Friday, 20 July 2012



सरहद, घरों के बीच 


घर, कोई एक थोडे है मेरा
मैं निकला अपने उस घर को 
रसते में देखा 
अनजाना था, पुछा, ये किसने तारों की बाड़ लगाईं
बकरियां चरती रहती हैं
कभी इधर, कभी उधर,
बंदूकों के खौफ से बेखबर,  
हवाओं भी अब खुल के क्यों नहीं बहतीं
खुशबु फूलों की महकती रहती है
खुशबु भी यह सहमी सी है 
तितलियाँ भी हो आयीं मेरे घर डरते डरते, 
मुझे झकझोरा फूलों ने, तितलियों ने 
और सरहद की हकीकत बतलाई
नींद से जागने के लिए चेताया,
जिन्दा रहने का पाठ पढाया
सिखाया मुझे न पूछना कभी सवाल 
ये बारूद से सीमा किसने रचाई,
होली के रंग की बात न होगी
लोहड़ी के गीत भी न होंगे,
ये इंसानी फितरत ही है जो ढूँढता है 
खूनों के दरियाओं में ख़ुशी 
खुदा को भी गढ़ता है 
उसके उसूलों पर ताले भी जड़ता है,
रमजान की अज़ान का संगीत 
गूंजेगा बस सरहदों के भीतर,
तलाश है सियासत को एक मौके की 
और तैयारी उस त्यौहार की 
जिसे हम जंग कहते हैं 
जंग यह नहीं देखती 
किसका घर है और सरहद के किस ओर;

-सचिन कुमार जैन 

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