सचिन कुमार जैन
वास्तव में स्वास्थ्य और पोषण
के अधिकार के जीवंत और व्यावहारिक मायने क्या हैं? यह एक
कडवी सच्चाई है कि जब सिद्धांत बनते
हैं तब वो लोग परिदृश्य से बाहर होते हैं. नीति बनाने वाले यह नहीं जानते हैं कि
स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों को पंहुचना चाहिए या लोगों को इन सेवाओं तक आना चाहिए!
हम अब भी विशेषज्ञ सेवाओं की उम्मीद नहीं करते हैं, यहाँ तो
प्राथमिक सेवाएँ ही पूरी तरह से ध्वस्त हैं. हम स्वास्थ्य के अधिकार का निष्पक्ष
होकर कोई विश्लेषण नहीं कर सकते हैं, हमें
कोई पक्ष तो लेना ही होगा; और वह
पक्ष होना चाहिए समाज से वंचित तबकों का, महिलाओं
का, बच्चों का, विकलांगों
का, दलित और आदिवासी समुदायों का; भारत के राज्य मध्यप्रदेश में एक जिला है - शिवपुरी; यह पिछड़ी हुई आदिम जनजाति सहरिया समुदाय का जिला है. यह
के 2 गाँव के कहानी यह स्पष्ट कर देती है कि एक जनकल्याणकारी
राज्य में स्वास्थ्य और पोषण के अधिकार को किस हद तक नज़रअंदाज़ किया जा सकता है.
ककरा वह गाँव है और ककरा
में 6 साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या 45 है. पोहरी विकासखंड से 8 किलोमीटर
दूर बिलकुल सड़क पर स्थित ककरा गाँव और यह देखा कि गाँव के ज्यादातर बच्चे बैर के
गुठली जैसा फल तोड़ रहे हैं, उसमे से एक छोटा बीज निकाल कर खा रहे हैं. आदिवासी समुदाय
प्रकृति द्वारा प्रदत्त कई लघु वन उपजों का खाने में उपयोग करता है. कई वस्तुओं
में पोषण भी खूब उसके बच्चों को राज्य के संरक्षण की जरूरत है. मुझे स्थिति गंभीर
तब लगी जब मैने होता है. मैं भी खाने बैठ गया. फिर मैने पुछा कि यह मिलता कहाँ से
है? तब
उन्होंने पास ही पडे गोबर के ढेर की तरफ इशारा किया. और बताया कि जानवर जंगल से एक
फल खाकर आते हैं. इसका छिलका और गूदा खा लेते हैं. फिर यह बीज उनके गोबर के साथ
बाहर आ जाता है. मैं तो अवाक था; शायद आप भी हों. इसका नाम उन्होने बताया - गोंठा या
गोंठी.
हम इस गाँव के कुछ घरों के
भीतर गए, बैठे और
बात की. हर घर में 10-20 किलो गेहूं था. गेहूं के अलावा कुछ नहीं. बिलकुल कुछ भी
नहीं. यह घेहूँ भी इसलिए था क्यूंकि सार्वजनिक वितरण
प्रणाली उन्हे यही देती है. एक भी घर ऐसा नहीं था जिसमे पिछले 20 दिनों में दाल पकी हो. छोटे बच्चे अपनी माँ या दादी के
गोद में बैठे सूखी रोटी खा रहे थे. सिर्फ सूखी रोटी.यहाँ पोषण जैसी कोई अवधारणा
नहीं दिखी. पीने का पानी
लेने के लिए सड़क पार करके लगभग 600 मीटर
दूर नीचे उतर कर 2 हेंडपम्प खोदे गए हैं. यही पानी का स्रोत हैं. गाँव में
एक टंकी भी नहीं है.
हम हर गाँव और हर बसाहट में
आंगनवाडी देखना चाहते हैं. ककरा में 43 बच्चे हैं जिनकी उम्र 6 साल से कम है. यहाँ एक मिनी आंगनवाडी खोली गयी है.
