भारत सरकार ने पिछले सात सालों में कुल मिलकर 29 लाख 14 हज़ार 4 सौ 13 करोड़ रूपए के करों और शुल्कों में माफ़ देकर अपने खजाने को एक ख़ास वर्ग के लाभ के लिए लुटाया है।
उनके पास राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के लिए 1 लाख करोड़ रूपए का सालाना बजट नहीं है, पर हर साल औसतम 4 लाख करोड़ रूपए की करों में छूट और रियायत बडे समूहों और उद्योगों के दी जाती रही।
क्या आप विश्वास करेंगे कि हीरे-जवाहरात वालों को 2 लाख 41 हज़ार और 1 करोड़ रूपए की छूट दी गयी है।
हमारी अर्थव्यवस्था को खतरे में डालने का काम सरकार-कारपोरेट और अनर्थशास्त्रियों के गठजोड़ ने मिल कर किया है।
अब उनके धतकरम खुल रहे हैं तो टाइम पत्रिका को भी मिर्ची लग रही है, अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी और मोंटेक सिंह जी जैसे लोग अपराधबोध से ग्रस्त होते जा रहे हैं क्यूंकि वे लूट के काम को और गति नहीं दे पा रहे हैं।
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ये हैं आंकडे, सरकार के ही हैं!
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