Friday, 20 July 2012

भारत में बेरोज़गारी - दो दशकों की एक पड़ताल



भारत सरकार के लेबर ब्यूरो ने जलाई 2012 में रोज़गार-बेरोज़गारी पर अपने दूसरे वार्षिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी की। इसमे बताया गया है कि भारत में 15 वर्ष की उम्र से ज्यादा के आयु वर्ग में 3.8 प्रतिशत लोग बेरोजगार हैं। इस दर के आधार पर यदि आंकलन किया जाए तो भारत में 4.93 करोड़ लोग बेरोजगार हैं। यह संस्थान भी बेरोज़गारी के संकट को आंकड़ों के जाल में उलझाता दीखता है। इसने 4 आधारों पर (वार्षिक बेरोज़गारी, मासिक बेरोज़गारी, साप्ताहिक बेरोगजारी और दैनिक बेरोजगारी) बेरोज़गारी का आंकलन किया है। वार्षिक आंकडे बताते हैं 3.8 प्रतिशत लोग बेरोज़गारी हैं, साप्ताहिक बताते हैं 4.6 प्रतिशत और दैनिक बताते हैं 6.3 प्रतिशत लोग बेरोजगार हैं। अब यदि दैनिक को आधार मान लिया जाए तो पता चलता है कि 8.18 करोड़ लोग बेरोजगार हैं। 20 साल के आर्थिक उदारीकरण, व्यवस्था, सेवाओं और आर्थिक गतिविधियों के धुआंधार निजीकरण के बाद वर्ष 2011 में हमने जो उपलब्धि हासिल की, वह है बेरोज़गारी। 

वर्ष 1991 से 2011 के बीच जो भी रोज़गार के अवसर पैदा हुए, उनमे से ज्यादातर असंगठित क्षेत्र में पैदा हुए। असंगठित क्षेत्र का मतलब है जहाँ कामगारों या कर्मचारियों या मजदूरों को किसी अनुबंध या निश्चित वायदे के साथ काम पर नहीं रखा जाता है। वहां काम कब तक मिलता रहेगा, यह कभी तय नहीं रहता है। इन क्षेत्रों में काम करने वालों को स्वास्थय, सामाजिक सुरक्षा, बीमा, बच्चों की शिक्षा के लिए कोई अतिरिक्त सुविधाएं या हक़ नहीं मिलते हैं। गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव की अवधारणा के तहत कोई विशेष संरक्षण नहीं मिलता है। कामगारों को बिना कारण बताये काम से हटाया जा सकता है। उनके काम के घंटे और मजदूरी नियमों में तो तय की जाती है, पर उनका पालन करने के लिए नियोक्ता यानी रोज़गार देने वाला बाध्य नहीं होता है। इस क्षेत्र में आज भारत की कर्मशील जनसँख्या का 93 फीसदी हिस्सा इसी असुरक्षित और शोषण से भरपूर असंगठित क्षेत्र में काम करता है। साफ़ तौर पर यह भी कहा जा सकता है कि इन्हे हर रोज़ रोज़गार मिलेगा इसकी कोई गारंटी भी नहीं है। विशेषज्ञ अब इसे अनौपचारिक क्षेत्र (इनफार्मल सेक्टर - इसमे वो पारिवारिक व्यापारिक उद्यम आते हैं, जिनमे 5 से कम लोग काम करते हैं) भी कहते हैं, जबकि औपचारिक क्षेत्र (या फार्मल सेक्टर में सार्वजनिक उपक्रमों, निजी और कारपोरेट क्षेत्र और उन घरेलु व्यापारों को रखा जाता है, जिनमे 5 से ज्यादा कामगार काम करते हैं.)। 

भारत के लगभग हर क्षेत्र (सरकार और निजी) के भीतर असंगठित श्रमिक काम करते हैं। नेशनल सेम्पल सर्वे आर्ग्नाइज़ेशन (2004-05) के मुताबिक़ कृषि और वानिकी में काम करने वाले 99.9 प्रतिशत असंगठित श्रमिक हैं, मछलीपालन में 98.7 प्रतिशत, खदानों में 64.4 प्रतिशत, विनिर्माण या मेनुफेक्चरिंग में 87.7 प्रतिशत, निर्माण में 92.4 प्रतिशत, थोक और फुटकर व्यापार में 98.3 प्रतिशत, होटल और रेस्टोरेंट्स में 96.7 प्रतिशत और परिवहन, भंडारण और संचार में 82.2 प्रतिशत को असंगठित क्षेत्र के कामगार अपनी सेवाएँ देते हैं। रियल एस्टेट में 81.4 प्रतिशत और वित्तीय संस्थानों, जैसे बैंक में 32.4 प्रतिशत लोग असंगठित हैं। हाल ही में फुटकर व्यापार में 51 फ़ीसदी विदेशी निवेश की नीति लागू करने के पीछे तर्क देते हुए सरकार, कार्पोरेट्स और अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तर्क दिए कि फुटकर बाज़ार में ज्यादातर लोग असंगठित क्षेत्र से हैं और विदेशी निवेश उनकी स्थिति सुधारेगा; पर सरकार यह क्यों नहीं बताती कि रियल एस्टेट, होटल, निर्माण और थोक व्यापार में तो विदेशी निवेश आ चुका है, वहां असंगठित क्षेत्र की स्थिति में क्यों बदलाव नहीं आया? वहां पर जब मजदूर अपने वेतन और हकों के लिए लडते हैं, तो उन पर गोलियां चलती हैं, मजदूर मरते हैं पर फिर भी सरकार पूंजीपति के पक्ष में ही खड़ी होती है; क्यूंकि कानूनन कोई भी नियोक्ता मजदूर के प्रति जवाबदेय नहीं है। 

