उन्नीस सौ सेंतालीस के साल में
आई थी तवारीख एक भारत के लिए
जो बाहर से आया था, झुका दिया उसे
वापस ले लिया अपना तख़्त औ ताज
अभी भी लड़ रहे हैं कई भारत इस भारत के भीतर
अभी आना बाकी है ऐसी कई तारीखें
भारत के भीतर की गुलामी के खिलाफ؛
पूरा नहीं जन्मा था भारत उस आधी रात
चार में से तीन को न मिलता अब भी रोटी भात
टूटी सूरज की किरणों की जंजीरें आधी
हवा का रुख भी खुला खुला न था
बिकने लगी इंसानियत की लाज
जाति ऊँची, जाति नीची;
अँगरेज़ बन बैठी मर्दों की जात
बुझा न सकी अन्दर की गुलामी की आग को तारीख
जो आई थी उन्नीस सौ सेंतालीस की एक रात
गुमशुदा सा बना रहा इंसानियत की स्वतंत्रता का साज़
आधे हिन्दुस्तान से छीने रहे कलम और दवात
ईमादारी से अब तो कह दो सच्चाई यही है
हिन्दुस्तान कभी नहीं हुआ था पूरा आज़ाद;
सचिन कुमार जैन
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