संगठित क्षेत्र की बेरोज़गारी - दो दशकों की पड़ताल
हमारी ऊँची वृद्धि दर क्या लोगों
को रोज़गार देती है? सवाल बहुत स्पष्ट और सीधा सा है। स्वाभाविक है जवाब भी सीधा सा ही होना चाहिए; पर हमें कभी भी इसका जवाब सीधा सा मिलता
नहीं है। जब 1991 में नयी आर्थिक नीतियां अपनाई
गयी थीं तब देश को यह बताया गया था कि उदारीकरण और बाज़ार के खुलेपन से बेरोज़गारी
का संकट दूर हो जाएगा। भारत सरकार द्वारा गठित नेशनल कमीशन फार एंटरप्राइसेस इन द अन-आर्गनाइज़ड सेक्टर (2004) के मुताबिक़ भारत में बेरोजगारों की संख्या 5.74 करोड़
थी। ध्यान रखियेगा, यह वह दौर था जब देश और दुनिया में
आर्थक मंदी नहीं थी, तब बेरोज़गारी के हालात यह थे । सही बात यह भी है आम व्यक्ति को अगर यह बताया जाए कि आप हमें निजीकरण
और उदारीकरण की नीतियों को लागू करने की स्वतंत्रता दे दो, क्यूंकि आप सबको एक बेहतर जिन्दगी, ऊँचा जीवन स्तर और उपभोक्तावादी
रसास्वादन करने के बहुविकल्पीय अवसर मिलेंगे। लोग सोचते रहे, यह नीति तो बढ़िया ही है। अब जब हम इस बात का विश्लेषण करते हैं
कि क्या हम पिछले 21 वर्षों में बेरोज़गारी के संकट से निजात पा गए हैं; तो हमें पता चलता है हमारे साथ कदम-कदम
पर धोखा हुआ है।
उदारवाद की नीति का लक्ष्य था राजकोषीय
घाटा कम करना। इसके लिए सरकार ने अपनी संपत्ति बेंची, सार्वजनिक उपक्रम बेंचे गए, सरकार ने सार्वजनिक परिवहन के लिए बसें
चलाना बंद कर दिया। सरकारी अस्पताल और शिक्षा केंद्र बंद करना शुरू कर दिए। एक तरफ तो सरकारी सेवाएँ बंद की गयीं
दूसरी तरफ सरकारी नौकरियों से लोगों को निकला गया। यह सब विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय
मुद्रा कोष के दबाव में व्यवस्था में ढांचागत बदलाव (स्ट्रक्चरल एडजेस्टमेंट्स) की
योजना के तहत किया गया। एक तरफ तो असंगठित क्षेत्र के कामगारों को असुरक्षा और शोषण के चक्र
में धकेला गया दूसरी तरफ सुरक्षित माने जाने वाली सरकारी नौकरियों के अवसर बहुत कम
किये गए, क्यूंकि सरकार को अपना खर्चा कम करना था।
भारत के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक़
वर्ष 1991 में सार्वजनिक क्षेत्र (केंद्र सरकार, राज्य सरकार, सरकारी उपक्रम आदि) में 1.9058 करोड़
लोग काम करते थे। 1995 में इनकी संख्या 1.9466 करोड़ थी। इसमे कमी की गयी और वर्ष 2010 में ये घट कर 1.7862 करोड़ पर आ गयी. 15 सालों में 16.04
लाख सरकारी नौकरियां ख़त्म कर दी गयीं। सार्वजनिक उपक्रमों के अंतर्गत विनिर्माण या मेनुफेक्चरिंग क्षेत्र में 8 लाख से ज्यादा रोज़गार के अवसर कम हुए। वर्ष 1991 में इसमे 18.52 लाख लोग काम
करते थे, वर्ष 2010 में यहाँ नौकरियों की संख्या घट कर 10.66 लाख पर आ गयी। इसी तरह परिवहन, भंडारण और संचार के क्षेत्रों में 30.26 लाख लोग काम करते थे, इनमे 5 लाख लोग बाहर निकाले गए और
संख्या 25.29 लाख रह गयी। उदारीकरण और खुले बाज़ार की नीतियों के दौर में संगठित क्षेत्र के
अंतर्गत निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र ने मिल वर्ष 1991 में कुल 2.6733 करोड़
अवसर पैदा किये थे, जिनकी संख्या वर्ष 2010 में 2.8708 करोड़ थी; यानी 20 वर्षों में 0.36 प्रतिशत की दर
से 20 सालों में 7.38 प्रतिशत संगठित रोजगारों के अवसर पैदा किये।
निजी क्षेत्र की अपनी विकास दर 17.8 प्रतिशत वार्षिक के मान से
हुई है पर रोज़गार के मामले में क्या हुआ? इस निजी क्षेत्र में रोज़गार की वृद्धि दर (1999-2004) 4.46 प्रतिशत ही रही। यह क्षेत्र देश के सकल घरेलु उत्पाद में 33 प्रतिशत का योगदान देने लगा है, पर रोज़गार के मामले में क्या हुआ? यह केवल 2.5 प्रतिशत रोज़गार पैदा करता है। मसला बहुत साफ़ है, देश का आर्थिक विकास वास्तव में देश का नहीं एक वर्ग का विकास है, जिसमे सरकार 77.5 प्रतिशत लोगों के अवसरों को झोंक रही
है।