 जरा इसकी हकीकत आंकड़ों में देखते हैं। वर्ष 1999-2000 में देश में कुल 39.64 करोड़ रोज़गाररत लोग थे, इनमे से 36.267 करोड़ (यानी 91.5 प्रतिशत) लोग असंगठित या अनौपचारिक कामगार के रूप में वर्गीकृत थे। स्थिति में बदलाव हुआ, काम के अवसर बढे और सुरक्षित काम से अवसर सुरक्षित नहीं हुए। वर्ष 2004-05 में देश में रोज़गाररत लोगों की संख्या बढ़कर 45.57 करोड़ हो गयी, इनमे से 92.3 प्रतिशत यानी 42.067 करोड़ लोग असंगठित क्षेत्र में थे। 5 सालों में 59.3 लाख लोगों को रोज़गार मिला पर इसमे से संगठित क्षेत्र में केवल 1.39 लाख लोगों को रोज़गार मिला यानी 97.66 प्रतिशत लोगों को रोज़गार असंगठित क्षेत्र में मिला। रमेश कोल्ली और अनिंदिता सिन्हारे ने अपने शोध पर्चे - शेयर आफ इन्फार्मल सेक्टर एंड इन्फोर्मल एम्प्लोय्मेंट इन जी डी पी एंड एम्प्लोय्मेंट में लिखा है कि भारत में वर्ष 1999-2000 में कुल 39.97 करोड़ रोजगार के अवसर थे, जिनमे से 37.98 करोड़ यानी 95 फीसदी असंगठित क्षेत्र या अनौपचारिक अवसर थे। वर्ष 2004-05 में ये रोज़गार के कुल अवसर बढ़कर 55.65 करोड़ हो गए, इनमे से 53.16 करोड़ अवसर यानी 95.5 प्रतिशत अनौपचारिक रोज़गार के थे। 

 आज सरकार और निजी क्षेत्र मिल कर जिनके श्रम का शोषण कर रहे हैं, वही असंगठित क्षेत्र भारत के सकल घरेलु उत्पाद में 53.9 प्रतिशत का योगदान देता है। नयी आर्थिक नीतियों के तहत जो स्थितियां बनी हैं, वह कुछ और ही सच्चाई बयां करती है। हमें यह बताया जाता रहा कि निजी क्षेत्र लोगों को रोज़गार देगा। यह वायदा झूठ साबित होता दिख रहा है। वर्ष 1999-2000 में निजी क्षेत्र में कुल मिलकर 1.12 करोड़ रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाए गए थे, जो कुल रोज़गार का 2.8 प्रतिशत था। मामला 2004-05 तक पंहुचते-पंहुचते और बिगड़ गया, निजी क्षेत्र का योगदान कम हो गया। इस साल कुल रोज़गार में से निजी क्षेत्र 1.37 करोड़ यानी 2.5 प्रतिशत का ही योगदान दे रहा था। हमारे योजनाकार यह मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि देश में रोज़गार की सुरक्षा निजी और कारपोरेट क्षेत्र नहीं कर सकता है, इसके लिए हमें लघु उद्योग, स्थानीय अर्थव्यवस्था और खेती को ही संरक्षण देना होगा। भारत में 64 क़ानून बने हुए हैं, जो संगठित क्षेत्र में काम करने वाले 3.503 करोड़ लोगों की सुरक्षा करते हैं; पर असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले 42.067 करोड़ लोगों की सुरक्षा के लिए 6 क़ानून भी नहीं हैं। निजी क्षेत्र और कारपोरेट क्षेत्र में सरकार को इस बात के लिए अपने नियंत्रण में रखा कि वह मजदूरों और असंगठित कामगारों को कानूनी संरक्षण न दे, ताकि उनका शोषण किया जा सके और उनके प्रति नियोक्ताओं की कोई जवाबदारी न बचे। विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के तहत निवेश बढाने के लिए अपनाई गयी नीतियों में मजदूरों और कामगारों के शोषण के लिए कार्पोरेट्स को खुली छूट दे दी गयी। इसके लिए बाकायदा सरकार ने कामगारों के संरक्षण के लिए बने कानूनों में निजी क्षेत्र के पक्ष में बदलाव भी किये।

सचिन कुमार जैन 

Unemployment in India, Impact of new economic policies 

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