बीमारी के बाद स्वास्थ्य बीमा का जाल
सचिन कुमार जैन
विकसित, ख़ास
तौर पर ब्रिटेन और अमेरिका की तर्ज़ पर भारत चाहता है कि लोगों की बीमारी के इलाज़
के लिए स्वास्थ्य बीमा की व्यवस्था को अपनाया जाए. सरकार ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था
खड़ी करे जिसमे सरकारी संसाधन तो खर्च हों, परन्तु
वे संसाधन निजी क्षेत्र के खाते में जाएँ और बीमा इसके लिए एक उपयुक्त नीति है; परन्तु
भारत में गंभीर गैर-जवाबदेहिता, स्वास्थ्य
ढांचों को भरपूर अभाव और गरीबी के मकडजाल के चलते यह व्यवस्था लोगों को जीवन के
बजाये ज्यादा गहरे संकट में धकेलने का जरिया साबित हो रही है.
स्वास्थ्य सेवाओं में अकेले दवाईओं पर गाँवों में 40.59 रूपए (कुल व्यय का 3.58
प्रतिशत) और शहरों में 62.05 रूपए
(कुल व्यय का 3.12 प्रतिशत) हर माह खर्च हो रहा है. असमानता का आलम देखिये कि शहरी केरल
में लोग दवाइयों पर 125.63 रूपए, गोवा में 108.49
रूपए और पुदुच्चेरी में 110.71
रूपए खर्च कर रहे हैं, इसके
दूसरी तरफ सिक्किम में झारखंड में 33.98
रूपए, आसाम में 29.25
रूपए, बिहार में 40.98
रूपए, खर्च कर रहे हैं. इन परिस्थितयों में निःसंदेह नीतिगत प्राथमिकता
यह नहीं हो सकती है कि राज्य भोजन, शिक्षा
और स्वास्थ्य में
क्षेत्र में निजी बाज़ार को स्थापित करने की नीति बनाए. मौजूदा सामजिक और आर्थिक बदहाली के साथ साथ हमें यह भी ध्यान रखना होगा
कि भारत का संविधान देश में रहने वाले लोगों के जीवन जीने के अधिकार को मौलिक
अधिकार का दर्ज़ा देता है. ये तीनों सेवाएँ इस मौलिक अधिकार का अहम् हिस्सा हैं, इसे बार-बार सर्वोच्च न्यायलय ने भी परिभाषित किया है और संसद ने भी.
आज हम एक ऐसे देश के रूप में जाने जाते हैं जहाँ दुनिया
के में सबसे ज्यादा बच्चे अपना पहला जन्मदिन मनाने से पहले मर जाते
हैं, सबसे ज्यादा मातृत्व मौतें यहाँ होती है. दुनिया के आधे
कुष्ठ रोगी (130 हज़ार) और 21 प्रतिशत टी बी के रोगी (19 लाख) भारत में रहते हैं.
यह एक दुखद तथ्य है कि भारत सरकार ने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में बेहद
गैर-जिम्मेदार रवैय्या अपनाया है. भारत में वर्ष 2011 के स्थिति में स्वास्थ्य पर लगभग 2500
रूपए का कुल खर्चा हो रहा है, इसमे से
सरकार केवल 675 रूपए खर्च कर रही है और बाकी 1825 रूपए लोगों के निजी खाते से खर्च
हो रहे हैं और यह लोगों को कर्ज़दार बनाने में सबसे अहम् भूमिका निभा रहा है. बेहद
दुखद है कि भारत में वर्ष 2011 की स्थिति में दवाओं के लिए प्रतिव्यक्ति केवल 43
रूपए वार्षिक आवंटन किया जा रहा था और केवल 5.4
प्रतिशत लोगों को ही मुफ्त दवाइयां मिल पा रही हैं.