लेबर ब्यूरो का 2011-12 का सर्वेक्षण बताता है कि हर 1000 में से 603 लोग (खुद की खेती में 396 और कृषि मजदूरी में 207) अब भी कृषि पर निर्भर हैं, यानी खेती रोज़गार देने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र है, पर सरकार द्वारा किये जाने वाले निवेश के मामले में अब यह पूरी तरह
से उपेक्षित है। योजना आयोग के हमारे मौजूदा उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया
ने 1993 में लन्दन कें एक सेमीनार में कहा था
खेती में बहुत बड़ी जनसँख्या के लगे होना हमारे लिए चुनौती है। हमें वहां से लोगों को निकाल कर दूसरे
क्षेत्रों में लाना है। इसीलिए कृषि क्षेत्र के कमज़ोर किया गया, सब्सिडी देना कम किया गया, निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा करने के लिए बिना हथियार किसानों को
बाज़ार के रण में धकेल दिया गया। वर्ष 1998 में भारत की 54.4 प्रतिशत जनसँख्या कृषि पर निर्भर थी, 2008 में यह घट कर 49.3 प्रतिशत पर आ गयी। प्रतिशत धोखा देते हैं, सच यह है कि कुल संख्या 54.4 करोड़ से बढ़ कर 58.2 करोड़ हो गयी। आज भी यह क्षेत्र भारत के रोज़गार
और खाद्य सुरक्षा का आत्मविश्वास देता है, पर सरकार का मकसद है इस सुरक्षा तंत्र के ढांचे को तोड़ देना ताकि
कार्पोरेट्स का आक्रमण सफल हो सके।
इन सबके बीच यह कहा जाता है कि वर्ष 2005 में अपनी जिम्मेदारियों का परिचय देते हुए भारत सरकार ने राष्ट्रीय
ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून बनाया था, पर सच यह भी है कि आर्थिक वृद्धि के दौर में जिस तरह से लोगों से रोज़गार छीने जा रहे थे
उनसे राजनीतिक-व्यवस्थागत संकट पैदा हो सकते थे, उन परिस्थितियों के प्रबंधन की रणनीति थी इस कानून का बनना। ठीक यही समय था जब नॅशनल सेम्पल सर्वे
आर्गनाइज़ेशन ने भारत में बेरोज़गारी के सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी की थी, प्रोफ. अर्जुन सेनगुप्ता के नेतृत्व वाले नेशनल कमीशन फार एंटरप्राइसेस इन द अन-आर्गनाइज़ड सेक्टर की रिपोर्ट ने भी हालातों का खुलासा कर दिया था। तब संकट का आर्थिक और व्यवस्थागत कम, राजनीतिक हल ज्यादा खोजा गया। योजना आयोग और उदारीकरण के पैरोकारों के नाटकीय विरोध के बीच 25 हज़ार करोड़ रूपए की कीमत का एक लोकप्रिय हो सकने वाला कदम उठाया गया। और अगले कुछ सालों के लिए संकट को फिर
कुछ सालों के लिए सुला दिया गया। यह कोई बात करने के लिए तैयार नहीं था कि देश में जो निवेश हो रहा
है, वह कागजी ज्यादा है. वास्तव में जमीन पर
उद्योग नहीं लग रहे हैं। लोग अपने काले धन को सफ़ेद करने और जमीन-जंगल पर कब्ज़ा करने के लिए
परियोजनाएं बना कर लूट मचा रहे हैं, इसीलिए तो लोगों के लिए रोजगार नहीं हैं।
रोज़गार पारिवारिक सामाजिक सुरक्षा का सबसे अहम् पहलु है। यदि यह सुरक्षित है, तो परिवार अपनी स्वतंत्र और आत्मनिर्भर अस्मिता को एक आकार दे पाता
है। बेरोज़गारी असुरक्षा तो पैदा करती
ही है बल्कि इससे अशांति भी पैदा होती है और असमानता भी। भारत के पास यह अवसर रहा है कि वह कृषि, लघु उद्योग, विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था को अपनी
नीतियों का आधार बनता पर ऐसा नहीं हुआ। पिछले 21 वर्षों के आंकडे (आंकड़ों की बात इसलिए
क्यूंकि हमारे अफसरान और अर्थशास्त्री, और नीति बनाने वाले सिर्फ संख्या समझते हैं) यह बताते हैं कि सरकार
ने अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने और समाज के संसाधनों को नियंत्रित करने के लिए
उदारीकरण की नीतियां अपनायीं. एक तरफ तो ये नीतियां समाज को सुरक्षित रोज़गार के अवसर देने में सफल नहीं हुई हैं। और दूसरी तरफ सरकार कार्पोरेट्स को सार्वजनिक संसाधनों से उपकृत
करती रही। इससे न केवल गरीबी ने ढांचागत रूप लिया, बल्कि पर्यावरण संकट सरीखी नव-विकासवादी संकटों ने भी अपना आकार
बढाया। आज लोग अपने भोजन और रोज़गार के लिए सरकार की तरफ देखते हैं, यही संकेत हैं कि हम कमज़ोर हो गए हैं।
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------सचिन कुमार जैन
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