिजली मिलती है और उनके घर इससे रोशन होते हैं। रेलगाड़ियाँ भी चलती है। ये बिजली सबसे ज्यादा रोशन करती है नए भारत के शहरों को, उन उद्योगों को, जो रोज़गार खाते हैं, माल्स और हवाई अड्डों को। खरगोन, खंडवा, हरदा, देवास ये वे जिले हैं जहाँ लगभग 2 लाख परिवारों को उनकी जड़ों से उखाड़ा गया यानी सरकार ने उनकी दुनिया का अधिग्रहण कर लिया  है। यह एक अध्यादेश होता है जो बात तो करता है जमीन के एक टुकडे की परन्तु सच में वह एक ऐसा दस्तावेज होता है जो लोगों को बताता है कि देश और समाज (शहर और एक ख़ास वर्ग) की विलासिता के लिए तुम्हे बलिदान देना होगा।  
स्वतंत्रता के बाद से लगतार देश में लोगों को विस्थापित किया जाता रहा है; विस्थापन के शिकार आदिवासी, दलित और भूमिहीन सबसे ज्यादा रहे, क्यूंकि सम्पत्तिवान लोगों की संख्या हमेशा से कम रही और सरकार ने उन्हे उनके प्रभावों के चलते उन्हे हमेशा कुछ हद तक सुविधाएं दीं। इन बांधों या किसी और भी परियोजना में जिन पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा उनकी जिन्दगी प्राकृतिक संसाधनों जैसे - जमीन, पानी, जंगल और पारंपरिक उद्योगों पर निर्भर रही है। वे मुद्रा यानी नकद यानी कागज़ की सम्पदा में रमते ही नहीं हैं। ऐसे में उन्हे उनकी जमीनों के बदले मुआवजे के तौर पर नकद राशि देने की व्यवस्था बनायी गयी। यह सरकार के हिसाब से सबसे सस्ता, आसान और सहज विकल्प था; परन्तु लोगों के लिए बहुत कठिन और जीवन ख़त्म कर देने वाला विकल्प; एक उदाहरण देखिये।
1980 के दशक में जब रानी अवंती बाई परियोजना यानी बरगी बाँध बना, तब लोगों को 800 से 1500 रूपए प्रति एकड़ के मान से मुआवजा दिया गया। जैसे ही आस-पास के लोगों को पता चला तो सभी यह मानने लगे अब तो विस्थापित जमीन खरीदेंगे, ये उनकी मजबूरी है। और दो तीन दिनों के भीतर वहां जमीन के दाम बढे। एक हज़ार रूपए एकड़ की जमीन कुछ दिनों में 3500 रूपए की कीमत तक पंहुच गयी। लोगों को जो नकद राशि मिली थी उसके कोई मायने ही नहीं रह गए। सरदार सरोवर में मिले नकद मुआवजे से जमीन खरीदने के लिए जो व्यवस्था बनाई गयी उसमे पटवारी से लेकर राजस्व अधिकारी, वकीलों और भू-अर्जन अधिकारी के गिरोह को सक्रीय कर दिया। जिन्होने मिलकर आदिवासियों और विस्थापितों के चील-कौयों की तरह नोचा। सर्वोच्च न्यायालय में भी मामला गया और मध्यप्रदेश सरकार कहती रही हमारे पास परियोजना प्रभावितों को देने के लिए जमीन नहीं है; पर डुबोने के लिए जमीन थी। जमीन तो थी और है भी। यदि सरकार की मंशा होती तो परियोजना प्रभावितों का स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की तरह का सम्मान होता। उन्हे सामान्य इंसान से थोडा तो ज्यादा माना ही जाता। उन्हे अपने ही देश में गैर-कानूनी अप्रवासी और अतिक्रमणकारी और अधूरे नागरिक का दर्ज़ा नहीं दिया जाता।  जो अपनी पूरी सम्पदा देश के विकास के लिए दे रहा है, क्या उसके लिए बेदखली की प्रक्रिया चलाना कोई न्यायोचित कृत्य है। क्या है इनकी अपेक्षाएं - भूमिहीनों के लिए एक निर्धारित सम्मानजनक नकद राशि और जमीन के बदले जमीन; बस यही न।
जब समुदाय ने यह बताने की कोशिश की तो उसे विकास विरोधी और राष्ट्रद्रोह के मुकदमों में फंसाया गया। और फिर राज्य सरकार के प्रतिनिधि मंत्री ने सन्देश दिया कि ये मुट्ठीभर जल सत्याग्रही हमें कमज़ोर न समझे। हमें सरकार चलाना आता है और हम दबेंगे नहीं। हम अपना काम करेंगे। और ठीक 20 घंटे के बाद पुलिस बल ने ताकत का प्रयोग करने सत्य के आग्रह को ठुकरा दिया।