वर्ष 2010 में भारत में 30.2 करोड़
लोगों का स्वास्थ्य बीमा था. इनमे से 24 .7 करोड़
लोगों का बीमा तीन सरकारी स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रमों (राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा
योजना, राजीव आरोग्य श्री और कलाईग्नार) के अंतर्गत था. इन
सरकारी और निजी स्वास्थ्य बीमा
कार्यक्रमों के अनुभव बिलकुल अलग तरह के रहे. भारत में अब भी लोग अपने निवेश पर
स्वास्थ्य बीमा करवाने की स्थिति में नहीं हैं; क्यूंकि
बीमार पडने पर वे क़र्ज़ लेकर इलाज़ करवाते हैं और बीमा के लिए क़र्ज़ लेना तो गरीबी के
जाल में रहते हुए संभव नहीं है. हमारे यहाँ यह भी एक सच्चाई है कि आपरेशन के लिए
या अस्पताल में भर्ती होने पर ही बीमा का लाभ मिलता है, सतत इलाज़ के लिए बीमा कोई संरक्षण नहीं देता है. जबकि
अस्पताल के बाहर रह कर लगातार चलने वाला इलाज़ भी बहुत खर्चीला कार्यक्रम है और
स्थायी या लम्बी चलने वाली बीमारियों का इलाज़ और दवाओं का खर्च इसमे शामिल ही नहीं
होता है. योजना आयोग की रिपोर्ट मानती है कि इससे डाक्टर अनावश्यक दवाएं लिखने
लगेंगे और दावा विक्रेतों के साथ उनका गठजोड़ और तगड़ा हो जाएगा. एक तरफ तो एक साल में
एक बार में एक व्यक्ति के अस्पताल
में भर्ती होने पर लगभग 20000 रूपए
का खर्चा होता है, जिसमे नियमित इलाज़ के खर्चे शामिल नहीं हैं; पर हमारी सरकारी बीमा योजनायें एक साल में एक परिवार के
लिए केवल 30000 रूपए का ही बीमा संरक्षण उपलब्ध करवाती हैं.
योजना आयोग द्वारा भारत में स्वास्थ्य बीमा के अनुभवों पर
करवाए गए अध्ययन (2011) में
बताया गया कि केंद्र सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाय) में
अस्पात में भर्ती होने की दर 1000 हितग्राहियों
में से 20 है; जबकि
निजी बीमा क्षेत्र के तहत 1000 बीमा
हितग्राहियों में से 64 लोग
अस्पताल में भर्ती होकर इलाज़ करवाते हैं. सरकार की नीति है कि वह स्वास्थ्य पर
खर्चा तो करे, पर इसका लाभ निजी क्षेत्र के मिले; इसीलिए वह स्वास्थ्य सेवाओं को सुद्रढ़ करने के बजाये स्वास्थ्य बीमा की नीति पर गयी है. इससे बीमा बाज़ार और स्वास्थ्य
बाज़ार दोनों को ही सरकारी धन और संसाधनों से आर्थिक लाभ कमाने का अवसर मिलता है.
इतना ही नहीं वर्ष 2005 से भारत
में निजी स्वास्थ्य केन्द्रों को स्थापित करने के लिए 5 से 10 सालों
के लिए आयकर में छूट, सस्ती
या मुफ्त जमीन और मशीनों के आयात पर शुल्कों में रियायत के भी भरपूर प्रावधान रहे
हैं. यह क्षेत्र पनपा; पर समाज
के वंचित तबकों और गरीब परिवारों
को मुफ्त इलाज़ और पूरा इलाज़ देने के मामले में वह साफ़ मुकरता आया है. भारत में
वर्ष 2004 में अस्पताल में भर्ती होकर इलाज़ पाने पर लगभग 11553 रूपए सालाना खर्च होते थे, जबकि
वर्ष 2009
-10 में स्वास्थ्य बीमा दावों के
विश्लेषण से पता चला कि अब यह व्यय 19637 रूपए
सालाना है. अगर आप स्वास्थय बीमा दस्तावेजों पर नज़र डालें, तो आपको पता चलता है कि 9
बिंदु यह
बताते हैं कि बीमा सी आपको कौन से लाभ मिल सकते हैं;
और 33 बिंदु यह बताते हैं कि आपको कब और कैसे बीमा का लाभ नहीं ही मिलेगा.
