Friday, 31 May 2013

यह किसका असर है? हिंसा का या अहिंसा का?



भारत सरकार को एक बात समझ आई कि गरीबी की रेखा और गरीबी की रेखा एक धोखा और झूठ है. माओवाद से प्रभावित जिलों में ४० लाख परिवार गरीबी की रेखा में घोषित किये जा रहे हैं. देखिये इसे - 

१. देश के २२ जिले (ग्रामीण) बी पी एल घोषित किये जा रहे हैं;
२. माओवाद प्रभावित ३४ अन्य जिलों में सभी दलित-आदिवासी, महिला नेतृत्व वाले और वृद्धजनों वाले परिवार गरीबी की रेखा में होंगे;
३. २६ अन्य जिलों के १०६ विकास खण्डों के सभी दलित-आदिवासी, महिला नेतृत्व वाले और वृद्धजनों वाले परिवार गरीबी की रेखा में होंगे;

१६ साल हो गए हमें यह चिल्लाते-चिल्लाते की गरीबी की रेखा एक षड़यंत्र है, देश के संगठनों और संस्थाओं ने रोज़ी-रोटी अधिकार अभियान के तहत सर्वोच्च न्यायालय और अन्य न्यायालयों में हज़ारों शपथ पत्र दिए, दिल्ली और अन्य जगहों पर लोकतांत्रिक ढंग से अहिंसक धरने दिए; १००० से ज्यादा अध्ययन हुए और शोध पत्र लिखे गए; हमारी सरकार ने न मानी; माओवादियों की मान ली; क्या अब भी आप यह नहीं मानते के हमारी सरकार सीधे सीधे नहीं मानती; वह सम्मान की भाषा नहीं समझती और वह चाहती है कि लोग बागी हो जाए;

Thursday, 30 May 2013

जले हुए शहर में



मल जो निकल रहा है दिमागों से 
वह समुद्र को भी सड़ा रहा है,
गन्दगी जो पल रही है मनों में 
वह हमें बना रही है जहर का ढेर,
नया समाज उठावने को 
उत्सव की तरह मनाता है,
उठता है हर सुबह और 
नहा कर निकल जाता है 
बीते दिन जले हुए शहर में 
बिखरी रिश्तों की अस्थियां समेटने;

बस यूँ ही नहीं



राम ने शोषण के खिलाफ जंग की थी; यदि वे योजना आयोग या संसद गए होते न्याय मांगने तो सीता जी का क्या होता?
कृष्ण ने भी शोषण की ही खिलाफत की थी; कंस के खिलाफ और फिर कौरवों के खिलाफ उन्होंने नीति-रणनीति और कूटनीति का उपयोग किया; यदि उन्हे आज यह लड़ाई लड़ना होती तो उनका क्या होता?

जिन्हे हम पूजते हैं, जब वे ही अहिंसा के मार्ग पर पूरी तरह से नहीं चल पाए और उन्हे हथियार उठाने या उठवाने पड़े; तो आज ऐसा क्या बदल गया है कि हमने अपने सिद्धांत बदल लिए: क्या रामराज्य ज्यादा अन्यायपूर्ण और अलोकतांत्रिक था, जो हथियार को मर्यादा के दायरे में मान लिया गया? क्या तब असुरों का राज्य आज के राज्य से ज्यादा जनविरोधी और आतंकी था? क्या अब ज्यादा लोकतंत्र है? हम अपनी सहूलियत के हिसाब से सही और गलत का निर्धारण करते हैं; हम ईमानदारी से अपना पक्ष तय नहीं करते; न्याय की लड़ाई को यदि आपने युद्ध के मैदान तक पंहुचा ही दिया है तो अब उसके परिणाम स्वीकार करने की ईमानदारी तो आपको दिखानी ही होगी;