राम ने शोषण के खिलाफ जंग की थी; यदि वे योजना आयोग या संसद गए होते न्याय मांगने तो सीता जी का क्या होता?
कृष्ण ने भी शोषण की ही खिलाफत की थी; कंस के खिलाफ और फिर कौरवों के खिलाफ उन्होंने नीति-रणनीति और कूटनीति का उपयोग किया; यदि उन्हे आज यह लड़ाई लड़ना होती तो उनका क्या होता?
जिन्हे हम पूजते हैं, जब वे ही अहिंसा के मार्ग पर पूरी तरह से नहीं चल पाए और उन्हे हथियार उठाने या उठवाने पड़े; तो आज ऐसा क्या बदल गया है कि हमने अपने सिद्धांत बदल लिए: क्या रामराज्य ज्यादा अन्यायपूर्ण और अलोकतांत्रिक था, जो हथियार को मर्यादा के दायरे में मान लिया गया? क्या तब असुरों का राज्य आज के राज्य से ज्यादा जनविरोधी और आतंकी था? क्या अब ज्यादा लोकतंत्र है? हम अपनी सहूलियत के हिसाब से सही और गलत का निर्धारण करते हैं; हम ईमानदारी से अपना पक्ष तय नहीं करते; न्याय की लड़ाई को यदि आपने युद्ध के मैदान तक पंहुचा ही दिया है तो अब उसके परिणाम स्वीकार करने की ईमानदारी तो आपको दिखानी ही होगी;
No comments:
Post a Comment