वास्तव में सेवाएँ उपलब्ध करवाना बीमा बाज़ार का प्राथमिक मकसद नहीं है. इसकी
प्रक्रियाएं भी बहुत जटिल हैं, ख़ास टूर पर ग्रामीण इलाकों के
लिए तो यह एक नाउम्मीदी का ही दूसरा नाम है. भारत में कुल बाल मृत्युओं में से 54 प्रतिशत
तो नवजात शिशु यानी 28 दिन से कम उम्र के होते हैं, परन्तु यह आयु वर्ग तो बीमा के दायरे में ही नहीं आता है.
देश में 25 प्रतिशत
जनसँख्या स्वास्थ्य बीमा के दायरे में है और इसका विस्तार बेहद असमानता पूर्ण है.
तमिलनाडु में 62 प्रतिशत और आन्ध्र प्रदेश में 87 प्रतिशत जनसँख्या का स्वास्थ्य बीमा है; परन्तु मध्य प्रदेश में 2 प्रतिशत, असम में 3 प्रतिशत
लोग ही स्वास्थ्य बीमा के दायरे में हैं. मेकेंजी और आई डी ऍफ़ सी मानते हैं कि
भारत में स्वास्थ्य पर अगले 5 वर्षों
में स्वास्थ्य सेवा उद्योग का आकार 125 बिलियन
डालर का हो जाएगा. जिसमे से सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय का हिस्सा 20 प्रतिशत
के आस पास ही रहेगा; यानी
लोगों को 100 बिलियन डालर खर्च करना होंगे. एक्सप्रेसहेल्थकेयर डाट इन पर
छपी एक खबर के मुताबिक़ विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के मुताबिक़ हर 1000 की जनसंख्या पर 4 बिस्तर
होना चाहिए, इसका मतलब है कि भारत
को अभी 30 लाख अस्पताल बिस्तरों की जरूरत है. यदि यह माना जाए कि
हमें 50 -50 बिस्तरों वाले अस्पताल बनाना हैं, तब भी हमें देश में 60000 अस्पताल
बनाने होंगे. इस सन्दर्भ में भारत सरकार और योजना बनाने वाले मानते हैं कि इस कमी
को खुला बाज़ार अवसर मानता है और वह निजी निवेश के जरिये स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा
खड़ा कर लेगा. जब वह निवेश करेगा तो लाभ कमाना चाहेगा, वह लाब कम सके इसके लिए जरूरी है कि सरकारी हिस्सेदारी कम
हो ताकि लोग निजी क्षेत्र या निजी अस्पतालों की और जाने के लिए प्रवर्त हों.
अपने समाज
को बीमार रख कर किया जाने वाला विकास क्या ठोस और स्थायी हो सकता है; विश्व स्वास्थ्य संगठन (2012) के
मुताबिक भारत में प्रतिव्यक्ति स्वास्थ्य पर व्यय 44 डालर
सालाना है, जबकि यह मालदीव में 355 डालर, संयुक्त अरब अमीरात में 1704 डालर, कोरिया में 1184 डालर, इटली में 3323 डालर
और अमेरिका में 7960 डालर है. यही भी एक तथ्य है कि अमेरिया और ब्रिटेन या
अन्य विकसित देशों में स्वास्थ्य सेवाएँ बहुत मंहगी हैं, इसलिए भारत की यह नीति रही है कि हम अपने देश की
स्वास्थ्य सेवाओं को इसलिए बेहतर बनाएं ताकि यहाँ स्वास्थ्य पर्यटन
का बाज़ार बन सके, जहाँ विकसित देशों के लोग इलाज करवाने आयें; उनकी जरूरतों के मुताबिक़ हमारे यहाँ इन सेवाओं का विस्तार
हो रहा है. देश के तीन चौथाई यानी 75 प्रतिशत
आबादी जो निजी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठा पाने की हैसियत में नहीं है; उसकी जरूरत पूरा करने के लिए न तो सरकार की कोई तैयारी है
न ही निजी क्षेत्र की.
Health issues in India, Madhya Pradesh, Sachin Kumar Jain, Health Policy
बधाई सर, अब आपकी बातें एक साथ इस ब्लॉग पर लोग देख और पढ़ सकेंगे..
ReplyDeleteShukriya Pushya Bhai aur swaagat bhee.
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