मल जो निकल रहा है दिमागों से
वह समुद्र को भी सड़ा रहा है,
गन्दगी जो पल रही है मनों में
वह हमें बना रही है जहर का ढेर,
नया समाज उठावने को
उत्सव की तरह मनाता है,
उठता है हर सुबह और
नहा कर निकल जाता है
बीते दिन जले हुए शहर में
बिखरी रिश्तों की अस्थियां समेटने;
No comments:
Post a Comment