इसमें केवल पेकेट बंद पोषण आहार आता है. दो साल पहले आंगनवाडी कार्यकर्ता की नियुक्ति हुई है; पर अब तक उनका प्रशिक्षण नहीं हुआ. उनका मानदेय 700 रूपए है; किस हिसाब से, पता नहीं. सरकार ने आंगनवाडी कार्यकर्ताओं के मानदेय में
भी कई वर्ग बना दिए हैं, भेदभाव
है. इस आंगनवाडी कार्कर्ता को पिछले 7 माह
से यह मानदेय भी नहीं मिला है. वहां वजन मशीन भी नहीं है. ज्यादातर बच्चे बीमार दिखे, शरीर पर सूजन, त्वचा रोग, और संक्रमण के शिकार हैं; पर 8
किलोमीटर दूर बना अस्पताल
एक औचारिता मात्र है; वहां
दवाएं नहीं मिलती हैं. एक भी महिला डाक्टर नहीं है. हर तरह की जांच के लिए उन्हें
अपने गाँव से 44 किलोमीटर दूर शिवपुरी जिला मुख्यालय जाना पड़ता है, जहाँ ऊँची कीमत पर जांचें होती हैं. जिन परिवारों का जीवन
15 रूपए प्रति व्यक्ति से कम के खर्च पर चलता हो,
उनके लिए स्वास्थ्य सेवाओं की
कल्पना करना मतलब कभी न पूरा होने वाला सपना देखना.
मासिक खर्चा देखें और तय करें! - भारत सरकार हमेशा नज़र रखती है कि देश की जनसँख्या किन
हालातों में रह रही है. फरवरी 2012
में भारत सरकार के राष्ट्रीय सांखिकीय संगठन (राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण
कार्यालय) ने भारत में विभिन्न वस्तुओं एवं सेवाओं के पारिवारिक उपभोग पर एक
रिपोर्ट [रिपोर्ट संख्या 541 (66/1.0/3)] जारी की. यह रिपोर्ट बताती है कि भारत के ग्रामीण इलाकों
में एक व्यक्ति अपने जीवन पर
1053.64 रूपए मासिक यानी
लगभग 35 रूपए प्रतिदिन व्यय करता है. इसमें से 600.36 रूपए यानी लगभग 57
प्रतिशत खर्च तो केवल खाने की जरूरत को पूरा करने में ही हो जाता है. जब हम शहरी
भारत की तरफ आते हैं तो हमें पता चलता है कि यहाँ लोग 1984.46 रूपए प्रति माह यानी लगभग 66.14 रूपए प्रतिदिन खर्च
करता है; इसमे से 880.83
रूपए यानी 44.38
प्रतिशत व्यय भोजन की जरूरत को पूरा करने में हो जाता है.
शिक्षा और सूचना मानव विकास
के कुछ चुनिन्दा आधारों में शामिल हैं. यह रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण भारत में
किताबों और पत्रिकाओं पर एक व्यक्ति पर 5.87
रूपए और शहरों में 14.50 रूपए
का ही व्यय हो रहा है. सरकार
कुछ भी प्राथमिकताएं तय करे, पर देश
ले लोग अपनी प्राथमिकताएं सही ही तय कर रहे हैं. चूँकि राज्य का ढांचा शिक्षा और स्वास्थ्य
तंत्र का गुणवत्तापूर्ण तरीके से लोकव्यापीकरण नहीं कर रहा है, इसलिए लोगों को भोजन के बाद सबसे ज्यादा व्यय इन्ही दो
मदों पर करना पड़ रहा
है. गाँव में शिक्षण और अन्य शुल्कों
पर 21.48 रूपए (कुल व्यय का 2.038
प्रतिशत) और शहरों में 106.81 रूपए प्रतिमाह (कुल व्यय का 5.38 प्रतिशत) व्यय निजी खाते से हो रहा है. पेट भरना अभी भी सबसे पहला और सबसे खर्चीला काम है तेज़ी
से बढते भारत में.
Sachin Kumar Jain, Health issues, Madhya Pradesh, India, Health Policy
No comments:
Post a Comment