भूमंडलीकरण के तहत
जिन आर्थिक नीतियों को अपनाया गया उनके पीछे धनिक और पूंजीवादी संस्थाओं - सरकार
और निजी क्षेत्र, का मकसद यह था कि प्राकृतिक
संसाधन सत्ता की कुंजी हैं। यदि इन पर नियंत्रण कर लिया जाए तो राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था के
संचालन सूत्र अपने नियंत्रण में किये जा सकते हैं। भू-हदबंदी क़ानून के तहत भारत में
स्वतंत्र के बाद यह तय किया गया था कि एक निश्चित भू-भाग के अलावा लोग जमीन के
मालिक न हो सकेंगे। विनोबा भावे
ने यह सुनिश्चित करवाया था कि जिनके पास सेंकडों-हज़ारों एकड़ जमीन हैं, वह या तो खुद दान कर दें या सरकार उन पर
नियंत्रण ले ले।और यह जमीन लोगों में इस तरह बांटी जाए जिससे उनकी बदहाली ख़त्म हो सके। भारत में राजशाही और जमींदारी की प्रथा को
जड़ से ख़त्म करने के लिए जरूरी था कि देश में भूमि सुधार की व्यवस्था लागू हो और
जमीन का सामान वितरण किया जाए। 1990 के दशक में जब उदारीकरण की नीतियाँ लागू
हुईं तब पहले दिन से ही देश में जो ढांचागत परिवर्तन किये जाने शुरू हुए, उनमे भू-हदबंदी कानूनों और नियमों में बदलाव
की बात कही जाने लगी।जो कम्पनियाँ या औद्योगिक समूह देश में निवेश करने के लिए तत्पर थे वे
बडे-बडे भू भागों पर नियंत्रण चाहते थे, पर भू-हदबंदी
क़ानून के होते हुए यह संभव नहीं था। इनमे बदलाव लाये गए और हम यह देख रहे
हैं कि विशेष आर्थिक प्रक्षेत्र (स्पेशल इकोनोमिक ज़ोन क़ानून) के तहत 1 करोड़ हेक्टेयर जमीन कंपनियों को दी जा
चुकी है। कृषि में अनुबंध खेती और
कारपोरेट समूहों द्वारा खेती के काम में घुसने के लिए रास्ता देने के सन्दर्भ में
इन कानूनी बदलावों ने बड़ी भूमिका निभायी।मध्यप्रदेश में निजी क्षेत्र को निवेश के
लिए आमंत्रित किया गया, उन्हे बिजली, पानी, सड़क आदि की विशेष सुविधाएं देने के प्रावधान तो किये ही गए, साथ ही खूब जमीनें भी दी गयीं।यहाँ 200 कम्पनियों को अपने प्रोजेक्ट लगाने के लिए 4.48 लाख हेक्टेयर जमीन दे दी गयी। इसमे से 3.98 लाख हेक्टेयर जमीन निजी जमीन थी, इसका मतलब है कि इतनी बाड़ी खेती की जमीन का औद्योगिक उपयोग के लिए
उपयोग परिवर्तन हुआ।खेती घाटे का सौदा बताया जाता है, इसे लाभ का सौदा बनाने के नाम पर जमीनें बड़े कार्पोरेट्स को बेचने या
उन्हे सौंपने का विकल्प खड़ा किया गया। जमीन के साथ-साथ पानी और जंगलों के निजीकरण की प्रक्रिया भी चली है।
भारत में एक
अनुमान के मुताबिक़ बाँध, सड़क, जल विद्युत, सिंचाई और वन्य प्राणी अभ्यारण्य की 5324 ऐसी परियोजनाएं चल रही हैं, जिनके कारण लोगों का विस्थापन होगा या विस्थापन हो रहा है। आदर्श पुनर्वास नीति में और कुछ
परियोजनाओं के सन्दर्भ में न्यायालय भी यह प्रावधान कर चुका है कि जिनकी जमीन इन
परियोजनाओं के कारण जा रही है, उन्हे जमीन के बदले जमीन का प्रावधान किया जाए; परन्तु सरकारें (केंद्र और राज्य सरकारें) यह प्रावधान लागू करने को
तैयार नहीं हैं। वे विकास परियोजनाओं से प्रभावितों से केवल जमीन लेती हैं और उनके एक
सीमित और अपर्याप्त नकद मुआवज़े का विकल्प देती हैं। मध्यप्रदेश में सरदार सरोवर
बाँध परियोजना के मामले में मध्यप्रदेश सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में यह हलफनामा
दिया कि हमारे पास जमीन के बदले देने के लिए जमीन ही नहीं है, परन्तु राज्य सरकार ने उद्योगपतियों और निवेशकों को देने के लिए एक
जमीन बैंक (लेण्ड बैंक) बनाया है, जिसमे जुलाई 2012 तक 18000 हेक्टेयर जमीन इकठ्ठा की जा चुकी थी। विकास की नई नीतियों ने यह भी दिखाया है कि समाज की बड़ी जनसँख्या के हितों, पर्यावरण और भविष्य के प्रति जवाबदेय होना कोई महत्वपूर्ण और निर्णायक
तत्त्व नहीं हैं।
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