जो लोग गोघलगाँव और खरदना में 15 से 17 दिन पानी में इसलिए खड़े रहे ताकि उनकी बात सुनी जाए। जो इंसानी तरीकों से तो व्यवस्था सुन ही नहीं रही थी। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और पुनर्वास की नीति है कि जब तक पुनर्वास पूरा नहीं होगा तब तक बांधों में जलभराव के स्तर को इंदिरा सागर में 260 मीटर और ओंकारेश्वर में 189 मीटर तक रखा जाएगा परन्तु इन बांधों में दो मीटर से ज्यादा जलभराव का स्तर बढ़ा दिया गया, जिनसे 100 ऐसे गांव प्रभावित हुए जिनका सर्वे तक नहीं हुआ था।  खेत, जंगल और घर डूब में आये। यह सरकार और योजनाकारों की रणनीति होती है। पुनर्वास की प्रक्रिया को वे विलम्ब करते जाते हैं और दूसरी तरफ जल स्तर बढाते जाते हैं ताकी जमीनें डूबती जाएँ। जब घर और जमीन ही डूब जाते हैं तो फिर सर्वे नहीं हो पाता है। तब जमीनी स्तर पर भूअर्जन अधिकार, पटवारी, पंजीयक और स्थानीय प्रशासन का गठजोड़ ग्रामीणों की जिन्दगी में से संभावनाओं की आख़िरी बूँद तक निचोड़ लेता है। जिनका सब कुछ डूब रहा होता है वे कर्जे लेकर इन अधिकारियों को रिश्वत देते हैं। औरतें अपने घर के बर्तन और गहने बेंचने को मजबूर हुई। सिर्फ इस उम्मीद पर कि यदि जमीन मिल गयी तो जिन्दगी चल जायेगी।  सरदार सरोवर परियोजना में नकद मुआवजे और जमीन की खरीदी में अब तक 600 करोड़ रूपए का घोटाला और भ्रष्टाचार सामने आ चुका है।
लोग अपना शरीर गलाते हैं. हो सकता है ये उनका बाल हठ हो; पर क्या हमारे मुख्यमंत्री घटना जानने के बाद उनके पास जा नहीं सकते थे; उनके पास बात कर पूछ नहीं सकते थे - बताओ अम्मा क्या बात है; हम आज ही समस्या हल करेंगे; क्या वे मध्यस्थों को अपने से कुछ सौ मीटर दूर नहीं धकेल सकते थे; वे कहते हैं कि सरकार को विस्थापितों से सीधे बात नहीं करने दिया गया; बिलकुल सही बात है, आपने सत्ता और माफिया के उस गठजोड़ को जानते हुए भी तोडा क्यों नहीं और क्यों इसे झूठे अहम् का मुद्दा बनाया; आप के संज्ञान में यह बात क्यों नहीं लायी गयी कि लोग और आन्दोलन कुल मिलाकर 487 ज्ञापन मुख्यमंत्री कार्यालय के दे चुके हैं; 8 बार भोपाल में उनसे या उनके प्रतिनिधियों से मिले हैं; 170 दिन का अनशन कर चुके हैं; जिला स्तर और जल विधुत परियोजना कंपनी को दिए गए आवेदनों की गिनती अभी भी जारी है; इतनी सब के बाद आप यह कहते हैं बाँध भरेगा, किसी कोई कुछ और नहीं मिलेगा और दूसरे मंत्री कहते हैं हम दबेंगे नहीं; मान्यवर, दबना या दबाना तो मंशा ही नहीं रही है. मंशा तो संविधान को गले लगाने की है; जो सरकार लगाने नहीं दे रही है. 
भारत में चल रही बड़ी विकास परियोजनाओं का दो कारणों से जन-विरोध है। एक - चूँकि ज्यादातर परियोजनाएं गाँव, जंगल और नदियों-समुन्दर के आस-पास हैं और उन पर लोगों की आजीविका ही नहीं बल्कि उनकी सांस्कतिक और सामाजिक पहचान भी निर्भर करती है; इसलिए उन परियोजनाओं से प्रभावित होने वाले लोग संसाधनों की सुरक्षा चाहते हैं। वे एक एकड़ जमीन के बदले 10 लाख रूपए नहीं, बस उतनी ही जमीन चाहते हैं। वे एक सम्मानजनक पुनर्वास चाहते हैं। दो - लोग यानी समाज जानता है कि यदि जंगल ख़त्म हो गए, नदियाँ सूख गयी और हवा जहरीली हो गयी तो मानव सभ्यता ख़त्म हो जायेगी। यह बात सरकार और पूँजी समर्थक नव-उपनिवेशवादी नीति निर्माता समझने को तैयार नहीं हैं। लोग पर्यावरण और जैव-संस्कृति की के मत पर निजी विकास नहीं चाहते हैं। जब सत्ता इस मंतव्य को समझती नहीं है; तब टकराव होना स्वाभाविक है। समाज मूल्यों आधारित बात करता है और राज्य अपनी ताकत का इस्तेमाल करता है। विडम्बना देखिये कि सरकार जनहित में विकास की योजना को लागू करने के लिए जनता के ही खिलाफ हिंसा, दमन और शोषण का रास्ता अख्तियार करती है।   

सचिन कुमार जैन

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